Prithvi Manthan : Vaishvik Bharat Banane Ki Kahani
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यह एक बेहतरीन किताब है...कक्षा में मैं इसका प्रयोग किसी और पुस्तक से ज़्यादा करता हूँ। —पी. साईनाथ; पत्रकार व लेखक प्रचार-हमला को चीरती हुई यह किताब बताती है कि आज क्या हो रहा है। —अमिताव घोष; लेखक यह आज के विरोधी-धाराओं का एक महत्त्वपूर्ण वृत्तान्त है...इस पक्ष को सुनना और समझना ज़रूरी है। —अरुणा रॉय; समाजकर्मी वैश्वीकरण के विशाल पुस्तक-संग्रह में यह किताब बौद्धिक साहस और ईमान का एक कीर्तिमान है जो बेहतर दुनिया के लिए रास्ता दिखाती है। —अमित भादुड़ी; अर्थशास्त्री आज अगर गाँधी जी ज़िन्दा होते और 'हिन्द स्वराज' की रचना करते, तो उन्हें लगभग उन्हीं सवालों से जूझना पड़ता जो इस किताब में हैं। —गणेश देवी; लेखक और भाषाविद् यह किताब दर्शाती है कि इस वैश्विक युग में हमारी तथाकथित स्वेच्छा वस्तुत: कितनी पराधीन है...आज की दुनिया से चिन्तित किसी भी इनसान के लिए यह पुस्तक अनिवार्य है। —मल्लिका साराभाई; नृत्यांगना और संस्कृतिकर्मी आज के वैश्विक युग की तमाम तब्दीलियों के परिप्रेक्ष्य में यह पुस्तक एक महत्त्वपूर्ण संश्लेषण है...साथ ही इस किताब में एक वैकल्पिक दुनिया की कल्पना की गई है जिस पर गम्भीरता से सोचने और बहस करने की ज़रूरत है। —माधव गाडगिल; पर्यावरणशास्त्री यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और असरदार किताब है...लेखक जो व्यापक प्रमाण पेश करता है उसका हमें सामना करना होगा। —हर्ष मंदर; समाजकर्मी
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यह एक बेहतरीन किताब है...कक्षा में मैं इसका प्रयोग किसी और पुस्तक से ज़्यादा करता हूँ।
—पी. साईनाथ; पत्रकार व लेखक
प्रचार-हमला को चीरती हुई यह किताब बताती है कि आज क्या हो रहा है।
—अमिताव घोष; लेखक
यह आज के विरोधी-धाराओं का एक महत्त्वपूर्ण वृत्तान्त है...इस पक्ष को सुनना और समझना ज़रूरी है।
—अरुणा रॉय; समाजकर्मी
वैश्वीकरण के विशाल पुस्तक-संग्रह में यह किताब बौद्धिक साहस और ईमान का एक कीर्तिमान है जो बेहतर दुनिया के लिए रास्ता दिखाती है।
—अमित भादुड़ी; अर्थशास्त्री
आज अगर गाँधी जी ज़िन्दा होते और 'हिन्द स्वराज' की रचना करते, तो उन्हें लगभग उन्हीं सवालों से जूझना पड़ता जो इस किताब में हैं।
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—मल्लिका साराभाई; नृत्यांगना और संस्कृतिकर्मी
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—माधव गाडगिल; पर्यावरणशास्त्री
यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और असरदार किताब है...लेखक जो व्यापक प्रमाण पेश करता है उसका हमें सामना करना होगा।
—हर्ष मंदर; समाजकर्मी
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2016
- Weight
- 212 grams
- ISBN-13
- 9788126729388
- Pages
- 204
- Reading time
- ~7 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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'अनुपम मिश्र एक अत्यन्त विनम्र, निरभिमानी व्यक्ति थे जिन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में साधारण और सामुदायिक विवेक और विधि का जैसा अवगाहन किया वैसा आधुनिक टेकनॉलजी के दुश्चक्र में फँसे अन्य पर्यावरणविद् अकसर नज़रन्दाज़ करते रहे हैं। अनुपम जी लगभग ज़िद कर अपनी इस धारणा पर डटे रहे कि साधारण लोग और समुदाय पढ़े-लिखों से ज़्यादा जानता-समझता है और आधुनिकता को अपनी सर्वज्ञता के दम्भ से मुक्त हो सकना चाहिए। उनसे बातचीत का यह संचयन इस अनूठे व्यक्ति के सोच-विचार की नई परतें सहजता से खोलेगा, ऐसा हमारा विश्वास है।" —अशोक वाजपेयी
Social Concepts in Rural India
- Author Name:
Dr. Abhishek Chauhan +2
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This book on Rural Development in India comprises of eight units which focus to reconstruct the importance of villages in India since time immemorial. The authors have very well tried their level best to provide a historical and conceptual clarity on various aspects of Indian villages. The authors have discussed about the types and characteristics of Indian villages with focus on theoretical concepts like—Sanskritisation, Westernisation, Globalisation, Tribe-Caste-Continum. Focus has also been made on the practice of Jajmani System within the Indian villages. Above all the well-defined and chronological sequence of Indian village studies has been explained in this book.
Manav Upayogi Ped
- Author Name:
Ramesh Bedi
- Book Type:

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जल, जंगल, ज़मीन निस्सन्देह मानव जीवन के आधार हैं। हमें शुद्ध वायु पेड़-पौधे ही उपलब्ध कराते हैं। लेकिन बढ़ते शहरीकरण के चलते पेड़-पौधों की उपेक्षा की गई और जंगल कटते चले गए जिसका ख़मियाजा मनुष्य असाध्य बीमारियों से लड़ते हुए भर रहा है। रामेश बेदी प्रकृति के विशेषज्ञ लेखक थे। यह पुस्तक विभिन्न पेड़ों की विभिन्न विशेषताओं से पाठक का परिचय कराती है। इसमें मानव उपयोगी 8 वृक्षों—अर्जुन, चालमुग्रा, खैर, तुवरक, गाइनोकार्डिआ, भिलावा, गोरख इमली तथा हरड़ का वर्णन किया गया है। पुस्तक में पेड़ों के विविध भाषाओं में नाम, उनकी पहचान, उनका प्राप्ति-स्थान, उनकी कृषि, रासायनिक संघटन, घरेलू दवा-दारू में उपयोग तथा औद्योगिक उपयोग आदि की जानकारी दी गई है। वृक्षों का स्वरूप बताने के लिए रेखाचित्रों तथा तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है, जो पुस्तक को पठनीय बनाते हैं। पुस्तक न सिर्फ़ पेड़-पौधों में रुचि रखनेवालों, आयुर्वेद व यूनानी के अध्येताओं, अनुसन्धानकर्त्ताओं, वन-अधिकारियों व वन-कर्मियों, फ़ार्मेसियों, कच्ची जड़ी-बूटियों के व्यापारियों के लिए उपयोगी है, वरन् आम जन के लिए स्वस्थ जीने के नुस्ख़े भी मुहैया कराती है।
Mewat Ka Johad
- Author Name:
Rajendra Singh
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मेवात कैसे बना? मेवात का जनमानस आज क्या चाहता है? क्या कर रहा है? मेवात के संकट से जूझते लोग, बाज़ार की लूट, पानी और खेती की लूट रोकने की दिशा में हुए काम–––क़ुदरत की हिफ़ाज़त के काम हैं। इन क़ुदरती कामों में आज भी महात्मा गांधी की प्रेरणा की सार्थकता है। युगपुरुष बापू के चले जाने के बाद भी युवाओं द्वारा उनसे प्रेरित होकर ग्राम स्वराज, ग्राम स्वावलम्बन के रचनात्मक कार्यों से लेकर सत्याग्रह तक की चरणबद्ध दास्तान इस पुस्तक में है। यह पुस्तक देश–दुनिया और मेवात को बापू के जौहर से प्रेरित करके सबकी भलाई का काम जोहड़ बनाने–बचाने पर राज–समाज को लगाने की कथा है; जौहर से जोहड़ तक की यात्रा है। यह पुस्तक आज के मेवात का दर्शन कराती है। इसमें जोहड़ से जुड़ते लोग, पानी की लूट रोकने का सत्याग्रह, मेवात के 40 शराब कारख़ाने बन्द कराना तथा मेवात के पानीदार बने गाँवों का वर्णन है। मेवात के पानी, परम्परा और खेती का वर्णन बापू के जौहर से जोहड़ तक किया गया है। बापू क़ुदरत के करिश्मे को जानते और समझते थे। इसलिए उन्होंने कहा था, “क़ुदरत सभी की ज़रूरत पूरी कर सकती है लेकिन एक व्यक्ति के लालच को पूरा नहीं कर सकती है।” वे क़ुदरत का बहुत सम्मान करते थे। उन्हें माननेवाले भी क़ुदरत का सम्मान करते हैं। मेवात में उनकी कुछ तरंगें काम कर रही थीं। इसलिए मेवात में समाज–श्रम से जोहड़ बन गए। मेवात में बापू का जौहर जारी है। यह पुस्तक बापू के जौहर को मेवात में जगाने का काम करती है।
Ek Tha Zanskar : SuvaranKhudaiya Chiunton Ka Des
- Author Name:
Ajoy Sodani
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अजय सोडानी प्रकृति की यात्रा करते हैं, लेकिन वे सिर्फ़ यात्रा नहीं करते—वे एक पक्षधर यात्रा करते हैं। एक ऐसी यात्रा जो प्रकृति के पवित्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, और यह जानने के लिए आरम्भ होती है कि मनुष्य ने प्रकृति की इतनी विराट सभ्यता के ठीक मुक़ाबले पर अपनी यह सभ्यता खड़ी की तो क्यों, जिसमें सब तरफ क्षरण ही क्षरण है। वे प्रकृति के वकील की हैसियत से अपना झोला उठाते हैं। यह यात्रा-कथा है जाँस्कर की जहाँ आज 2900 हेक्टेयर में खेती होती है और कुल जनसंख्या है 13773। लद्दाख का यह हिस्सा न तो हमलावरों की नज़र में ज़्यादा पड़ा, न भारत आने वाले मुसाफ़िरों की। इसलिए वह विकास की मार से भी बचा रहा, अपनी जीवन शैली और संस्कृति के साथ। रेत के नीचे से सोना खोदने वाले चींटे भी अपना काम करते रहे यानी यहाँ से जुड़ी कथाएँ भी दूर देश के सैलानियों को आकर्षित करती रहीं। मंथर गति में एक समूचा जीवन जीने वाले जाँस्कर का यह सफ़र जुलाई 2013 में किया गया, जिसके बाद यात्रावृत्तकार को कहना पड़ा कि ‘नवपाषाण युग जैसे अभी-अभी ही व्यतीत हुआ हो इधर से।’ हिमालय की बर्फ़ीली दुनिया के इस यात्रावृत्त में रोमांच जितना है, उतने ही इतिहास और संस्कृति के हवाले भी हैं, कथाएँ-उपकथाएँ भी हैं। अर्थात इस पुस्तक को पढ़कर जब आप अपनी दुनिया में लौटते हैं तो सिर्फ़ दृश्यों के, जोखिमों के, थकानों और आश्चर्यों के दृश्य आपके साथ नहीं होते, ढेरों नए तथ्य और तर्क भी होते हैं। साथ ही सफ़रगोई की वह ताज़गी, कहन की वह रवानी भी जो अजय सोडानी की अपनी ईजाद है।
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