Asamanjas
Author:
Dr. Rajendra PrasadPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Unavailable
"महात्मा गांधीजी सत्य और अहिंसा को अपने सभी सिद्धांतों, विचारों और कार्यों का सारभूत मूल मानते थे। जो कुछ वह विचार करते थे और कहते थे, सबको सत्य और अहिंसा की कसौटी पर कसते थे और यदि वह खरा निकलता तो उसे स्वीकार करते थे तथा दूसरे तक उसे पहुँचाने का प्रयत्न भी करते थे। यदि कुछ संदेह हुआ तो उसे छोड़ देते थे। उन्होंने कई बार अपने जीवन में यह स्वीकार किया कि उनके द्वारा हिमालय जैसी भारी भूल हुई।
---
महात्माजी का यह विचार था कि मनुष्य को उतने ही आराम के साधनों की आवश्यकता होनी चाहिए, जो जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त हों और जो दूसरे पर भार डाले बगैर मुहैया किए जा सकते हों और जिनके कारण दूसरों का न तो शोषण की आवश्यकता पड़े, न दूसरों के साथ जोर-जबरदस्ती करने की आवश्यकता हो। इससे यदि अधिक आवश्यकता हुई तो या तो दूसरों का शोषण करना होगा या दूसरों के साथ जबरदस्ती करनी होगी, जो दोनों हिंसा के रूप हैं, या अन्य प्रकार से असत्य का उपयोग करना होगा।
—इसी पुस्तक से
देशरत्न बाबू राजेंद्र प्रसाद ने गांधी-दर्शन को जितनी गहराई से समझा था और बापू के सत्य, अहिंसा एवं कर्मवाद के सिद्धांत को जितनी निष्ठा से अपने जीवन में उतारा था, वैसा शायद ही कहीं देखने को मिलता है।
¥â×¢Áâ में गांधीवाद की सच्ची व्याख्या और गांधीजी के सिद्धांतों की स्पष्ट झलक मिलती है। गांधीजी के सिद्धांतों को साकार करनेवाली पुस्तक, जिसे पढ़कर सुधी पाठकगण निश्चित ही लाभान्वित होंगे।
"
ISBN: 9788173156779
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: अतीत के बारे में प्रचलित धारणाओं को तब तक ऐतिहासिक नहीं माना जा सकता जब तक उनकी आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल न कर ली जाए। ‘वर्तमान जैसा अतीत’ किताब मुख्यतः यही करती है। उदाहरण के लिए ये कुछ सवाल—सोमनाथ मन्दिर पर हमले के बाद वास्तव में क्या हुआ? हम में से आर्य या द्रविड़ कौन हैं? भारतीय समाज का धर्मनिरपेक्ष होना क्यों ज़रूरी है? साम्प्रदायिकता ने एक विचारधारा के रूप में देश में कब अपने पैर जमाए? हमारी पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की संस्कृति को कैसे और कब बढ़ावा देना शुरू किया? इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखने के लिए कट्टरपन्थी इतने उत्सुक क्यों हैं? इन और इस तरह के अन्य प्रश्नों को लेकर उसी समय से विवाद और बहसें होती आई हैं जब इन्हें पहली बार पूछा गया था। प्रतिष्ठित इतिहासकार रोमिला थापर अकसर ही ऐसे प्रश्नों के मूल में स्थित ऐतिहासिक तथ्यों की जाँच, विश्लेषण और व्याख्या करती रही हैं। वे कहती हैं कि इतिहास में सिर्फ सूचनाएँ ही नहीं, उन सूचनाओं का विश्लेषण और व्याख्या भी शामिल होती है। चार उपखंडों के तहत विभिन्न प्रश्नों पर तथ्यात्मक और दृष्टि-सम्पन्न ढंग से विचार करने वाली यह पुस्तक ऐसे समय में निहायत ज़रूरी पाठ बन जाती है जब साम्प्रदायिकता, बनावटी ‘राष्ट्रवाद’ और ऐतिहासिक तथ्यों को धूमिल करना हमारे सार्वजनिक, निजी और बौद्धिक जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है।
Chandrashekhar Ke Bare Mein
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

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Description:
‘चन्द्रशेखर के बारे में’ पुस्तक अपने समय के महत्त्वपूर्ण लेखकों-पत्रकारों, राजनीतिज्ञों और समाज-विज्ञानियों द्वारा किए गए आत्मीय और तटस्थ विश्लेषणों का एक संकलन है। यह संकलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह चन्द्रशेखर की राजनीतिक और रचनात्मक यात्रा के विभिन्न पड़ावों का एक विश्वसनीय लेखा-जोखा है। इन लेखों को पढ़ते हुए आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का संक्षिप्त सफरनामा और उसमें चन्द्रशेखर के जरूरी योगदान से हमारा परिचय होता जाता है।
संकलित आलेखों के क्रम में भले ही हमें कथासूत्र की तरह का कोई संयोजन नहीं मिलता है, मगर यही इस संकलन की खासियत भी है। हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति के विविध-रंगी चित्रों और उसमें चन्द्रशेखर के राजनीतिक, सामाजिक व रचनात्मक सरोकारों का एक कोलाज है यह संकलन–और इसलिए इसकी सिर्फ राजनीतिक और सामयिक ही नहीं, रचनात्मक और साहित्यिक महत्ता भी है।
नामवर सिंह, भोला चटर्जी, प्रभाष जोशी, केदारनाथ सिंह, उदयन शर्मा, तवलीन सिंह और एम.जे. अकबर सहित अनेक सुविख्यात कलमकारों ने चन्द्रशेखर के बारे में समय-समय पर लिखा। गांधी और जयप्रकाश नारायण के बाद शायद चन्द्रशेखर ही ऐसे राजनेता हैं, जिनके बारे में सभी धाराओं के अग्रणी लोगों ने सृजनात्मक राय रखी। युवा तुर्क की हैसियत के जमाने में और इमर्जेंसी के बाद चन्द्रशेखर के बारे में काफी कुछ लिखा गया। यह पुस्तक इस लेखन का एक प्रतिनिधि संकलन है।
Trishanku Rashtra : Smriti, Swa Aur Samkalin Bharat
- Author Name:
Deepak Kumar
- Book Type:

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Description:
आज़ादी के सत्तर साल बाद आज भारत हमें जिस रूप में प्राप्त होता है, वह विडम्बनाओं और विरोधाभासों का कहीं से सिला, कहीं से उधड़ा एक जटिल ताना-बाना है। उसका कोई एक रूप नहीं है। विस्तृत भूभाग और इतिहास में दूर तक फैली सांस्कृतिक जड़ों के चलते उसे समझना यूँ भी सहज नहीं है। आज़ादी के बाद बने राष्ट्र के रूप में वह और पेचीदा हुआ है। यहाँ अगर आधुनिकता अपने शुद्धतम रूप में दिखती है तो परम्पराओं की जकड़बन्दी भी उतनी ही कसी हुई है। विकास है तो भ्रष्टाचार भी है, बहुरंगी विविधता में सहअस्तित्व और सहिष्णुता की भावना चमत्कृत करती है तो साम्प्रदायिकता और जातिवाद की भयावह अकुलाहट डराती भी है।
‘त्रिशंकु राष्ट्र’ भारतीय अस्मिता की इसी पहेली को समझने की कोशिश है। निजी और ऐतिहासिक स्मृतियों को व्यापक सामाजिक और सभ्यतागत सन्दर्भों में विश्लेषित करते हुए लेखक ने स्वातंत्र्योत्तर भारत का एक दिलचस्प ख़ाका तैयार किया है जिसमें हम, जाति, धर्म, साम्प्रदायिकता, प्रशासन, भ्रष्टाचार, शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति आदि का गहरा विश्लेषण पाते हैं।
दुर्लभ वाग्विदग्धता के साथ अपने और आसपास के संस्मरणों के आईने से यह किताब भारतीय उपमहाद्वीप के वृहत्तर जीवन की विभिन्न तहों को उघाड़ती है।
Shiksha Mein Bhartiyata : Ek Vimarsh
- Author Name:
Shri Atul Kothari
- Book Type:

- Description: इस संग्रह के निबंधों का केंद्रीय विषय भारत की शिक्षा और शिक्षा का भारतीकरण है। इन निबंधों में भारतीय शिक्षा की वर्तमान चुनौतियों को उद्घाटित करते हुए, इसके लक्ष्यों, संस्थागत व्यवस्था और पद्धति पर विचार किया गया है। इन निबंधों का प्रतिपाद्य है कि भारतीय शिक्षा का लक्ष्य भौतिक जीवन में समृद्धि के स्थान पर मानवता के शिखर पर ले जाना होना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अनुकूल भारत के प्रत्येक जन की शिक्षा के लिए हम केवल शैक्षिक संस्थानों के भरोसे नहीं बैठ सकते हैं। इसके लिए कुटुंब और समुदाय को भी सतत प्रयत्नशील रहना होगा। हमें मनुष्य का निर्माण करने वाली शिक्षा व्यवस्था को विकसित करना होगा जिसका लक्ष्य भारत को आगे ले जाने वाली पीढ़ी तैयार करना होगा।
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