Nai Dunia Ki Ore
Author:
V.K. SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 479.2
₹
599
Available
बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में, नवउदारवाद के पैरोकारों ने इतिहास और विचारधारा के अन्त की घोषणा की थी। समाजवाद के सोवियत प्रयोगों के विफल होने के बाद की गई वह घोषणा पूँजीवाद की ‘अपराजेयता’ का दावा था कि उसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन उसी समय दुनिया के विभिन्न हिस्सों से प्रतिरोध की नई-नई आवाजें सुनाई देने लगीं और नए-नए आन्दोलन उठने लगे। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि पूरी दुनिया में ऐसे लोग हैं जो ‘इतिहास और विचारधारा के अन्त’ के उदारवादी झाँसे में नहीं आए हैं और पूँजीवादी उत्पादन, उत्पादक शक्तियों के रिश्तों और सामाजिक सम्बन्धों की संस्थानिकताओं के विकल्पों की तलाश और मौजूदा शोषक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। वस्तुत: प्रतिरोध की ये शक्तियाँ पूँजीवाद के परे एक नई दुनिया के सपने को साकार करने के लिए प्रयत्नशील हैं और यथार्थ के ठोस धरातल पर विकल्प के सपने देख रही हैं।</p>
<p>‘नई दुनिया की ओर’ उन्हीं शक्तियों के स्वप्न और संघर्ष का बयान और विश्लेषण करती है। यह पुस्तक किसी अकादमिक अथवा बौद्धिक पांडित्य का दावा किए बगैर समाज के एक सामान्य श्रमशील सदस्य की नजर और नजरिये से पूँजी और श्रम के जटिल रिश्तों को दिखाने समझाने का प्रयास करती है। लेखक आजकल जोरशोर से प्रचारित ‘प्रतिबद्धतामुक्त’, ‘गैर-राजनीतिक’ अथवा ‘निरपेक्ष-तटस्थ’ रहने की कथित समझदारी के निहितार्थों को रेखांकित करते हुए बतलाता है कि ऐसा करना वास्तव में यथास्थिति का समर्थन करना है जबकि नव-प्रतिरोध के नए संकल्प, नई परियोजनाएँ और नई प्रयोगधर्मिताएँ संघर्ष और प्रतिरोध की नई भाषा रच रहे हैं। यह वह भाषा है, जो नए वैकल्पिक संकल्पों, नई पहलकदमियों, नई परियोजनाओं और एक बेहतर समतामूलक-न्यायपूर्ण समाज की दृष्टि के साथ नए प्रयोगों को जन्म देगी।</p>
<p>एक बेहतर समाज और संसार का सपना देखने वाले हरेक व्यक्ति के लिए अवश्य पठनीय और विचारोत्तेजक पुस्तक।
ISBN: 9789360866372
Pages: 464
Avg Reading Time: 15 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: चीन और जापान की गिनती आज एशिया ही नहीं, विश्व-स्तर के शक्तिशाली देशों में होती है। आधुनिक समय में अपनी तकनीकी और आर्थिक क्षमता के चलते इन दोनों ही देशों ने दुनिया-भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है। चीन को जहाँ विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक माना जाता है, वहीं जापान का इतिहास भी समय में बहुत पीछे तक जाता है, हालाँकि यूरोपवासियों को उसकी जानकारी तेरहवीं सदी में मिली। दोनों ही देशों ने अनेक राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक पड़ावों को पार करते हुए अपनी यात्रा जारी रखी है जिसकी उपलब्धि आज सामने है। ‘चीन और जापान का इतिहास’ पुस्तक में, चीन और जापान के लम्बे इतिहास और उसके उतार-चढ़ाव को अत्यन्त सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है जिससे इतिहास के अध्येताओं के साथ-साथ सामान्य पाठक भी अपना ज्ञान-वर्धन कर सकते हैं। विषय की ग्राह्यता को बढ़ाने के लिए यह पुस्तक उन घटनाओं का परिचय देते हुए आगे बढ़ती है जो इन देशों के राजनीतिक-आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में निर्णायक रही हैं। चीन का अफ़ीम युद्ध, ताइपिंग विद्रोह, 1911 की चीनी क्रान्ति और साम्यवादी आन्दोलन जिस तरह चीन की ऐतिहासिक यात्रा पर प्रकाश डालते हैं, उसी तरह मेईजी पुनर्स्थापन, चीन-जापान युद्ध, रूस-जापान युद्ध के साथ जापानी साम्राज्यवाद का उत्थान एवं पतन आदि अध्याय जापान के इतिहास को बोधगम्य ढंग से प्रस्तुत करते हैं। इतिहास के छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
Pagha Jori-Jori Re Ghato
- Author Name:
Rose Kerketta
- Book Type:

- Description: "रोज ने अपने कथा-संग्रह में आदिवासी जीवन को सघनता और संपूर्णता के साथ शामिल किया है। जो जिया है, उसे ही लिखा है। संग्रह में व्यापकता है, विविधता है, आधुनिकता है, और जो सबसे बड़ी बात है, वह है प्रतिरोध का राजनीतिक स्वर। इसमें हिंदी साहित्य में चल रहे स्त्री विमर्श से अलग ढंग की कहानियाँ हैं, जो पुरुष के विरोध में नहीं, व्यवस्था के विरोध में खड़ी हैं। यहाँ अलग तरह का नारीवाद है। जल, जंगल, जमीन पर हो रहे हमले के खिलाफ लड़ता हुआ नारीवाद। —वीरभारत तलवार ऐसे मौसम में जबकि रचनात्मकता में एक प्रकार का सुखाड़ एवं अकाल है, रोज दी ने वैसी कहानियाँ दी हैं, जो बिल्कुल ही एक नए स्वाद की कहानियाँ हैं। समाज में जो लड़ाई है, उस लड़ाई को ताकत देने के लिए यह किताब है। —किशन कालजयी रोज दी की प्रमुख विशेषता यह है कि वे कहानियाँ लिखती नहीं कहती हैं, यानी एक कहानीकार का पाठक के साथ जो एक संवाद हो सकता है, पाठक में जो विश्वास हो सकता है, पाठक के साथ जो साझेदारी या भागीदारी हो सकती है, वह रोज दी की कहानियों में दिखती है। उनका जो देशज स्वर है, वह सीमित भौगोलिक दायरे में नहीं सिमटता है। हिंदी में जनजातीय पात्रों को लेकर जो कहानियाँ लिखी गई हैं, ये कहानियाँ उनसे भिन्न हैं। —रविभूषण इस कथा-संग्रह से गुजरते हुए आदिवासी समाज की वाचिक परंपरा-किस्सागोई का आस्वाद अनायास हमारे मन-मस्तिष्क को भिगोता है। इन कहानियों में लेखिका ने शिल्प के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं किया है। कथ्य के साथ सादा-सा शिल्प सहज रूप से आया है। एक नैसर्गिक आदिवासी सादगी मौलिकता-सहजता के साथ। —रणेंद्र
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