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Kavita Ka Uttar Jiwan

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‘कविता का उत्तर जीवन’ उत्तर समय में लिखी जा रही कविता का एक आलोचनात्मक पाठ-भर नहीं है, एक पूरे समय और काव्य-समय पर सघन विमर्श भी है। ‘शब्द और समय’ (1988) और ‘कविता का अर्थात्’ (1999) से जुड़कर अब वह एक त्रयी का हिस्सा भी है और फलश्रुति भी। (यद्यपि कोई भी फलश्रुति एक मिथ या यूटोपिया है)। परमानन्द श्रीवास्तव आधी सदी की कविता और आलोचना के संघर्ष के साक्षी ही नहीं रहे, उनके आलोचनात्मक हस्तक्षेप की विश्वसनीयता भी प्रायः असन्दिग्ध रही। उनका आलोचनात्मक गद्य ख़ास रचनात्मक चमक लिये हुए है, जिसकी छाप ‘कविता का उत्तर जीवन’ पर सबसे अधिक है। ‘कविता का उत्तर जीवन’ इस प्रमुख स्थापना के साथ पाठकों-लेखकों के बीच है कि किसी भी समय की महत्त्वपूर्ण कविता का एक वृहत्तर स्पेस होता है और वही दूसरे-तीसरे पाठ को दूसरे-तीसरे जीवन में फिर से घटित करता है। कविता का कोई भी नया पाठ एक पुनर्जीवन है, जो आस्वाद और मूल्यांकन के द्वन्द्व को अनिवार्य बनाता है। ‘कविता का उत्तर जीवन’ इसका साक्ष्य है कि कैसा भी प्रतिमानीकरण; (canonization) समूचे काव्यन्याय में अपने को असमर्थ पाता है; इसलिए भी कि ग़ालिब और कबीर हमारे लिए उतने ही समकालीन हो सकते हैं, जितने मुक्तिबोध और शमशेर। परमानन्द श्रीवास्तव की यह कृति शुद्ध स्वायत्त कविता की जगह अशुद्ध अनगढ़, पर जब-तब अथाह, कोशिश को महत्त्व देती है जिसमें आश्चर्य नहीं कि कभी डायरी, आत्मकथा तथा कॉलमनुमा लेख भी शामिल हैं। यह एक नई पहल है—इससे आलोचना, रचना—दोनों में समय की आहटों का पता चलता है।

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‘कविता का उत्तर जीवन’ उत्तर समय में लिखी जा रही कविता का एक आलोचनात्मक पाठ-भर नहीं है, एक पूरे समय और काव्य-समय पर सघन विमर्श भी है। ‘शब्द और समय’ (1988) और ‘कविता का अर्थात्’ (1999) से जुड़कर अब वह एक त्रयी का हिस्सा भी है और फलश्रुति भी। (यद्यपि कोई भी फलश्रुति एक मिथ या यूटोपिया है)। परमानन्द श्रीवास्तव आधी सदी की कविता और आलोचना के संघर्ष के साक्षी ही नहीं रहे, उनके आलोचनात्मक हस्तक्षेप की विश्वसनीयता भी प्रायः असन्दिग्ध रही। उनका आलोचनात्मक गद्य ख़ास रचनात्मक चमक लिये हुए है, जिसकी छाप ‘कविता का उत्तर जीवन’ पर सबसे अधिक है।

‘कविता का उत्तर जीवन’ इस प्रमुख स्थापना के साथ पाठकों-लेखकों के बीच है कि किसी भी समय की महत्त्वपूर्ण कविता का एक वृहत्तर स्पेस होता है और वही दूसरे-तीसरे पाठ को दूसरे-तीसरे जीवन में फिर से घटित करता है। कविता का कोई भी नया पाठ एक पुनर्जीवन है, जो आस्वाद और मूल्यांकन के द्वन्द्व को अनिवार्य बनाता है। ‘कविता का उत्तर जीवन’ इसका साक्ष्य है कि कैसा भी प्रतिमानीकरण; (canonization) समूचे काव्यन्याय में अपने को असमर्थ पाता है; इसलिए भी कि ग़ालिब और कबीर हमारे लिए उतने ही समकालीन हो सकते हैं, जितने मुक्तिबोध और शमशेर। परमानन्द श्रीवास्तव की यह कृति शुद्ध स्वायत्त कविता की जगह अशुद्ध अनगढ़, पर जब-तब अथाह, कोशिश को महत्त्व देती है जिसमें आश्चर्य नहीं कि कभी डायरी, आत्मकथा तथा कॉलमनुमा लेख भी शामिल हैं। यह एक नई पहल है—इससे आलोचना, रचना—दोनों में समय की आहटों का पता चलता है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2004
Weight
384 grams
ISBN-13
9788126708871
Pages
218
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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