Kargil: A Saga of Sacrifice & Heroism
Author:
Rishi RajPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
This book is a great tribute to our brave soldiers who fought fiercely in the Kargil War. In this book, you will know about the lives of various Kargil heroes such as Captain Saurabh Kalia, Captain Vijyant Thapar, Captain Vikram Batra, Captain Manoj Pandey, and many other young soldiers who had sacrificed their lives for the pride of Mother India. You will learn how our nerves had refused to admit defeat, even under adverse conditions and now they turned the tables on Pakistan no had assumed the war to be already won. in this book, the author Is also sharing his experience of meeting the families of the martyrs.
The Kargil war was an outcome of Pakistan's betrayal as they had used Stealth to occupy 150 posts located along the 160 Km long Line of Control. This book also sheds light on our political and diplomatic victory and various other aspects of the Kargil War like the refusal of both China and the United States to provide any support to the Pakistani forces. This book Is an attempt by the author to keep alive the memories of all those martyrs, who laid their lives in the service of nation.
ISBN: 9789355214782
Pages: 212
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘कामायनी : एक पुनर्विचार’, समकालीन साहित्य के मूल्यांकन के सन्दर्भ में, नए मूल्यों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। उसके द्वारा मुक्तिबोध ने पुरानी लीक से एकदम हटकर प्रसाद जी की ‘कामायनी’ को एक विराट फ़ैंटेसी के रूप में व्याख्यायित किया है, और वह भी इस वैज्ञानिकता के साथ कि उस प्रसिद्ध महाकाव्य के इर्द-गिर्द पूर्ववर्ती सौन्दर्यवादी-रसवादी आलोचकों द्वारा बड़े यत्न से कड़ी की गई लम्बी और ऊँची प्राचीर अचानक भरभराकर ढह जाती है।
मुक्तिबोध द्वारा प्रस्तुत यह पुनर्मूल्यांकन बिलकुल नए सिरे से ‘कामायनी’ की अन्तरंग छानबीन का एक सहसा चौंका देनेवाला परिणाम है। इसमें मनु, श्रद्धा और इडा जैसे पौराणिक पात्र अपनी परम्परागत ऐतिहासिक सत्ता खोकर विशुद्ध मानव-चरित्र के रूप में उभरते हैं और मुक्तिबोध उन्हें इसी रूप में आँकते और वास्तविकता को पकड़ने का प्रयास करते हैं। उन्होंने वस्तु-सत्य की परख के लिए अपनी समाजशास्त्रीय ‘आँख’ का उपयोग किया है और ऐसा करते हुए वह ‘कामायनी’ के मिथकीय सन्दर्भ को समकालीन प्रासंगिकता से जोड़ देने का अपना ऐतिहासिक दायित्व निभा पाने में समर्थ हुए हैं।
‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ व्यावहारिक समीक्षा के क्ष्रेत्र में एक सर्वथा नवीन विवेचन-विश्लेषण-पद्धति का प्रतिमान है। यह न केवल ‘कामायनी’ के प्रति सही समझ बढ़ाने की दिशा में नई दृष्टि और नवीन वैचारिकता जगाता है, बल्कि इसे आधार-ग्रन्थ मानकर मुक्तिबोध की कविता को और उनकी रचना-प्रक्रिया को भी अच्छे ढंग से समझा जा सकता है।
Hindi Navjagaran Ka Aarthik Chintan
- Author Name:
Jay Singh Neerad
- Book Type:

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Description:
हिन्दी नवजागरण भारतीय नवजागरण से प्रेरित और प्रभावित होते हुए भी इस दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण है कि वह हिन्दी पट्टी के सामाजिक-सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जनजागरण का वाहक बना रहा। विशेष रूप से सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में ही उसकी विवेचना भी की गई लेकिन पता नहीं क्यों विद्वानों का ध्यान इस वास्तविकता की ओर नहीं गया कि हिन्दी पट्टी में सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण के साथ जो स्वातंत्र्य आन्दोलन परवान चढ़े उनके मूल में विद्यमान हिन्दी नवजागरण का आर्थिक चिन्तन उनकी अपरिहार्य प्रेरणा-भूमि है। इस दौर के अधिकांश लेखकों और साहित्यकारों ने राष्ट्रीय और सामाजिक उद्देश्यों के लिए अपने आर्थिक चिन्तन को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इस आर्थिक चिन्तन को आत्मसात किए बिना हिन्दी नवजागरण को सम्पूर्णता से नहीं समझा जा सकता।
इस पुस्तक में लेखक ने हिन्दी नवजागरण के आर्थिक चिन्तन के अनुशीलन का प्रयास किया है। इस चिन्तन को आधुनिक युग के आर्थिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ने की कोशिश भी की गई है। इस अध्ययन से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि उत्तर भारत के स्वातंत्र्य आन्दोलनों और सामाजिक जागरण को औपनिवेशिक शासन द्वारा किए गए भारतीयों के आर्थिक शोषण ने अपने ढंग से प्रेरित और प्रभावित किया। यही कारण है कि तत्कालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य भी इस आर्थिक चिन्तन से अनिवार्यतः जुड़ा रहा है।
वर्तमान में यह आवश्यक है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था को हिन्दी नवजागरणकालीन औपनिवेशिक शोषण के परिप्रेक्ष्य में भी समझा जाए। यह पुस्तक इसी दिशा में पहल करने का एक प्रयास है।
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