Ramcharitmanas (Sahityik Mulyankan)

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Author:

Sudhakar Pandey

Language:

Hindi

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जनसाधारण से लेकर उद्भट विद्वानों तक में अगर समान भाव से कोई ग्रन्थ प्रतिष्ठित है तो वह है तुलसी का <strong>‘</strong>रामचरितमानस<strong>’</strong>। अपनी काव्यगत श्रेष्ठता<strong>, </strong>मूल्यबोध की समग्रता और प्रभावशीलता तथा मानव की चिरन्‍तन गुत्थियों<strong>, </strong>पीड़ाओं व ख़ुशियों के जीवन्त चित्रण के कारण यह महाकाव्य हर पीढ़ी को एक नए ढंग से अपनी ओर खींचता है। हर युग उसमें अपने हर्ष-विषाद का कोई-न-कोई चित्र पा लेता है। और बार-बार नई-नई व्याख्याओं-टीकाओं के सहारे इसे समझने की कोशिश की जाती है।</p> <p>लेकिन अपने दायरे में उन सब प्रयासों की अपनी एक सीमा रही है। इस पुस्तक में एकांगिता से बचने और <strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> की यथासम्भव सम्पूर्ण व्याख्या तक पहुँचने की कोशिश की गई है। सम्पादक का भरसक प्रयास रहा है कि जहाँ तक हो सके<strong>,</strong> अच्छे-से-अच्छे निबन्धों का चुनाव हो ताकि ‘मानस’ के छात्रों-शोधार्थियों के अलावा सुरुचिवान् सामान्य पाठक भी इससे लाभान्वित हों। कोशिश यह भी रही है कि <strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> के शिल्प<strong>, </strong>विषय-वस्तु<strong>, </strong>चरित्र-योजना<strong>, </strong>उसके काव्यगत वैशिष्ट्य<strong>, </strong>रस-व्यंजना<strong>, </strong>उसमें निहित तत्कालीन सांस्कृतिक<strong>, </strong>सामाजिक मूल्यों समेत उन सभी पक्षों से सम्बद्ध निबन्ध शामिल हों<strong>, </strong>जिन पर <strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> के सम्बन्ध में किसी की भी नज़र जा सकती है।</p> <p><strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> के जीवन-मूल्यों के मनोवैज्ञानिक पहलू और तुलसी व वाल्मीकि का तुलनात्मक विवेचन जैसे कुछ अप्रचलित और कतिपय नवीन निबन्धों को भी इसमें सम्मिलित किया गया है।

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ISBN
9788171194391
Pages
245
Avg Reading Time
8 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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जनसाधारण से लेकर उद्भट विद्वानों तक में अगर समान भाव से कोई ग्रन्थ प्रतिष्ठित है तो वह है तुलसी का <strong>‘</strong>रामचरितमानस<strong>’</strong>। अपनी काव्यगत श्रेष्ठता<strong>, </strong>मूल्यबोध की समग्रता और प्रभावशीलता तथा मानव की चिरन्‍तन गुत्थियों<strong>, </strong>पीड़ाओं व ख़ुशियों के जीवन्त चित्रण के कारण यह महाकाव्य हर पीढ़ी को एक नए ढंग से अपनी ओर खींचता है। हर युग उसमें अपने हर्ष-विषाद का कोई-न-कोई चित्र पा लेता है। और बार-बार नई-नई व्याख्याओं-टीकाओं के सहारे इसे समझने की कोशिश की जाती है।</p>
<p>लेकिन अपने दायरे में उन सब प्रयासों की अपनी एक सीमा रही है। इस पुस्तक में एकांगिता से बचने और <strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> की यथासम्भव सम्पूर्ण व्याख्या तक पहुँचने की कोशिश की गई है। सम्पादक का भरसक प्रयास रहा है कि जहाँ तक हो सके<strong>,</strong> अच्छे-से-अच्छे निबन्धों का चुनाव हो ताकि ‘मानस’ के छात्रों-शोधार्थियों के अलावा सुरुचिवान् सामान्य पाठक भी इससे लाभान्वित हों। कोशिश यह भी रही है कि <strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> के शिल्प<strong>, </strong>विषय-वस्तु<strong>, </strong>चरित्र-योजना<strong>, </strong>उसके काव्यगत वैशिष्ट्य<strong>, </strong>रस-व्यंजना<strong>, </strong>उसमें निहित तत्कालीन सांस्कृतिक<strong>, </strong>सामाजिक मूल्यों समेत उन सभी पक्षों से सम्बद्ध निबन्ध शामिल हों<strong>, </strong>जिन पर <strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> के सम्बन्ध में किसी की भी नज़र जा सकती है।</p>
<p><strong>‘</strong>मानस<strong>’</strong> के जीवन-मूल्यों के मनोवैज्ञानिक पहलू और तुलसी व वाल्मीकि का तुलनात्मक विवेचन जैसे कुछ अप्रचलित और कतिपय नवीन निबन्धों को भी इसमें सम्मिलित किया गया है।

Book Details

  • ISBN
    9788171194391
  • Pages
    245
  • Avg Reading Time
    8 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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