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Nagarjuna Aur Unki Kavita

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खड़ीबोली कविता की परम्परा भी प्रचुर समृद्ध है। नागार्जुन इस परम्परा की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। उनकी कविता के अनेक पक्ष हैं, यथा—आत्माभिव्यक्ति, प्रगतिशीलता, राजनीति, प्रकृति आदि। कुछ कथात्मक कविताओं में उन्होंने पौराणिक आख्यानों को भी आधार बनाया है, पर उसे आधुनिक संवेदना से नया बना दिया है। नागार्जुन के प्रत्येक पक्ष की कविता में गजब का वैविध्य है। यह वैविध्य अन्तर्वस्तु के स्तर पर भी है और रूप के स्तर पर भी। उनकी तरह अनेक प्रकार की भाषाओं का प्रयोग करनेवाले कवि आधुनिक काल में निराला के अलावा शायद ही कोई हुए हों। आम तौर पर उन्हें जन-कवि माना जाता है, लेकिन वे उसके साथ-साथ अभिजन-कवि भी थे। अभी कुछ दिन पहले ‘कवि अज्ञेय’ नामक डा. नवल की आलोचना-पुस्तक प्रकाशित हुई है। उससे स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय और नागार्जुन एक-दूसरे के उलट नहीं थे, बल्कि उनमें मिलन के अनेक बिन्दु थे। अज्ञेय की कविता का नायक भी जनसाधारण था और नागार्जुन ने भी अनेक स्थलों पर अभिजात संवेदना का परिचय दिया है। उनकी कविता के सम्बन्ध में ज्यादा न कहकर उनकी कुछ पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं, जिससे उनकी अभिजात संवेदना और भाषा-शैली का भी पता चल सके। एक कविता में उन्होंने राष्ट्रगान की याद दिलानेवाला यह चित्र अंकित किया है: ‘दक्षिण में है नारिकेल-पूगीवन वलयित केरल जनपद/ तमिलनाडु की धनुष्कोटि-कन्याकुमारिका/पश्चिम जलनिधि सिंध-कच्छ-सौराष्ट्र/और गुर्जर- परिशोभित/उत्तर का दिक्पाल तुम्हारा महानाम उत्तुंग भाल/गौरीपति शंकर-तपःपूत कैलाश शिखर दंडायमान है/प्राची में है वरुणालय वह वंग-विभूषण/और वक्ष पर कौस्तुभ मणि-सा विंध्य पड़ा है/जाने कब से!’ डा. नवल की यह पुस्तक निश्चय ही लोकप्रियता प्राप्त करेगी, ऐसा विश्वास है।

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खड़ीबोली कविता की परम्परा भी प्रचुर समृद्ध है। नागार्जुन इस परम्परा की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। उनकी कविता के अनेक पक्ष हैं, यथा—आत्माभिव्यक्ति, प्रगतिशीलता, राजनीति, प्रकृति आदि। कुछ कथात्मक कविताओं में उन्होंने पौराणिक आख्यानों को भी आधार बनाया है, पर उसे आधुनिक संवेदना से नया बना दिया है।

नागार्जुन के प्रत्येक पक्ष की कविता में गजब का वैविध्य है। यह वैविध्य अन्तर्वस्तु के स्तर पर भी है और रूप के स्तर पर भी। उनकी तरह अनेक प्रकार की भाषाओं का प्रयोग करनेवाले कवि आधुनिक काल में निराला के अलावा शायद ही कोई हुए हों।

आम तौर पर उन्हें जन-कवि माना जाता है, लेकिन वे उसके साथ-साथ अभिजन-कवि भी थे। अभी कुछ दिन पहले ‘कवि अज्ञेय’ नामक डा. नवल की आलोचना-पुस्तक प्रकाशित हुई है। उससे स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय और नागार्जुन एक-दूसरे के उलट नहीं थे, बल्कि उनमें मिलन के अनेक बिन्दु थे। अज्ञेय की कविता का नायक भी जनसाधारण था और नागार्जुन ने भी अनेक स्थलों पर अभिजात संवेदना का परिचय दिया है।

उनकी कविता के सम्बन्ध में ज्यादा न कहकर उनकी कुछ पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं, जिससे उनकी अभिजात संवेदना और भाषा-शैली का भी पता चल सके। एक कविता में उन्होंने राष्ट्रगान की याद दिलानेवाला यह चित्र अंकित किया है: ‘दक्षिण में है नारिकेल-पूगीवन वलयित केरल जनपद/ तमिलनाडु की धनुष्कोटि-कन्याकुमारिका/पश्चिम जलनिधि सिंध-कच्छ-सौराष्ट्र/और गुर्जर- परिशोभित/उत्तर का दिक्पाल तुम्हारा महानाम उत्तुंग भाल/गौरीपति शंकर-तपःपूत कैलाश शिखर दंडायमान है/प्राची में है वरुणालय वह वंग-विभूषण/और वक्ष पर कौस्तुभ मणि-सा विंध्य पड़ा है/जाने कब से!’

डा. नवल की यह पुस्तक निश्चय ही लोकप्रियता प्राप्त करेगी, ऐसा विश्वास है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2016
Weight
290 grams
ISBN-13
9788126729364
Pages
111
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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