Shrilal Shukla Ki Duniya
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Akhilesh, Shrilal ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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स्वातंत्र्योत्तर भारतीय यथार्थ के अत्यन्त सतर्क और विलक्षण उद्घाटनकर्ता हैं श्रीलाल शुक्ल। उन्होंने रचनात्मकता का जैसा जादू बिखेरा, वैसा उनके अतिरिक्त अन्य किसी से सम्भव न हुआ। उपन्यास, कहानी, निबन्ध, व्यंग्य, आलोचना आदि विविध विधाओं में फैला उनका साहित्य भारतीय समाज का महायथार्थ प्रकट करता है। साथ ही वह भाषा और शिल्प के अभूतपूर्व और अप्रतिम रूपों का आविष्कार भी करता है। ऐसे में श्रीलाल शुक्ल के जीवन और साहित्य के सत्यों, प्रश्नों, रहस्यों और जिज्ञासाओं को सुलझाने और उनका मूल्यांकन प्रस्तुत करनेवाले पुस्तक की आवश्यकता लम्बे अर्से से थी। उस आवश्यकता को पूरा करती है यह पुस्तक ‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’।</p> <p>प्रसिद्ध युवा कथाकार अखिलेश द्वारा सम्पादित यह कृति श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व और सृजन के अध्ययन की विभिन्न विचारोत्तेजक छवियाँ प्रस्तुत करती है। अनेक विख्यात रचनाकारों के लेखों से समृद्ध यह पुस्तक हिन्दी में सर्वाधिक पढ़े जा रहे साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल को विधिवत् जानने का अचूक ज़रिया है।</p> <p>‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’ कोई अभिनन्दन ग्रन्थ नहीं है। यहाँ तो व्यक्ति और लेखक श्रीलाल शुक्ल को लेकर बहसें हैं, मत वैभिन्य हैं, विश्लेषण हैं, सन्देह और भरोसे हैं। इसीलिए श्रीलाल शुक्ल और उनके लेखक की तरह ही जीवन्त, उत्तेजक, बेलौस और संजीदा बन सका है उनके समग्र मूल्यांकन का यह संसार।</p> <p>‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’ में श्रीलाल शुक्ल पर इतनी अधिक, इतनी बेशक़ीमती सामग्री उपस्थित है और मूल्यांकन की इतनी प्रविधियाँ हैं कि पाठक, विद्वान, लेखक, शोधार्थी सदा लाभान्वित होते रहेंगे।
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स्वातंत्र्योत्तर भारतीय यथार्थ के अत्यन्त सतर्क और विलक्षण उद्घाटनकर्ता हैं श्रीलाल शुक्ल। उन्होंने रचनात्मकता का जैसा जादू बिखेरा, वैसा उनके अतिरिक्त अन्य किसी से सम्भव न हुआ। उपन्यास, कहानी, निबन्ध, व्यंग्य, आलोचना आदि विविध विधाओं में फैला उनका साहित्य भारतीय समाज का महायथार्थ प्रकट करता है। साथ ही वह भाषा और शिल्प के अभूतपूर्व और अप्रतिम रूपों का आविष्कार भी करता है। ऐसे में श्रीलाल शुक्ल के जीवन और साहित्य के सत्यों, प्रश्नों, रहस्यों और जिज्ञासाओं को सुलझाने और उनका मूल्यांकन प्रस्तुत करनेवाले पुस्तक की आवश्यकता लम्बे अर्से से थी। उस आवश्यकता को पूरा करती है यह पुस्तक ‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’।</p>
<p>प्रसिद्ध युवा कथाकार अखिलेश द्वारा सम्पादित यह कृति श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व और सृजन के अध्ययन की विभिन्न विचारोत्तेजक छवियाँ प्रस्तुत करती है। अनेक विख्यात रचनाकारों के लेखों से समृद्ध यह पुस्तक हिन्दी में सर्वाधिक पढ़े जा रहे साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल को विधिवत् जानने का अचूक ज़रिया है।</p>
<p>‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’ कोई अभिनन्दन ग्रन्थ नहीं है। यहाँ तो व्यक्ति और लेखक श्रीलाल शुक्ल को लेकर बहसें हैं, मत वैभिन्य हैं, विश्लेषण हैं, सन्देह और भरोसे हैं। इसीलिए श्रीलाल शुक्ल और उनके लेखक की तरह ही जीवन्त, उत्तेजक, बेलौस और संजीदा बन सका है उनके समग्र मूल्यांकन का यह संसार।</p>
<p>‘श्रीलाल शुक्ल की दुनिया’ में श्रीलाल शुक्ल पर इतनी अधिक, इतनी बेशक़ीमती सामग्री उपस्थित है और मूल्यांकन की इतनी प्रविधियाँ हैं कि पाठक, विद्वान, लेखक, शोधार्थी सदा लाभान्वित होते रहेंगे।
Book Details
-
ISBN9788171789245
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बड़े-बुज़़ुर्ग कहते ही कुछ ऐसा लगता है जैसे जीवन की मुख्यधारा से चुपचाप किनारे होता कोई व्यक्ति। लेकिन उम्र का चढ़ते जाना जीवन के अन्त की कातर प्रतीक्षा में बदलना नहीं है। व्यक्ति की लालसाएँ और प्रतीक्षाएँ तो नित नई हमेशा रहती हैं। बुज़ुर्गों को अक्सर अपने पुराने दिनों से भी एक लड़ाई लड़नी पड़ती है। अपनी आदतों से, दूसरों की अपेक्षाओं से और सबसे ज़्यादा अपनी कमज़ोर पड़ती सामर्थ्य और हैसियत से। लेकिन यह जीवन का सत्य है। इसका साक्षात्कार इस दस्तावेज़ी संकलन की कहानियों में संवेदनात्मक स्तर पर होगा जिससे पाठक बड़े-बुज़ुर्गों के प्रति अपने भीतर एक अलग तरह की कोमलता का अनुभव करेगा।
Nirvasan
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Akhilesh
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अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ पारम्परिक ढंग का उपन्यास नहीं है। यह आधुनिकतावादी या जादुई यथार्थवादी भी नहीं। यथार्थवाद, आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद की ख़ूबियाँ सँजोए असल में यह भारतीय ढंग का उपन्यास है। यहाँ अमूर्त नहीं, बहुत ही वास्तविक, कारुणिक और दुखदायी निर्वासन है। सूत्र रूप में कहें तो यह उपन्यास औपनिवेशिक आधुनिकता/ मानसिकता के कारण पैदा होनेवाले निर्वासन की महागाथा है जो पूँजीवादी संस्कृति की नाभि में पलते असन्तोष और मोहभंग को उद्घाटित करने के कारण राजनीतिक-वैचारिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। जॉर्ज लूकाच ने चेतना के दो रूपों का ज़िक्र किया है : वास्तविक चेतना तथा संभाव्य चेतना। लूकाच के मुताबिक़ संभाव्य चेतना को छूनेवाला उपन्यास वास्तविक चेतना के इर्द-गिर्द मँडरानेवाले उपन्यास से श्रेष्ठ है। कहने की ज़रूरत नहीं, ‘निर्वासन’ इस संभाव्य चेतना को स्पर्श कर रहा उपन्यास है जिसकी अभी सिर्फ़ कुछ आहटें आसपास सुनाई पड़ रही हैं।
आधुनिकता के सांस्कृतिक मूल्यों में अन्तर्निहित विडम्बनाओं का उद्घाटन करनेवाला अपने तरह का हिन्दी में लिखा गया यह पहला उपन्यास है। ‘निर्वासन’ सफलता और उपलब्धियों के प्रचलित मानकों को ही नहीं समस्याग्रस्त बनाता अपितु जीव-जगत के बारे में प्राय: सर्वमान्य सिद्ध सत्यों को भी प्रश्नांकित करता है। दूसरे धरातल पर यह उपन्यास अतीत की सुगम-सरल, भावुकतापूर्ण वापसी का प्रत्याख्यान है। वस्तुत: ‘निर्वासन’ के पूरे रचाव में ही जातिप्रथा, पितृसत्ता जैसे कई सामन्ती तत्त्वों की आलोचना विन्यस्त है। इस प्रकार ‘निर्वासन’ आधुनिकता के साथ भारतीयता की पुनरुत्थानवादी अवधारणा को भी निरस्त करता है।
लम्बे अर्से बाद ‘निर्वासन’ के रूप में ऐसा उपन्यास सामने है जिसमें समाज वैज्ञानिक सच की उपेक्षा नहीं है किन्तु उसे अन्तिम सच भी नहीं माना गया है। साहित्य की शक्ति और सौन्दर्य का बोध करानेवाले इस उपन्यास में अनेक इस तरह की चीज़ें हैं जो वैचारिक अनुशासनों में नहीं दिखेंगी। इसीलिए इसमें समाज वैज्ञानिकों के लिए ऐसा बहुत-कुछ है जो उनके उपलब्ध सच को पुनर्परिभाषित करने की सामर्थ्य रखता है।
कहना अनुचित न होगा कि उपन्यास की दुनिया में ‘निर्वासन’ एक नया और अनूठा प्रस्थान है।
—राजकुमार
Pratinidhi Kahaniyan : Akhilesh
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Akhilesh
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अखिलेश की कहानियाँ बातूनी कहानियाँ हैं...ग़ज़ब का बतरस है उनमें। वे अपने पाठकों से जमकर बातें करती हैं। अपने सबसे प्यारे दोस्त की तरह गलबहियाँ लेकर वे आपको आगे और आगे ले जाती हैं और उनमें उस तरह की सभी बातें होती हैं जो दो दोस्तों के बीच घट सकती हैं (कोई चाहे तो इसे कहानीपन भी कह सकता है)। यही वजह है कि बेहद गम्भीर विषयों पर लिखते हुए भी अखिलेश की कहानियाँ ज़बर्दस्ती की गम्भीरता कभी नहीं ओढ़ती हैं। पढ़ते हुए कई बार एक मुस्कान-सी होंठों पर आने को होती है। क्योंकि उनके यहाँ कोई बौद्धिक आतंक, सूचना का कोई घटाटोप या किसी और तरह का बेमतलब का जंजाल चक्कर नहीं काटता कि पाठक कहीं और ही फँसकर रह जाए...। इन कहानियों की एक और ख़ूबी यह भी है कि ये कहानियाँ पाठक से ही नहीं बात करती चलतीं, बल्कि ख़ुद उनके भीतर भी कई तरह के समानान्तर संवाद चलते रहते हैं। वे ख़ुद भी अपने चरित्रों से बतियाते चलते हैं, उनके भीतर चल रही उठा-पटक को अपने अखिलेशियन अन्दाज़ में सामने लाते हुए। क्या है ये अखिलेशियन अन्दाज़! उसकी पहली पहचान यह है कि वह बिना मतलब गम्भीरता का ढोंग नहीं करते, बल्कि उनकी कहानियाँ अपने पाठकों को भी थोपी हुई गम्भीरता से दूर ले जानेवाली कहानियाँ हैं। उनकी कहानियों का गद्य मासूमियत वाले अर्थों में हँसमुख नहीं है, बल्कि चुहल-भरा, शरारती पर साथ ही बेधनेवाला गद्य है।
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