Teesri Aankh
Author:
Anil Joshi, Rajendra AryaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Unavailable
इतिहास तीसरी आँख होता है । मनुष्य की दो आँखें आगे देखती हैं, इतिहास की आँख पीछे देखती है। जो समाज जितना पीछे भूतकाल में देख सकता है, वह उतना आगे भविष्य में दूर तक विचार भी कर सकता है। जो धनुर्धर होता है, वह प्रत्यंचा को श्रुति यानी कान तक खींचता है, दूर संधान करने की कोशिश करता है।
-धर्म की ग्लानि से
इस राष्ट्र का दर्शन क्या है ? हमारे राष्ट्र का इतिहास क्या है? हमारे राष्ट्र की परंपरा क्या है ? हमारे राष्ट्र का वैशिष्ट्य क्या है ? हमारे राष्ट्र का उद्देश्य क्या है? हमारे राष्ट्र की विश्व- जगत् में विशेषता क्या है ? हमारे राष्ट्र का विश्व - दृष्टि से कर्तव्य क्या है ? वैश्विक जागृति में जिम्मेदारी क्या है?
-डॉ. हेडगेवार और राष्ट्र दृष्टि से
डॉ. अंबेडकर ने धारा 370 का विरोध किया और जब शेख अब्दुल्ला ने डॉ. अंबेडकर जी को कहा कि हमको कश्मीर के लिए कुछ अधिक अधिकार दीजिए तो डॉ. साहब ने शेख अब्दुल्ला से कहा, तुम चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार मिले,
पर भारत और भारतीयों को तुम कोई अधिकार नहीं देना चाहते। मैं भारत का कानून मंत्री हूँ और मैं अपने देश के साथ इस तरह की धोखाधड़ी और विश्वासघात करने में शामिल नहीं हो सकता ।
डॉ. भीमराव अंबेडकर : एक असाधारण बहुआयामी व्यक्तित्व से
ISBN: 9789355219206
Pages: 232
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
सन् 1857 के विद्रोह का क्षेत्र विशाल और विविध था। आज़ादी की इस लड़ाई में विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों और समुदाय के लोगों ने जितने बड़े पैमाने पर अपनी आहुति दी, उसकी मिसाल तो विश्व इतिहास में भी कम ही मिलेगी। इस महाविद्रोह को विश्व के समक्ष, उसके सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का महत् कार्य कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स कर रहे थे। ‘1857 : बिहार-झारखंड में महायुद्ध’ पुस्तक बिहार और झारखंड क्षेत्र में इस महायुद्ध का दस्तावेज़ी अंकन करती है।
1857 की सौवीं वर्षगाँठ पर, 1957 में बिहार के कतिपय इतिहासकारों-काली किंकर दत्त, क़यामुद्दीन अहमद और जगदीश नारायण सरकार ने बिहार-झारखंड में चले आज़ादी के इस महासंग्राम की गाथा प्रस्तुत करने का कार्य किया था। लेकिन तब इनके अध्ययनों में कई महत्त्वपूर्ण प्रसंग छूट गए थे। कुछ आधे-अधूरे रह गए थे। वरिष्ठ और चर्चित लेखक-पत्रकारों प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत के श्रम-साध्य अध्ययन-लेखन के ज़रिए इस पुस्तक में पहले की सारी कमियों को दूर करने का सुफल प्रयास किया गया है। बिहार और झारखंड के कई अंचलों में इस संघर्ष ने व्यापक जन-विद्रोह का रूप ले लिया था। बाग़ी सिपाहियों और जागीरदारों के एक हिस्से के साथ-साथ ग़रीब, उत्पीड़ित दलित और जनजातीय समुदायों ने इस महायुद्ध में अपनी जुझारू भागीदारी से नया इतिहास रचा था। यह पुस्तक मूलतः प्राथमिक स्रोतों पर आधारित है। बिहार-झारखंड में सन् सत्तावन से जुड़े तथ्यों और दस्तावेज़ों का महत्त्वपूर्ण संकलन है। आम पाठकों के साथ-साथ शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी पुस्तक।
Naya Bharat Samarth Bharat
- Author Name:
Dr. Vedprakash
- Book Type:

- Description: ‘नया भारत, समर्थ भारत’ संकल्प से सिद्धि की ओर बढ़ता भारत है, जिसमें स्वच्छता, स्वास्थ्य, गरीबी, भ्रष्टाचार, ग्रामोदय, नारी सशक्तीकरण, कुपोषण, कृषि तथा किसान की दशा, विविध आयामी सद्भाव तथा बुनियादी ढाँचा आदि अनेक ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिन पर स्वतंत्रता के बाद सत्ता सँभालने वालों को गंभीरता से काम करना चाहिए था, लेकिन राजनीतिक हित तथा निहित स्वार्थों के चलते इन सामाजिक तथा राष्ट्रीय हितों को हाशिए पर रखा गया। ‘संकल्प’ शक्ति के अभाव में उक्त मुद्दे गंभीर चुनौती बनते चले गए। सन् 2014 में त्रस्त जनता ने भारी जनादेश देकर भाजपा को विजयी बनाया। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई उम्मीदें जगीं। 15 अगस्त, 2014 को लालकिले की प्राचीर से अपने पहले ही संबोधन में उन्होंने प्रधान सेवक बनकर उपर्युक्त मुद्दों को गंभीरता से उठाते हुए उनके समाधान का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने निराशा तथा नकारात्मकता में डूबे जन-जन को झकझोरा, भागीदारी का आह्वान किया तथा संकल्पबद्ध होकर कार्य करने का विश्वास जगाया। जन-जन की भागीदारी से राष्ट्रहित में अनेक बड़े और कड़े फैसले लेते हुए वे आगे बढ़ते रहे। लक्ष्य स्पष्ट था—‘सबका साथ, सबका विकास’। ‘साफ नीयत’ से लिये गए संकल्प अब सिद्धि की ओर बढ़ रहे हैं। ‘नए भारत’ की व्यावहारिक संकल्पना की प्रेरक प्रस्तुति है यह कृति ‘नया भारत, समर्थ भारत’।
Bihar Ke Gandhi Nitish Kumar
- Author Name:
Shambhavi Choudhary +1
- Book Type:

- Description: "जो लोग बिहार से सारी उम्मीदें छोड़ चुके थे, उनकी नजर में नीतीश कुमार ने एक चमत्कारी पुरुष का दर्जा हासिल कर लिया है। आखिर उन्होंने राज्य के पुनरुत्थान का काम कैसे किया ? नीतीश कुमार कोई पेशेवर प्रबंधक नहीं, एक राजनीतिज्ञ हैं। नवंबर 2005 में जब उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री का पद ग्रहण किया, वे अधिकारियों को अकसर याद दिलाते थे कि सरकार के प्रदर्शन में उनके मंत्रालय का सबकुछ दाँव पर लगा है, न कि नौकरशाही का। अगर सरकार को कामयाबी मिलती है तो उसका सारा श्रेय उनके मंत्रालय को मिलेगा; अगर वह असफल रही तो उनके मंत्रालय को सारा दोष अपने सिर लेना होगा। नौकरशाहों की नौकरियाँ नहीं जाएँगी, उन्हें (मुख्यमंत्री को) जाना होगा। इस प्रकार नीतीश कुमार ने जनता की मूल जरूरतों से जुड़े मुद्दों को हल करने की दिशा में काम करके लोगों के दिलों में स्थायी जगह बना ली और सामाजिक क्रांति के पुरोधा के रूप में उभरे। सुधार की यह प्रक्रिया अनवरत जारी है। नीतीश कुमार की सामाजिक क्रांति की अनकही, प्रेरक, रोचक और साहसिक अभियानों से रू-ब-रू कराती एक पठनीय एवं संग्रहणीय औपन्यासिक गाथा।"
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