Sundar Ke Swapn
Author:
Dalpat Singh RajpurohitPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 636
₹
795
Available
सुन्दरदास आरम्भिक आधुनिक हिन्दी के ऐसे कवि थे जिन्होंने संस्कृत के सुभाषितों, वेदान्त की दार्शनिक उक्तियों, ब्रह्म-वाक्यों और उत्तर भारत में प्रचलित विभिन्न बोलियों की कहावतों और मुहावरों का व्यापक प्रयोग अपनी कविता में किया। संस्कृत की शास्त्रीय परम्परा के साथ-साथ उनकी पकड़ ब्रजभाषा की रीति-कविता पर भी साफ़ दिखाई देती है लेकिन उसका प्रयोग उन्होंने अलग ढंग से किया।</p>
<p>उनके लिए आत्मानुभव किसी भी दर्शन से अधिक महत्त्वपूर्ण था। उनकी कविता विश्वव्यापी ब्रह्म-सत्य की खोज की कविता है, और उनकी भक्ति एक सतत यात्रा।</p>
<p>उनकी कविता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि उसमें मारवाड़ क्षेत्र की वणिक संस्कृति के अत्यन्त सजीव बिम्ब हमें मिलते हैं। अकसर अकाल की ज़द में रहने वाले और बंजर मरुस्थली क्षेत्र को उन्होंने आध्यात्मिक आधार पर एक नवीन और विशिष्ट अर्थ दिया। प्रमाण उपलब्ध हैं कि उनकी कविता की पहुँच संत समुदाय से बाहर व्यापारी और दरबारी वर्ग तक थी। जयपुर के सिटी पैलेस म्यूज़ियम में संरक्षित उनकी एक पांडुलिपि पर मुग़ल बादशाह औरंगजेब की मुहर भी मिलती है।</p>
<p>यह पुस्तक दादूपंथ के इतिहास और उसके सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के साथ-साथ सुन्दरदास के व्यक्तित्व और कृतित्व का विस्तृत और विचारोत्तेजक विवेचन करती है। उनके शिल्प, काव्य-दृष्टि और आध्यात्मिक विशिष्टताओं के विश्लेषण के अलावा इसमें भक्ति के लोकवृत्त और हिन्दी की आरम्भिक तथा अपनी आधुनिकता के तत्त्वों को भी रेखांकित किया गया है।
ISBN: 9789394902039
Pages: 240
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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इस नए ढंग के व्यवहार–कोश में पाठकों को अपनी हिन्दी निखारने के लिए हज़ारों शब्दों के बारे में बहुपक्षीय भाषा–सामग्री मिलेगी। इसमें वर्तनी की व्यवस्था मिलेगी, उच्चारण के संकेत–बिन्दु मिलेंगे, व्युत्पत्ति पर टिप्पणियाँ मिलेंगी, व्याकरण के तथ्य मिलेंगे, सूक्ष्म अर्थभेद मिलेंगे, पर्याय और विपर्याय मिलेंगे, संस्कृत का आशीर्वाद मिलेगा, उर्दू और अंग्रेज़ी का स्वाद मिलेगा, प्रयोग के उदाहरण मिलेंगे, शुद्ध–अशुद्ध का निर्णय मिलेगा।
पुस्तक की शैली ललित निबन्धात्मक है। इसमें कथ्य को समझाने और गुत्थियों को सुलझाने के दौरान कठिन और शुष्क अंशों को सरल और रसयुक्त बनाने के लिहाज़ से मुहावरों, लोकोक्तियों, लोकप्रिय गानों की लाइनों, कहानी–क़िस्सों, चुटकुलों और व्यंग्य का भी सहारा लिया गया है। नमूने देखिए, स्त्रीलिंग ‘दाद’ (प्रशंसा) सब को अच्छी लगती है, पर पुर्लिंग ‘दाद’ (चर्मरोग) केवल चर्मरोग के डॉक्टरों को अच्छा लगता है।…‘मैल, मैला, मलिन’ सब ‘मल’ के भाई–बन्धु हैं…(‘साइकिल’ को) ‘साईकील’ लिखनेवाले महानुभाव तो किसी हिन्दी–प्रेमी के निश्चित रूप से प्राण ले लेंगे—दुबले को दो असाढ़। ...अरबी का ‘नसीब’ भी ‘हिस्सा’ और ‘भाग्य’ दोनों है। उदाहरण—आपके नसीब में ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं। (जबकि मेरे नसीब में मेरी पत्नी हैं।)
यह पुस्तक हिन्दी के हर वर्ग और स्तर के पाठक के लिए उपयोगी है।
Kuchh Sahitya Charcha Bhi
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

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Description:
श्रीलाल शुक्ल प्रसिद्ध व्यंग्य-लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने व्यंग्य का विपुल, विविध और बहुआयामी उपयोग किया है। वे उन थोड़े से भारतीय लेखकों में हैं, जिन्होंने गद्य को एक नया जीवन दिया है। उनके व्यंग्य से इतर गद्य की श्रेष्ठता का परिचय कराती है—‘कुछ साहित्य चर्चा भी’।
यह पुस्तक तीन खंडों में विभाजित है, जिनमें श्रीलाल शुक्ल के समीक्षात्मक लेख, संभाषण, व्याख्यान और साक्षात्कार संगृहीत हैं। पढ़ीस, कबीर, निराला, यशपाल, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, निर्मल वर्मा, रमेशचन्द्र शाह, कुँवर नारायण, गिरिराज किशोर, श्रीराम वर्मा और नासिरा शर्मा के लेखन के बहाने श्रीलाल शुक्ल पूर्व और वर्तमान की सभ्यता-समीक्षा करते चलते हैं। समय और समाज के हर परिवर्तन-परिवर्द्धन पर उनकी दृष्टि जाती है।
श्रीलाल शुक्ल की रचनाशीलता आलोचनात्मक विवेक से प्रेरित, संचालित और संयमित रही है। वे ख़ूब पढ़नेवाले और पढ़े हुए पर अपनी राय बनानेवाले लेखकों में माने जाते थे। उन्हें सुनना भी एक अद्भुत अनुभव होता था। पुस्तक में शामिल संभाषणों और व्याख्यानों से यह अनुमान लगाया जा सकता है। पुस्तक में शामिल साक्षात्कार में श्रीलाल शुक्ल खुलकर सामने आते हैं और सामाजिक-राजनीतिक विमर्शकार सिद्ध होते हैं। गायिका गिरिजा देवी और कथावाचक पंडित राधेश्याम पर केन्द्रित लेखों में जहाँ लेखक की दूसरी रुचियाँ भी सामने आती हैं, वहीं ‘राग दरबारी संस्मरण’, ‘मेरी कथा यात्रा के कुछ मोड़’, ‘साहित्य के लिए मेरी कसौटी’ आदि आलेखों में श्रीलाल शुक्ल आत्मसमीक्षा करते प्रतीत होते हैं।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की तरह श्रीलाल शुक्ल साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखते हैं। यह पुस्तक उनकी सृजनात्मक दुनिया को भली-भाँति जानने और समझने का अवसर उपलब्ध कराती है।
Manav Samaz
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
- Book Type:

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Description:
मानव समाज से अलग नहीं रह सकता था, अलग रहने पर उसे भाषा से ही नहीं, चिन्तन से भी नाता तोड़ना पड़ता, क्योंकि चिन्तन ध्वनिरहित शब्द है। मनुष्य की हर एक गति पर समाज की छाप है। बचपन से ही समाज के विधि-निषेधों को हम माँ के दूध के साथ पीते हैं, इसलिए हम उनमें से अधिकांश को बंधन नहीं भूषण के तौर पर ग्रहण करते हैं, किन्तु वह हमारे कायिक, वाचिक कर्मों पर पग-पग पर अपनी व्यवस्था देते हैं, यह उस वक़्त मालूम हो जाता है, जब हम किसी को उनका उल्लंघन करते देख उसे असभ्य कह डालते हैं।
सीप में जैसे सीप प्राणी का विकास होता है, उसी प्रकार हर एक व्यक्ति का विकास उसके सामाजिक वातावरण में होता है। मनुष्य की शिक्षा-दीक्षा अपने परिवार, ठाठ-बाट, पाठशाला, क्रीड़ा तथा क्रिया के क्षेत्र में और समाज द्वारा विकसित भाषा को लेकर होती है।
‘मानव समाज’ हिन्दी में अपने ढंग की अकेली पुस्तक है। हिन्दी और बांग्ला पाठकों के लिए यह बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है।
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