Beeswin Shatabdi Mein Darshanshastra
(0)
Author:
Suman GuptaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की इस सातवीं पुस्तक में डॉ. सुमन गुप्ता ने समकालीन दार्शनिक चिन्तन की दो मुख्य प्रवृत्तियों—भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद—का मार्क्सवादी दृष्टि से अध्ययन किया है। इन दोनों विचारधाराओं को उनके सही सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए, डॉ. गुप्ता ने इनकी प्रचलित व्याख्याओं पर प्रश्नचिह्न लगाया है। उनका तर्क है कि गूढ़ पारिभाषिक शब्दावली के आवरण में इन विचारधाराओं की अमूर्त तत्त्वमीमांसी प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है, जो एक सही विश्व-दृष्टि प्रस्तुत करने के स्थान पर यथार्थ को विरूपित करती है। भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों के दृष्टिकोण के विपरीत, डॉ. सुमन गुप्ता ने एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया है, जो न केवल इन चिन्तनधाराओं के विविध पक्षों का एकीकरण करता है बल्कि उनके सामाजिक यथार्थ की जड़ों में भी जाता है। सुमन गुप्ता ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों द्वारा प्रतिपादित मनुष्य की संकल्पना मनुष्य को एक ऐसे अमूर्त रूप में चित्रित करती है जो अपने सामाजिक क्रियाकलाप से अपना या अपने चारों ओर की दुनिया का रूपान्तरण करने में असमर्थ है।</p> <p>डॉ. गुप्ता ने समकालीन दर्शन की इन दोनों प्रवृत्तियों की न केवल समीक्षा प्रस्तुत की है, बल्कि वह विश्व-दृष्टि भी सामने रखी है जिसे वे सही मानती हैं।</p> <p>सुमन गुप्ता ने भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद का विवेचन साधारण कुशलता से किया है लेकिन उनकी पद्धति निस्सन्देह विवादमूलक है, जिसके फलस्वरूप यह पुस्तक दर्शनशास्त्र के प्रति एक नई दृष्टि विकसित करने में सहायक होगी और जो पाठक दर्शनशास्त्र की सार्थकता को जीवन की यथार्थ समस्याओं से जोड़कर देखना चाहते हैं, उनके लिए यह निश्चय ही रोचक और पठनीय सिद्ध होगी।
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‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की इस सातवीं पुस्तक में डॉ. सुमन गुप्ता ने समकालीन दार्शनिक चिन्तन की दो मुख्य प्रवृत्तियों—भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद—का मार्क्सवादी दृष्टि से अध्ययन किया है। इन दोनों विचारधाराओं को उनके सही सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए, डॉ. गुप्ता ने इनकी प्रचलित व्याख्याओं पर प्रश्नचिह्न लगाया है। उनका तर्क है कि गूढ़ पारिभाषिक शब्दावली के आवरण में इन विचारधाराओं की अमूर्त तत्त्वमीमांसी प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है, जो एक सही विश्व-दृष्टि प्रस्तुत करने के स्थान पर यथार्थ को विरूपित करती है। भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों के दृष्टिकोण के विपरीत, डॉ. सुमन गुप्ता ने एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया है, जो न केवल इन चिन्तनधाराओं के विविध पक्षों का एकीकरण करता है बल्कि उनके सामाजिक यथार्थ की जड़ों में भी जाता है। सुमन गुप्ता ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों द्वारा प्रतिपादित मनुष्य की संकल्पना मनुष्य को एक ऐसे अमूर्त रूप में चित्रित करती है जो अपने सामाजिक क्रियाकलाप से अपना या अपने चारों ओर की दुनिया का रूपान्तरण करने में असमर्थ है।</p>
<p>डॉ. गुप्ता ने समकालीन दर्शन की इन दोनों प्रवृत्तियों की न केवल समीक्षा प्रस्तुत की है, बल्कि वह विश्व-दृष्टि भी सामने रखी है जिसे वे सही मानती हैं।</p>
<p>सुमन गुप्ता ने भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद का विवेचन साधारण कुशलता से किया है लेकिन उनकी पद्धति निस्सन्देह विवादमूलक है, जिसके फलस्वरूप यह पुस्तक दर्शनशास्त्र के प्रति एक नई दृष्टि विकसित करने में सहायक होगी और जो पाठक दर्शनशास्त्र की सार्थकता को जीवन की यथार्थ समस्याओं से जोड़कर देखना चाहते हैं, उनके लिए यह निश्चय ही रोचक और पठनीय सिद्ध होगी।
Book Details
-
ISBN9789394902985
-
Pages150
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसे विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। इस पुस्तक में प्रोफेसर सेन इस विवाद की तह में जाते हैं। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समानता किस चीज की होनी चाहिए।
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- Description: 2024 च्या लोकसभा निवडणुकीत कोणताही राजकीय पक्ष स्पष्टपणे जिंकला नाही आणि कोणाचा पूर्ण पराभवदेखील झाला नाही. हे नेमके झाले तरी कसे आणि मग जिंकले तरी कोण? अर्थातच, भारतीय मतदार जिंकले. कोट्यवधी मतदारांनी चारशे जागांचे स्वप्न पाहणाऱ्या सत्ताधारी पक्षाला ‘आस्ते कदम` चा इशारा दिला, तर आधीच्या दोन निवडणुकांमध्ये हतोत्साही झालेल्या विरोधकांना मतदारांनी नवी उमेद व उर्जा दिली. या समतोल जनादेशातून मतदार जिंकले हा निष्कर्ष, हे अनुमान किंवा विधान भाबडेपणातून केले आहे का? अर्थातच नाही. खंडप्राय भारतातील या लोकसभा निवडणूक निकालाचा लघुत्तम साधारण विभाज्य म्हणजे लसावि सांगतो की, मोठा निर्णायक राष्ट्रीय मुद्दा निवडणुकीत नसल्यामुळे देशातील 28 राज्ये व 8 केंद्रशासित प्रदेश मिळून छत्तीस प्रांतांमध्ये स्थानिक समीकरणेच प्रभावी ठरली. सोबतच, राज्यघटना बदलण्याची भीती, शेतकरी व तरुण मतदारांमधील नाराजी, गरिबी व महागाई अशा जगण्यामरण्याच्या मुद्द्यांवर लोकांनी सत्ताधाऱ्याांच्या विरोधात मतदान केले. या मतदानाचे, निकालाचे हे तर्कशास्त्र, संख्याशास्त्राच्या आधारे विश्लेषण सांगते की, ही लढाई निवडणूक जिंकण्याचे तंत्र आणि लोक यांच्यात झाली. निवडणूक जिंकण्याचे तंत्र बदलले, सुधारले तरी लोकांचे पाय जमिनीवरच आहेत. लोकशाहीचा उत्सव असे ज्याचे वर्णन केले जाते त्या देशाच्या अठराव्या सार्वत्रिक निवडणुकीत मतदारांनी दिलेल्या संदेशाचा सार हा की, आम्हाला गृहीत धरू नका. हा देश, हे प्रजासत्ताक आमचे आहे. - श्रीमंत माने
Socrates
- Author Name:
Arun Tiwari
- Book Type:

- Description: दुनिया भर के दार्शनिकों में सुकरात का विशिष्ट स्थान है। उनमें सोचने-समझने की क्षमता थी और वह सत्य एवं न्याय की खोज के प्रति दृढ़-संकल्प थे। वह मानते थे कि एक बेहतर विश्व की कल्पना तभी साकार हो सकती है, जब लोग समझदार एवं बुद्धिमान हों। हमें किसी दूसरे के विचारों को यूँ ही स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए, बल्कि उनको आलोचनात्मक तर्क की कसौटी पर परखना चाहिए। सुकरात के विचारों का अध्ययन आज अधिक उपयोगी एवं प्रासंगिक हो गया है। सुकरात की कही हुई बहुत सी बातों को बड़ी प्रसिद्धि मिली। उन्हीं में से एक है—‘बिना जाँचा-परखा जीवन जीने योग्य नहीं होता है।’ उनके प्रिय शिष्य प्लेटो ने कहा था, “उनके समय के जितने भी लोगों को हम जानते हैं, उनमें से वे सर्वश्रेष्ठ और सबसे बुद्धिमान तथा अत्यंत न्यायसंगत व्यक्ति थे।” विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों को सदाचारी बनने में सहायक होगी और वे सुकरात के विचारों से सीख लेकर अपने जीवन की विषम परिस्थितियों का सामना कुशलता से कर सकेंगे।
The Prince
- Author Name:
Niccolo Machiavelle
- Book Type:

- Description: वेत्तोरी को लिखे पत्र में मैकियावेली यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘इस छोटी-सी किताब को जब पढ़ा गया तो यह देखा गया होगा कि मैंने इन 15 सालों के दौरान शासन कला का कितना अध्ययन किया है। मैं न कभी सोया, न कभी निष्क्रिय रहा। हर आदमी इच्छा रखता है कि दूसरों की सेवा करके अनुभव प्राप्त किये व्यक्ति को अपनी सेवा में रखे। मेरी विश्वसनीयता पर किसी को कोई शक़ नहीं होना चाहिये, क्योंकि मैंने जो विश्वास एक बार जीता, उसको हमेशा बनाए रखा, तोड़ना नहीं सीखा। मैं अपने मालिक का भरोसेमंद और ईमानदार हूँ लेकिन उसकी फ़ितरत मैं नहीं बदल सकता। मेरी ग़रीबी मेरी ईमानदारी की गवाह है।’ यद्यपि लगभग चार शताब्दियों का ध्यान ‘द प्रिंस’ पर केंद्रित रहा है परंतु इसकी कुछ समस्याएँ अभी भी बहस के योग्य और दिलचस्प हैं क्योंकि शासकों और शासितों के बीच अनंत समस्याएँ हैं। यही आचार-विचार मैक्योवली के समकालीनों के भी हैं लेकिन नहीं कहा जा सकता कि यह सब नैतिकता यूरोप की पुरानी सरकारों में भी रही होगी। हमें आदर्श बल की बजाए उपलब्ध सामग्री पर भरोसा करना चाहिए। मैक्योवली जिस तरह से सरकार और आचरण के सिद्धांतों का वर्णन करते हैं, उससे घटनाएँ और व्यक्ति दिलचस्प हो जाते हैं।
Rajkahini-The Princely Tales of Rajasthan
- Author Name:
Abanindranath Tagore
- Rating:
- Book Type:

- Description: Rajkahini-The Princely Tales of Rajasthan is an English translation of Abanindranath Tagore's Bengali classic Rajkahini. It is a collection of nine stories that are replete with episodes and incidents involving the royalty of Rajasthan. Expectedly, therefore, bravery, nobility palace intrigues, wars, skirmishes, feuds betrayal, caste, religion, marriage, motherhood and progeny, all play a dynamic role as the fictionalized social and political history of early Rajasthan is unfurled. Authoring Rajkahini as a literary expression of the legends and tales of the Rajput kings can also be considered a part of the postcolonial action to etch out a narrative that could draw the far part of the nation closer to the Bengali readership.
Toofano Ke Beech
- Author Name:
Rangeya Raghav
- Book Type:

- Description: ‘तूफानों के बीच’ रांगेय राघव का मार्मिक रिपोर्ताज है। अपनी विशिष्ट वर्णन शैली और व्यापक मानवीय सरोकारों के चलते यह रचना अत्यन्त हृदयग्राही सिद्ध हुई है। रांगेय राघव ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘बंगाल का अकाल मानवता के इतिहास का बहुत बड़ा कलंक है। शायद क्लियोपेट्रा भी धन के वैभव और साम्राज्य की लिप्सा में अपने ग़ुलामों को इतना भीषण दुख नहीं दे सकीं, जितना आज एक साम्राज्य और अपने ही देश के पूँजीवाद ने बंगाल के करोड़ों आदमी, औरतों और बच्चों को भूखा मारकर दिया है। आगरे के सैकड़ों मनुष्यों ने दान नहीं, अपना कर्तव्य समझकर एक मेडिकल जत्था बंगाल भेजा था। जनता के इन प्रतिनिधियों को बंगाल की जनता ने ही नहीं, वरन् मंत्रिमंडल के सदस्यों तक ने धन्यवाद दिया था। किन्तु मैं जनता से स्फूर्ति पाकर यह सब लिख सका हूँ। मैंने यह सब आँखों-देखा लिखा है।’ एक पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक।
Bharat Mein Manavaadhikar
- Author Name:
Satya Narayan Sabat
- Book Type:

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Description:
मानवाधिकारों की अवधारणा वर्तमान सामाजिक विमर्शों में एक महत्त्वपूर्ण तथा सार्वदेशिक मूल्य का स्थान रखती है। 1215 ई. में पारित मैग्नाकार्टा के आरम्भिक स्वरूप से चलकर आज यह अवधारणा मौजूदा विश्व-सभ्यता का ठोस घटक बन चुकी है।
इस पुस्तक का उद्देश्य भारतीय संस्कृति में इस घटक की पहचान करना और यह देखना है कि हमारे इतिहास के विभिन्न चरणों में मानवाधिकारों की स्थिति क्या थी! मूलतः अध्यात्म-प्रमुख भारतीय संस्कृति के अनुसार मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है, जिसके साहचर्य में ही वह अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का निर्वाह करता है। ऋग्वेद में भी यह वर्णन आया है कि हम अपना सम्पूर्ण विकास सबके कल्याण को ध्यान में रखते हुए ही कर सकते हैं, और यही मानवाधिकार की अवधारणा की केन्द्रीय निष्ठा है।
प्राचीन समाज में हालाँकि मानव-अधिकारों की स्थिति इतनी स्पष्टता के साथ परिभाषित नहीं है, लेकिन यह सर्वमान्य है कि भारतीय समाज-व्यवस्था ने अपने समाज में व्यक्ति तथा समष्टि के परस्पर सन्तुलन के लिए कुछ नियमों या सिद्धान्तों का निर्धारण अवश्य किया था।
‘भारत में मानवाधिकार’ पुस्तक में प्राचीन हिन्दू धर्म-दर्शन में मानवाधिकारों की अभिकल्पना, जैन तथा बौद्ध धर्म व कौटिल्य के समय में मानवाधिकारों की अवस्थिति, मध्यकालीन युग और पुनर्जागरण के दौरान और उसके बाद के समय में मानवाधिकारों की दशा-दिशा का आकलन किया गया है। इसके साथ ही स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मानवाधिकारों को लेकर हमारी चेतना तथा उनके संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों की तथ्यपरक जानकारी भी दी गई है।
परिशिष्ट खंड में मानव अधिकार अधिनियम 1993, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (प्रक्रिया) विनियम-1994 तथा सूचना के अधिकार पर भी सामग्री दी गई है जो इस पुस्तक को और मूल्यवान बनाती है।
Nari Prasna
- Author Name:
Sarla Maheshwari
- Book Type:

- Description: नारी प्रश्न के असंख्य आयाम हैं। कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जो काल और स्थान की सीमाओं से बँधे हुए हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो काल के दीर्घ प्रवाह के बीच से चिरन्तन प्रश्नों के रूप में सामने आए हैं। काल और स्थान-निरपेक्ष ये प्रश्न हर देश के नारी समाज की मानवीय अस्मिता से जुड़े हुए हैं। एक वृहत्तर मानव समाज में ऐसे प्रश्नों की अपनी नारी-पहचान के बावजूद ये प्रश्न किसी संकीर्णता के द्योतक नहीं हैं, बल्कि वास्तविक अर्थों में मानव समाज को ही और अधिक मानवीय बनाने की निरन्तर जारी प्रक्रिया के अंग हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नारीवाद के अन्दर की अनेक परस्पर विरोधी धाराओं के बावजूद, नारी-मुक्ति और उससे जुड़े हुए मानव-मुक्ति के बहुत से महत्त्वपूर्ण प्रश्न इस संघर्ष के बीच से उभरकर सामने आए हैं। भारत का नारी आन्दोलन भी ऐसे तमाम प्रश्नों की अवहेलना नहीं कर सकता। सरला माहेश्वरी की यह पुस्तक हिन्दी में अपने क़िस्म की पहली पुस्तक है, जिसमें बहुत व्यापक और गहन अध्ययन के ज़रिए नारी आन्दोलन की अन्तरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि और उसके आधार पर निर्मित दृष्टि की रोशनी में नारी जीवन से जुड़े कई ज़रूरी सामाजिक प्रश्नों पर गम्भीरता से रोशनी डाली गई है।
Devnagari Jagat Ki Drishya Sanskriti
- Author Name:
Sadan Jha
- Book Type:

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Description:
“हिन्दी में सभ्यता-समीक्षा कम ही होती है और यह कहा जा सकता है कि यह हिन्दी में विचार और आलोचना की जो परम्परा रही है उससे विपथ होने जैसा है। इधर तो सारा समय हिन्दी में, जैसे कि अन्यत्र भी, देखने-दिखाने में ही बीतता है। इसके बावजूद अभी तक देवनागरी जगत में जो दृश्य संस्कृति विकसित हुई है उसका कोई सुचिन्तित अध्ययन नहीं हुआ है। सदन झा की यह पुस्तक इस सन्दर्भ में पहली ही है : उसमें समझ और जतन से, वैचारिक सघनता और खुलेपन से इस दृश्य संस्कृति के विभिन्न रूपों पर विचार किया गया है। निश्चय ही यह हिन्दी में चालू मानसिकता से अलग कुछ करने का ज़रूरी जोख़िम उठाने जैसा है। हम रज़ा पुस्तक माला में यह पुस्तक सहर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।”
—अशोक वाजपेयी
Europe Mein Darshanshastra : Bacon Se Marx Tak
- Author Name:
Satinath Chakravorty
- Book Type:

- Description: ‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की यह पुस्तक पुनर्जागरण एवं आधुनिक विज्ञान के उदय की चर्चा से प्रारम्भ होती है, और उस कालखंड की दार्शनिक प्रवृत्तियों का विवेचन प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक यूरोपीय दर्शनशास्त्र के इतिहास में अत्यन्त विचारोत्तेजक माना जाता है। यह विचित्र बात है कि उस समय के दर्शनशास्त्री एक तरफ़ तो विज्ञान से प्रतिबद्ध थे और दूसरी तरफ़ वे आधुनिक विज्ञान को सामने लानेवाली बूर्ज्वाजी के अन्तर्विरोधों की पड़ताल कर रहे थे। साथ ही, क्रान्ति के जो बीज स्वयं आधुनिक विज्ञान में निहित हैं, उनके प्रतिकार के लिए वे धर्म और आस्था का अन्ध-समर्थन भी कर रहे थे। लेखक ने इस पूरी प्रक्रिया पर विस्तार से विचार करते हुए दर्शनशास्त्रियों की मूलभूत विशेषताओं को उजागर किया है। बीच-बीच में इतिहास के कुछ प्रसंगों की चर्चा से यह पुस्तक और अधिक रोचक तथा पठनीय बन गई है। इसमें कई ऐसे विषयों पर भी विचार किया गया है, जिन पर अभी तक यूरोपीय दर्शनशास्त्र के अध्ययन में या तो ध्यान नहीं दिया गया था, और अगर ध्यान दिया गया तो उनसे कतरा जाने की प्रवृत्ति रही। संक्षेप में, यह पुस्तक वैज्ञानिक विचारधारा और विज्ञान एवं समाज के अन्तस्सम्बन्धों को समझने के लिए आवश्यक रूप से पठनीय है।
Bhaugolik Chintan Ki Navin Pravratiyan
- Author Name:
Poornima Shekhar Singh +1
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक में भूगोल विषय की संकल्पनात्मक, सैद्धान्तिक एवं क्रियाविधिक स्वरूप का विवेचन एवं विमर्श मुख्य रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के काल के सन्दर्भ में किया गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध भौगोलिक चिन्तन के विकास में मील का पत्थर है, क्योंकि इसके बाद विश्व के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक क्षितिज पर एक नए युग का सूत्रपात हुआ।
उपनिवेशवाद का चरमराता स्वरूप, स्वतंत्र देशों में नई सरकार एवं समाज के विकास के लिए नवीन सोच एवं उत्साह ने भौगोलिक चिन्तकों को भी इस बात की ओर सोचने के लिए प्रेरित किया कि विषय को जीवन्त एवं उपयोगी बनाने के लिए नई विचारधाराओं का विकास किया जाए। इसी पृष्ठभूमि में प्रत्यक्षवाद, मात्रात्मक क्रान्ति, व्यवहारवाद, उग्रसुधारवाद, मानववाद, कल्याणकारी भूगोल, उत्तर-आधुनिकतावाद आदि विचारधाराओं का विकास भूगोल में हुआ। भूगोल की इन्हीं नवीन प्रवृत्तियों का इस पुस्तक में विवेचन किया गया है।
यह कृति इस अर्थ में विलक्षण है कि भूगोल के सबसे गम्भीर पक्ष—‘भौगोलिक विचारधारा’ की नवीनतम प्रवृत्तियों पर नितान्त सुगम, परिष्कृत एवं प्रवाहपूर्ण ढंग से प्रकाश डाला गया है।
Bhrasth Satyam Jagat Mithya
- Author Name:
Sanjay Jhala
- Book Type:

- Description: Bhrasth Satyam Jagat Mithya
Bharatnama
- Author Name:
Sunil Khilnani
- Book Type:

- Description: आज के भारत की राजनीति का संभवतः सर्वश्रेष्ठ गैरऔपन्यासिक परिचय...-माइकल फुट, इवनिंग स्टैण्डर्ड भारत और उसकी समसामयिक परिस्थितियों पर कोई और किताब ही इससे अधिक गहनता के साथ बेहतर रौशनी डाल सके | - इयान जैक, ऑब्जर्वर इस शानदार किताब का मकसद कोई भविष्यवाणी करने के बजाय यह बताना है कि भारत अपनी मौजूदा हैसियत तक कैसे पहुँचा और उसका अंतर्निहित विचार कैसे विकसित हुआ | यह किताब आजादी के पचास साल बाद भारत की खूबियों और खामियों की तरफ इशारा करती है...उत्कृष्ट बौद्धिकता से समपन्न यह पुस्तक करीब ढाई सौ पृष्ठों में आधुनिक भारत की कई जटिलताओं की शिनाख्त करते हुए उनके उद्घाटन और व्याख्या में सफल होती है...इसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है |-डेविड गिलमूर, इंडिपेंडेंट ऑन सन्डे यह पुस्तक भारतीय राष्ट्र की परिभाषाओं को उजागर करती है...सभी तरह के रोमानी संस्कृतिवादियों और धार्मिक कट्टरपंथियों की दलीलों को कुशलता से परास्त कर देती है |- इयान वरुपा, न्यूयार्क रिव्यु ऑव बुक्स
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