Bharat Ka Swatantrata Sanghrash
(0)
Author:
Aditya Mukherjee, Mridula Mukherjee, Sucheta Mahajan, Bipan Chandra, K.N. Panikkar, Bipin ChandraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
599
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‘भारत का स्वतंत्रता संग्राम’ नामक इस पुस्तक की रचना एक व्यापक रूपरेखा के तहत की गई है। यह एक सुदीर्घ शोधकार्य का नतीजा है, जिसका निर्देशन प्रो. बिपिन चंद्र ने किया। यह शोध केवल संग्रहालयों, निजी व संस्थाओं से प्राप्त सामग्री के आधार पर नहीं किया गया, बल्कि इसमें स्वतंत्रता आन्दोलन के समय के समाचार-पत्रों तथा आन्दोलन में आधार-स्तर पर शामिल रहे लोगों के अनुभवों, उनके साक्षात्कारों का भी उपयोग किया गया है। कह सकते हैं कि भारतीय इतिहास के इस विशिष्ट काल खंड, और उससे भी अधिक उस आन्दोलन के विषय में हमें यहाँ एक प्रचुर तथ्य प्राप्त होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप आज हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं। यह पुस्तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन की उन विशेषताओं को ख़ासतौर पर रेखांकित करती है जिनके चलते यह मुहिम केवल असहमति और नकार की गतिविधि नहीं, बल्कि एक रचनात्मक और भविष्योन्मुखी, व्यापक मानवीय सरोकारों से प्रतिबद्ध सजग कार्रवाई थी। लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, आत्मनिर्भरता, समतावादी समाज-व्यवस्था, स्वतंत्र विदेश नीति, अभिव्यक्ति और संगठन की आज़ादी, समग्र आर्थिक विकास, ग़रीबों की पक्षधरता और व्यापक अन्तरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के जिन मूल्यों को आधार बनाकर भारत का स्वाधीनता आन्दोलन चला, और जो स्वतंत्र भारत के आधार-मूल्य बने, उन्हें यह पुस्तक तथ्यों और सन्तुलित विश्लेषण के साथ रेखांकित करती है। छात्रों के साथ-साथ आधुनिक भारत के इतिहास में रूचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष उपयोगी।
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‘भारत का स्वतंत्रता संग्राम’ नामक इस पुस्तक की रचना एक व्यापक रूपरेखा के तहत की गई है। यह एक सुदीर्घ शोधकार्य का नतीजा है, जिसका निर्देशन प्रो. बिपिन चंद्र ने किया। यह शोध केवल संग्रहालयों, निजी व संस्थाओं से प्राप्त सामग्री के आधार पर नहीं किया गया, बल्कि इसमें स्वतंत्रता आन्दोलन के समय के समाचार-पत्रों तथा आन्दोलन में आधार-स्तर पर शामिल रहे लोगों के अनुभवों, उनके साक्षात्कारों का भी उपयोग किया गया है। कह सकते हैं कि भारतीय इतिहास के इस विशिष्ट काल खंड, और उससे भी अधिक उस आन्दोलन के विषय में हमें यहाँ एक प्रचुर तथ्य प्राप्त होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप आज हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं।
यह पुस्तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन की उन विशेषताओं को ख़ासतौर पर रेखांकित करती है जिनके चलते यह मुहिम केवल असहमति और नकार की गतिविधि नहीं, बल्कि एक रचनात्मक और भविष्योन्मुखी, व्यापक मानवीय सरोकारों से प्रतिबद्ध सजग कार्रवाई थी।
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छात्रों के साथ-साथ आधुनिक भारत के इतिहास में रूचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष उपयोगी।
Book Details
-
ISBN9789360860752
-
Pages512
-
Avg Reading Time17 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी की गणना देश के शीर्षस्थ इतिहासकारों में होती है और परम्परागत दृष्टि से इतिहास लिखनेवालों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. मुखर्जी के वे भाषण हैं, जो उन्होंने सर विलियम मेयर भाषणमाला के अन्तर्गत मद्रास विश्वविद्यालय में दिए थे। इन निबन्धों में भारत के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म तथा प्रारम्भिक जीवन और उसके विजय-अभियानों की चर्चा करते हुए उन सारे कारकों का गहराई से अध्ययन किया गया है जो एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण में और फिर उसे स्थायित्व प्रदान करने में सहायक हुए। चन्द्रगुप्त के कुशल प्रशासन और उसकी सुविचारित आर्थिक नीतियों की परम्परा अशोक के काल तक अक्षुण्ण रहती है। आर्थिक जीवन का राज्य द्वारा नियंत्रण तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण मौर्यकाल की विशेषता थी। प्रो. मुखर्जी का यह अध्ययन चौथी शताब्दी ई.पू. की भारतीय सभ्यता के विवेचन-विश्लेषण के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र की बहुत सारी ऐसी सामग्री का समुचित उपयोग किया गया है, जिसके सम्बन्ध में या तो काफ़ी जानकारी नहीं थी या जिसकी तरफ़ काफ़ी ध्यान नहीं दिया गया था। साथ ही, शास्त्रीय रचनाओं—संस्कृत, बौद्ध एवं जैन ग्रन्थों के मूल पाठों और अशोक के शिलालेखों—जैसे विभिन्न स्रोतों से लिए गए प्रमाणों का सम्पादन और तुलनात्मक अध्ययन भी यहाँ मौजूद है। भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के अन्वेषक विद्वानों ने इस पुस्तक को बहुत ऊँचा स्थान दिया है और यह आज तक इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के लिए एक मानक ग्रन्थ के रूप में मान्य है।
Gandhi aur Nehru
- Author Name:
Deepak Malik
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भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुत: आम सहमतियों और व्यापक संयुक्त मोर्चों एवं सम्मिलित जन-आन्दोलन को लेकर राजनीतिशास्त्र की दुनिया में एक ‘नई गतिकी’ को निर्मित करता है, यह विश्व इतिहास में एक नई कड़ी है।
गांधी विमर्श तो न केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बड़े दमख़म के साथ चल रहा है, पर जवाहरलाल के बारे में इस दौर में कुछ ही पुस्तकें बाज़ार में आ रही हैं, गांधी-नेहरू साझा विमर्श एक देर से ही सही लेकिन निहायत ही मौज़ूँ सिलसिला है।
वैश्वीकरण के आक्रामक दौर में नेहरू जो एक स्वतंत्र वैकल्पिक अर्थतंत्र और राज्य सत्ता के स्थपति थे, उन्हें भुला देना अस्वाभाविक नहीं लगता है। इस दौर में मौजूदा राज्य सत्ता से लेकर प्रमुख विपक्ष तक ने वैश्वीकरण और उदारीकरण को स्वीकार कर लिया है। साम्प्रदायिकता की तस्वीर में भी 1992 और 2002 के बाद शताब्दियों से चल रही मुश्तरका संस्कृति में दीमक लग गई है। गांधी को तो वैश्वीकरण के स्टीमरोलर ने बेरहमी से ज़मींदोज़ कर दिया है। ऐसे दौर में गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक साझा और उनके कृतित्व पर पुन: रोशनी पड़नी चाहिए।
प्रस्तुत पुस्तक दो महान स्वप्नद्रष्टाओं की यथार्थसम्मत विचारधारा को सप्रमाण रेखांकित करती है।
Kisan Aandolan : Dasha Aur Disha
- Author Name:
Kishan Patnayak +1
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किशन पटनायक की यह पुस्तक भारत के किसान आन्दोलन का उसके सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक और कुछ हद तक सांस्कृतिक आयामों में गहराई से विश्लेषण और मूल्यांकन प्रस्तुत करती
है।लेखक की प्रतिष्ठा एक ऐसे समाजवादी चिन्तक और नेता के रूप में है जिसने उदारीकरण-ग्लोबीकरण यानी पूँजीवादी साम्राज्यवाद की सुचिन्तित समीक्षा तथा सतत विरोध किया है। इस पुस्तक में भी किसान आन्दोलन का विश्लेषण मुख्यतः उदारीकरण-ग्लोबीकरण की नीतियों के सन्दर्भ में किया गया है, जिनके चलते भारत की खेती-किसानी तबाही के कगार पर पहुँच गई है और लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसान जीवन पर आए इस अभूतपूर्व संकट के दौर में लेखक ने साम्राज्यवादी पूँजीवाद का प्रतिकार करने के लिए देश में एक स्वतंत्र किसान राजनीति के निर्माण, विकास और संगठन की ज़रूरत पर बल दिया है। किसान राजनीति के अभ्युदय के लिए ज़रूरी वैकल्पिक विचारधारा के सूत्र और संघर्ष के तरीके भी सुझाए हैं।
पुस्तक की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि इसमें समाजवादी क्रान्ति के सन्दर्भ में किसान वर्ग की क्रान्तिकारी भूमिका स्वीकार की गई है, जो परम्परागत मार्क्सवादी सिद्धान्त के विपरीत मान्यता है। लेखक का इस विषय का निरूपण पर्याप्त ताज़गी-भरा, प्रेरणाप्रद और प्रामाणिक है, जिससे अध्ययन और शोध की नई ज़मीन तैयार होगी। उदारीकरण-ग्लोबीकरण की सबसे ज़्यादा मार झेल रहे किसानों के पक्ष में जूझनेवाले किसान नेताओं, अन्य परिवर्तनकारी आन्दोलनकारियों और बुद्धिजीवियों के लिए यह एक ज़रूरी किताब है।
Jinna : Ek Punardrishti
- Author Name:
Virendra Kumar Baranwal
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साधारण भारतीयों के मन में जिन्ना की छवि एक निहायत नीरस, अन्तर्मुखी, तार्किक, अधार्मिक, भावना-शून्य, मनहूस, हिसाबी, सिर से पैर तक पश्चिमी सभ्यता में रँगे, चोटी के वकील के साथ एक अपराजेय राजनीतिक सौदेबाज़ की रही है। जिन्ना के व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को झुठलाना जहाँ निहायत दुश्वार है, वहीं मात्र इन्हीं विशेषताओं में उन्हें सीमित करना वस्तुतः सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। जिन्ना के जीवन और व्यक्तित्व के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो बहुत कम उजागर हो पाए हैं। फलस्वरूप अक्सर उनका एकांगी मूल्यांकन ही हो पाया है। इतिहास मात्र घटनाओं का संकुल और महत्त्वाकांक्षियों की नियति के उतार-चढ़ाव का दस्तावेज़ ही नहीं है। उसके विराट मंच पर उभरे काल-प्रेरित अभिनेताओं के मनोजगत की उथल-पुथल से संरचित व्यक्तित्वों के समझौते-टकराव और घात-प्रतिघात उसकी धारा को प्रभावित करने में निर्णयात्मक भूमिका निभाते हैं। कुछ इसी विश्वास के फलस्वरूप जिन्ना के जीवन पर विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों के साथ-साथ अलग-अलग समझने-परखने की कोशिश इस किताब में मिलेगी। उनकी पत्नी रत्ती की गहन संवेदनशीलता, तीक्ष्ण मेधा, व्यक्तित्व का अप्रतिम सम्मोहन, समस्त प्राणी-जगत के लिए करुणा विगलित हृदय, गहरे राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और धार्मिक बाह्याडम्बर के प्रति वितृष्णा जैसे गुण उन्हें अपने समय का एक अत्यन्त विशिष्ट व्यक्तित्व सिद्ध करते हैं। इस पुस्तक में उनके विषय में भी एक विस्तृत अध्याय रखा गया है। ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता बनने के पहले जिन्ना हिन्दुस्तान की धरती के एक महान और सुयोग्य पुत्र थे। उनके लगभग आधी सदी के राजनीतिक जीवन में समय-समय पर उभरे सोच में आज भी ऐसा बहुत कुछ समावेशी और रचनात्मक है, जो अप्रासंगिक नहीं हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि गांधी और नेहरू की तरह जिन्ना भी भारतीय उपमहाद्वीप में समय-समय पर एक पुनर्दृष्टि की माँग करते रहेंगे। इतिहास के अपने ढंग के एक अद्वितीय व्यक्तित्व के नाते यह उनका हक़ है।
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