🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Kahani : Vastu Aur Antarvastu

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

हिन्दी में कहानी-आलोचना पर्याप्त समृद्ध और बहुआयामी होते हुए भी आलोचना की मुख्यधारा में अनादृत ही रही है। हिन्दी में केवल कथाकार या कहानीकार तो बहुत-से मिल जाएँगे लेकिन केवल कथा या कहानी का आलोचक ढूँढ़ने पर बहुत मुश्किल से ही मिल पाएगा। जो दो-चार कहानी-आलोचक हमारे यहाँ रहे या हैं भी तो उनका कार्य इतना सीमित और कालबद्ध रहा है कि उससे कहानी-आलोचना की कोई सामान्य सैद्धान्तिकी निर्मित हो पाना सम्भव नहीं हो पाया। हिन्दी की कहानी-समीक्षा पर अधिकांशतः एक आरोप यह लगाया जाता रहा है कि उसके प्रतिमान कविता-समीक्षा के क्षेत्र से आयत्त किए जाते हैं, हिन्दी-आलोचना के पास कहानी-समीक्षा के ऐसे प्रतिमान लगभग न के बराबर हैं, जो कहानी को कहानी की तरह देख सकें, जो नितरां कहानी-विधा के और उसी के लिए हों। फ़िलहाल यह कहना पर्याप्त होगा कि एक कहानी की समीक्षा एक कहानी की तरह ही की जानी चाहिए, उसे कविता या उपन्यास की तराजू में नहीं चढ़ा देना चाहिए। कविता और उपन्यास के प्रतिमानों से यदा-कदा मदद तो ली जा सकती है, एक सप्लीमेंट के रूप में उनका उपयोग तो किया जा सकता है लेकिन कहानी-समीक्षा की असल ज़मीन तो स्वयं कहानी-विधा के संघटक तत्त्वों से ही निर्मित की जा सकती है। परम्परा में इस असल ज़मीन की पहचान कई बार की भी गई है। जहाँ नहीं है, या कहीं कोई चीज़ छूट गई है तो नए प्रयोगों द्वारा उसकी सम्भावनाओं की तलाश की जा सकती है। इससे परम्परा का मूल्यांकन भी होगा और आगे के नए रास्ते भी खुलेंगे।

Read more

₹ 795

636 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Kahani : Vastu Aur Antarvastu This book ₹636
Adhyatmik Guruon Ke Prerak Vichar Swati Gautam ₹250
3 books selected ₹1,345 ₹1,186
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

हिन्दी में कहानी-आलोचना पर्याप्त समृद्ध और बहुआयामी होते हुए भी आलोचना की मुख्यधारा में अनादृत ही रही है। हिन्दी में केवल कथाकार या कहानीकार तो बहुत-से मिल जाएँगे लेकिन केवल कथा या कहानी का आलोचक ढूँढ़ने पर बहुत मुश्किल से ही मिल पाएगा। जो दो-चार कहानी-आलोचक हमारे यहाँ रहे या हैं भी तो उनका कार्य इतना सीमित और कालबद्ध रहा है कि उससे कहानी-आलोचना की कोई सामान्य सैद्धान्तिकी निर्मित हो पाना सम्भव नहीं हो पाया।

हिन्दी की कहानी-समीक्षा पर अधिकांशतः एक आरोप यह लगाया जाता रहा है कि उसके प्रतिमान कविता-समीक्षा के क्षेत्र से आयत्त किए जाते हैं, हिन्दी-आलोचना के पास कहानी-समीक्षा के ऐसे प्रतिमान लगभग न के बराबर हैं, जो कहानी को कहानी की तरह देख सकें, जो नितरां कहानी-विधा के और उसी के लिए हों। फ़िलहाल यह कहना पर्याप्त होगा कि एक कहानी की समीक्षा एक कहानी की तरह ही की जानी चाहिए, उसे कविता या उपन्यास की तराजू में नहीं चढ़ा देना चाहिए।

कविता और उपन्यास के प्रतिमानों से यदा-कदा मदद तो ली जा सकती है, एक सप्लीमेंट के रूप में उनका उपयोग तो किया जा सकता है लेकिन कहानी-समीक्षा की असल ज़मीन तो स्वयं कहानी-विधा के संघटक तत्त्वों से ही निर्मित की जा सकती है। परम्परा में इस असल ज़मीन की पहचान कई बार की भी गई है। जहाँ नहीं है, या कहीं कोई चीज़ छूट गई है तो नए प्रयोगों द्वारा उसकी सम्भावनाओं की तलाश की जा सकती है। इससे परम्परा का मूल्यांकन भी होगा और आगे के नए रास्ते भी खुलेंगे।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2013
Weight
386 grams
ISBN-13
9788183615860
Pages
216
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22.5 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp