Will For Children
Author:
Kailash SatyarthiPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 480
₹
600
Unavailable
Before I began working for children's rights, I constantly found myself struggling with a ‘why’.
Why are some children born to work at the cost of their freedom and childhood?
Why do the economic conditions of parents determine a child’s education and future?
Why are we employing children of the poor to make clothes and toys for children of the better-off?
My articles published in the 1980s helped raise critical questions on child labour, trafficking of children, sexual exploitation, the lack of education, and more.
This compilation of articles
has contributed towards laying
The theoretical foundation catalysed a mass movement for children's rights. Over the past
36 years, this movement has led
to the establishment of institutions
of governance, national and transnational policies for the protection of children, and the mainstreaming of child rights on the global development agenda.
As you have picked up this book, I sincerely hope you will exercise your right to ask questions and your willingness to help the children of the world.
—Kailash Satyarthi
“Once, a fire broke out in the forest.
All the birds and beasts, including the lion, the King of the Jungle, started running for their lives. In the midst of the chaos, the lion caught sight of a hummingbird flying towards the fire.
Shocked, the lion asked, “What are you trying to do?”
The hummingbird, indicating its beak, said, “I am carrying a drop of water to extinguish the fire.”
The lion was amused. It said, "How can you douse a fire with just a drop?
But the hummingbird was unshaken. It said: “I am doing my bit.”
During my Nobel acceptance speech, when I lost some papers, I was reminded of a story I then recounted to the audience.
Join me in my movement for children and do your bit, like the little, brave hummingbird.
—Kailash Satyarthi
ISBN: 9789386300300
Pages: 288
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Ravindra Kumar
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- Description: ‘‘रविन्द्र कुमार जी की कविताओं में जीवन के विविध रंग मिले हुए हैं। ‘इक्कीसवीं सीढ़ी’, ‘चौराहा’, ‘जड़ से जूझना, लहर से नहीं’, ‘ये चीख’, ‘सियार से भेड़ तक’, ‘सीमित-जीवन’, ‘मन’, ‘बढ़ते चंगुल’ तथा ‘धरती की कोख में’ आदि कविताएँ इन्हीं विविध रंगों की बानगी हैं। कवि के पास जीवन का व्यापक अनुभव है और सच पूछा जाए तो कविता की व्यापकता जीवन की व्यापकता के समानांतर ही चलती है; और चलनी भी चाहिए। रविन्द्र कुमारजी की कविताएँ किसी वाद या विचारधारा की गुलाम न होकर एक शुद्ध झरने की तरह हैं।’’ ‘‘संग्रह की कविता ‘एक सपना’ में कवि के शब्द—‘‘एक सपना/जो मुझे बार-बार कचोटता/मेरे मन को मरोड़ता/जल की सतह के ऊपर नीचे डुबोता’’ और ‘‘कोई ध्वनि घनघनाकर धुएँ सा देता/और अंत में/एक हल्की/छोटी सी ज्वाला दे/खत्म हो जाता/ ...कितना अच्छा होता/ जो तू रहता अभी तक!’’—देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलामजी के उन शब्दों की याद दिलाती है कि सपने वे नहीं होते, जो सोते हुए देखते हैं वरन् सपने वे होते हैं, जो आपको सोने नहीं देते। इसलिए कवि हमेशा सपनों के साथ रहना चाहता है। पाठक को थोड़ी गहराई में जाकर ही ऐसी कविताओं का भावार्थ समझ में आएगा। जीवन की जटिलताओं के बीच भी उम्मीद की कुछ हरियाली सदा मौजूद रहती है और जीवन में कुछ हासिल करने का, सपनों को पाने का यही रास्ता है। व्यक्ति के लिए भी, समाज के लिए भी और देश के लिए भी।’’ —प्रेमपाल शर्मा वरिष्ठ साहित्यकार, पूर्व संयुक्त सचिव, रेल मंत्रालय, नई दिल्ली
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