Umeda- Ek yuddha Nartaki
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इतिहास पर लिखना बहुत मुश्किल होता है, और विशेषकर उस इतिहास पर लिखना, जिसके बारे में कहीं कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती हो। आकाश माथुर ने एक ऐसा ही विषय उठा लिया। कुँवर चैन सिंह की जगह उन्हीं के साथ शहीद हुई नर्तकी उमेदा की कहानी लिखना। नर्तकी का नाम तक कहीं नहीं मिलता, बस एक टूटी-फूटी समाधि है, जो सीहोर में कुँवर चैन सिंह की छतरी के पास बनी हुई है। समाधि भी धीरे-धीरे टूट रही है, या यूँ कहें कि तोड़ी जा रही है। और कुछ समय में वहाँ समाधि का नामो-निशान तक नहीं मिलेगा। लेकिन अब कम से कम यह तो है कि आकाश ने उसकी कहानी को सुरक्षित कर दिया है। प्रशंसा करनी होगी आकाश की कि उसने एक ऐसी शहीद नर्तकी की कहानी लिखी, जिसके बारे में कहीं एक शब्द भी नहीं लिखा गया है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि कुछ बहुत छोटे-छोटे सूत्रों से ही इस पूरे उपन्यास को लिख दिया गया है और उमेदा की कहानी रच दी गई है। आकाश ने बहुत मेहनत की है इस उपन्यास पर। इन दिनों जब शोध कर के लिखने की परंपरा ही समाप्त होती जा रही है, ऐसे में यह उपन्यास इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके लेखक ने न केवल किताबों की यात्रा की है, बल्कि उन स्थानों की भी यात्रा की, जहाँ-जहाँ इस उपन्यास को लेकर उसे सूत्र मिल सकते थे। जाने किस-किस से मुलाक़ात की, उन सब से, जिनके पास से कोई छोटी से छोटी भी जानकारी मिल सकती थी। यह मेहनत, यह श्रम और यह शोध इस उपन्यास को पढ़ते समय शब्द दर शब्द महसूस होता है। उपन्यास बहुत रोचक बना है, जिसको पढ़ते समय कभी भी पठनीयता की कमी महसूस नहीं होती है। आकाश का यह पहला उपन्यास है, उम्मीद करता हूँ कि आगे और भी उपन्यास आकाश की लेखनी से सामने आएँगे। मेरी शुभकामनाएँ। - पंकज सुबीर
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इतिहास पर लिखना बहुत मुश्किल होता है, और विशेषकर उस इतिहास पर लिखना, जिसके बारे में कहीं कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती हो। आकाश माथुर ने एक ऐसा ही विषय उठा लिया। कुँवर चैन सिंह की जगह उन्हीं के साथ शहीद हुई नर्तकी उमेदा की कहानी लिखना। नर्तकी का नाम तक कहीं नहीं मिलता, बस एक टूटी-फूटी समाधि है, जो सीहोर में कुँवर चैन सिंह की छतरी के पास बनी हुई है। समाधि भी धीरे-धीरे टूट रही है, या यूँ कहें कि तोड़ी जा रही है। और कुछ समय में वहाँ समाधि का नामो-निशान तक नहीं मिलेगा। लेकिन अब कम से कम यह तो है कि आकाश ने उसकी कहानी को सुरक्षित कर दिया है। प्रशंसा करनी होगी आकाश की कि उसने एक ऐसी शहीद नर्तकी की कहानी लिखी, जिसके बारे में कहीं एक शब्द भी नहीं लिखा गया है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि कुछ बहुत छोटे-छोटे सूत्रों से ही इस पूरे उपन्यास को लिख दिया गया है और उमेदा की कहानी रच दी गई है। आकाश ने बहुत मेहनत की है इस उपन्यास पर। इन दिनों जब शोध कर के लिखने की परंपरा ही समाप्त होती जा रही है, ऐसे में यह उपन्यास इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके लेखक ने न केवल किताबों की यात्रा की है, बल्कि उन स्थानों की भी यात्रा की, जहाँ-जहाँ इस उपन्यास को लेकर उसे सूत्र मिल सकते थे। जाने किस-किस से मुलाक़ात की, उन सब से, जिनके पास से कोई छोटी से छोटी भी जानकारी मिल सकती थी। यह मेहनत, यह श्रम और यह शोध इस उपन्यास को पढ़ते समय शब्द दर शब्द महसूस होता है। उपन्यास बहुत रोचक बना है, जिसको पढ़ते समय कभी भी पठनीयता की कमी महसूस नहीं होती है। आकाश का यह पहला उपन्यास है, उम्मीद करता हूँ कि आगे और भी उपन्यास आकाश की लेखनी से सामने आएँगे। मेरी शुभकामनाएँ। - पंकज सुबीर
Book Details
-
ISBN9789390593361
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अने फ़्रांक की लिखी 'एक किशोरी की डायरी' विश्व की श्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है। जर्मनी में जन्मी अने ने यह ‘डायरी’ 1942 से 1944 के दौरान लिखी। इसमें युद्ध के बाद जर्मन क़ब्ज़े के दौरान डच लोगों की पीड़ा का आँखों-देखा विवरण है। एक 15 वर्षीय किशोरी ने समाज की उथल-पुथल और अपने मन की कशमकश को बहुत ही ईमानदारी से व्यक्त किया है। जन्मदिन के उपहार स्वरूप मिली एक डायरी को जिस समय उन्होंने अपना सच्चा मित्र बनाया था, उस समय ख़ुद उन्होंने भी कल्पना नहीं की होगी कि एक दिन यह डायरी विश्व की महानतम कृतियों में शुमार होगी। डायरी की प्रविष्टियों में जहाँ स्कूल की बातें हैं, तो सहेलियों की ईर्ष्या, मनपसन्द खिलौनों की चाह, छुट्टियों में बिताए समय के साथ देश में तेज़ी से बदलते हालात का भी वर्णन है। कैसे जर्मनी में रहनेवाले यहूदियों की ज़िन्दगी एक सनक-भर से जहन्नुम हो गई थी, लेकिन जीने की उत्कट इच्छा आख़िरी समय तक भी हार मानने को तैयार नहीं हुई। अने का बाल-मन कहीं न कहीं मानता है कि एक दिन सब सही हो जाएगा और वो वापस अपने परिवार के साथ एक सामान्य जीवन जी पाएगी। एक किशोरी की यह मार्मिक डायरी सिर्फ़ उसी की न रहकर सीधे पाठक के दिल में घर कर जाती है।
TEESA
- Author Name:
Nandani Agrawal
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"भारत में किस्से-कहानियों में राजा और उनकी रियासत को आज भी जिंदा रखा गया है। राजाओं के भोग-विलास की कहानियाँ उस दौर में प्रजा के साथ हुई घटनाओं और राजा के कुटिल स्वभाव को भी बयान करती हैं। ‘तीसा’ उपन्यास का तानाबाना भी राजा और मंत्री की चालबाजी से शुरू होता है। जहाँ राजा लालची तो है ही लेकिन एक खौफ के साये में अपनी जिंदगी को जी रहा है। राजा का अपनी ही रानी से मोहभंग सिर्फ इसलिए हो जाता है क्योंकि रानी राजा की कुटिल करतूतों पर खामोश नहीं होती है। कहानी का केंद्र बिंदु तीसा का शांत स्वभाव और चाँद सी शीतलता ओढ़े उसकी खूबसूरती है जो जंगल में चंदन की खूशबू फैलाती हुई सी लगती है। अब जहाँ चंदन हो, वहाँ विषैले साँप तो होंगे ही। ऐसे में राजा के मायाजाल से खुद को बचाना, यह चुनौती का काम तो होगा ही। तीसा कैसे मुश्किल समय में धैर्य और साहस से अपनी जीत को सुनिश्चित करती है, यह हम सबके लिए एक सबक की तरह हो सकता है। आप किसी भी मुश्किल समय में क्यों न हों, बस उम्मीद रखिए कि बुरा समय जरूर बीत जाएगा और अधर्म कितना भी क्यों न पाँव पसारे, जीत अंत में धर्म की ही होती है।"
Chhaha Swarnim Pristha
- Author Name:
Vinayak Damodar Savarkar
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भारतीय वाड.मय में सावरकर साहित्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्राण हथेली पर रखकर जूझनेवाले महान् क्रांतिकारी; जातिभेद, अस्पृश्यता, अंधश्रद्धा जैसी सामाजिक बुराइयों को समूल नष्ट करने का आग्रह रखनेवाले स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने इस ग्रंथ में भारतीय इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली है। विद्वानों में सावरकर लिखित इतिहास जितना प्रामाणिक और निष्पक्ष माना गया है उतना अन्य लेखकों का नहीं। प्रस्तुत ग्रंथ ‘छह स्वर्णिम पृष्ठ’ में हिंदू राष्ट्र के इतिहास का प्रथम स्वर्णिम पृष्ठ है यवन-विजेता सम्राट् चंद्रगुप्त की राजमुद्रा से अंकित पृष्ठ, यवनांतक सम्राट् पुष्यमित्र की राजमुद्रा से अंकित पृष्ठ भारतीय इतिहास का द्वितीय स्वर्णिम पृष्ठ, सम्राट् विक्रमादित्य की राजमुद्रा से अंकित पृष्ठ इतिहास का तृतीय स्वर्णिम पृष्ठ है। हूणांतक राजा यशोधर्मा के पराक्रम से उद्दीप्त पृष्ठ इतिहास का चतुर्थ स्वर्णिम पृष्ठ, मुसलिम शासकों के साथ निरंतर चलते संघर्ष और उसमें मराठों द्वारा मुसलिम सत्ता के अंत को हिंदू इतिहास का पंचम स्वर्णिम पृष्ठ कह सकते हैं और अंतिम स्वर्णिम पृष्ठ है अंग्रेजी सत्ता को उखाड़कर स्वातंत्र्य प्राप्त करना। विश्वास है, क्रांतिवीर सावरकर के पूर्व ग्रंथों की भाँति इस ग्रंथ का भी भरपूर स्वागत होगा। सुधी पाठक भारतीय इतिहास का सम्यक् रूप में अध्ययन कर इतिहास के अनेक अनछुए पहलुओं और घटनाओं से परिचित होंगे।
Hardaul
- Author Name:
Vandana Awasthi Dubey
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Mazzini Charitra
- Author Name:
Vinayak Damodar Savarkar
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नहीं-नहीं, राष्ट्र कभी मरते नहीं । ईश्वर पीड़ितों का रक्षक है । उसने मनुष्य को स्वाधीनता में साँस लेने के लिए उत्पन्न किया है । यदि तुम ठान लो तो समझो, देश स्वतंत्र हो ही गया । इससे अधिक प्रोत्साहक राष्ट्रमंत्र अन्य कौन सा है? एक बार मनुष्य ने ठान लिया कि मैं स्वाधीनता, स्वदेश और मानवता का परम भक्त हूँ फिर उसे स्वाधीनता, स्वदेश और मानवता के लिए लड़ना ही होगा, निरंतर आजीवन लड़ना होगा ।'' '' मेरी इटली की जनसंख्या दो करोड़ है । यदि इन दो करोड़ लोगों ने मन में निश्चय किया तो विदेशियों के वे पचहत्तर हजार सिपाही उन्हें दबा थोड़े सकते हैं! दो करोड़ लोग और उनका सहायक ईश्वर! ऐसी स्थिति में इटली पलक झपकते ही विदेशी सत्ता को चूर-चूर कर देगी । '' - जोसेफ मैझिनी उपर्युक्त कथन 22 जून, 1805 को इटली में जनमे महान् क्रांतिकारी जोसेफ मैझिनी के हैं, जिन्होंने अपनी प्रखर देशभक्ति से इटली के स्वाधीनता आंदोलन को अनुप्राणित किया । प्रस्तुत पुस्तक ऐसे महान् राष्ट्रभक्त का भारत के महान् क्रांतिकारी स्वातव्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा रचित जीवन-चरित्र है । इसमें इटली के स्वातंत्र्यवीर, देशभक्त मैझिनी का आत्मचरित्र और कुछ राजनीतिक लेख संकलित हैं । इन लेखों ने दो करोड़ लोगों में चेतना भर दी । इन लेखों से यूरोपीय सिंहासन उलट-पुलट हो गए । इन लेखों से इटली स्वतंत्र हुआ । इन लेखों में सभी पराधीन देशों को स्वतंत्र करने की शक्ति ठूस-ठूसकर भरी हुई है । मैझिनी के तत्त्व केवल इटली के लिए ही लागू नहीं होते, इटली केवल निमित्त बना है । राजनीति-शास्त्र के ये महत् सत्य उस महात्मा ने अखिल मानव-जाति के लिए प्रकट किए हैं । इस स्वतंत्रता-सुधा का मिष्टान्न सभी संतप्त भूमिकाओं की ओर मुड़ गया है ।
Bhagat Singh Ko Fansi : Vol. 1
- Author Name:
Malvender Jit Singh Waraich +4
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भगत सिंह को फाँसी-1 यह कैसे हुआ कि मामूली हथियारों से लैस कुछ नौजवानों को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने का दोषी पाया गया, जिसके चलते उन्हें उम्रकैद और फाँसी की सजा हुई! ‘युद्ध’, जो उन्होंने लड़ा हालाँकि ‘‘यह युद्ध उपनिवेशवादियों व पूँजीपतियों के विरुद्ध लड़ा गया।’’ और जो ‘‘ न ही यह हमारे साथ शुरू हुआ और न ही यह हमारे जीवन के साथ खत्म होगा।’’ और, मात्र 30 महीने की उल्लेखनीय अवधि में 8-9 सितम्बर 1928 को ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन’ की स्थापना के साथ शुरू होकर, यह सम्पन्न हो गया। विश्वास से भरपूर भगत सिंह के शब्द थे, कि ‘‘मैं अपने देश के करोड़ों लोगों की ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की हुंकार सुन पा रहा हूँ। काल-कोठरी की मोटी दीवारो के पीछे बैठे हुए भी मुझे कहै कि यह नारा हमारे स्वतंत्राता संघर्ष को प्रेरणा देता रहेगा।’’ इस पुस्तक में प्रस्तुत है इसका प्रथमद्रष्टया विवरण।
Khanzada
- Author Name:
Bhagwandas Morwal +1
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‘काला पहाड़’ और ‘रेत’ जैसे उपन्यासों द्वारा भगवानदास मोरवाल ने हिंदी में एक ऐसे लेखक की छवि बनाई है जो अपनी कथा-वीथियाँ समाज, देश और संस्कृति के तथ्यात्मक भूगोल के बीच से निकालता है। आम तौर पर वे ऐसे विषयों को चुनते हैं जिन्हें सिर्फ कल्पना के सहारे कहानी नहीं बनाया जा सकता, उनका गारा-माटी श्रमसाध्य शोध और खोजबीन से तैयार होता है। मेवात उनके लेखकीय और नागरिक सरोकारों का केंद्र रहा है. अपनी इस मिट्टी की संस्कृति, इतिहास और उसके समाजार्थिक पक्षों पर उन्होंने बार-बार निगाह डाली है। ‘खानजादा’ उपन्यास इसकी अगली कड़ी है। यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह उन अदृश्य तथ्यों की निर्ममता से पड़ताल करता है जो हमारी आज की राष्ट्रीय चिंताओं से सीधे जुड़े हुए हैं। भारत में तुगलक, सादात, लोदी और मुगलों द्वारा चौदहवीं सदी के मध्य से मेवातियों पर किए गए अत्याचारों और देहली के निकट मेवात में मची तबाही की दस्तावेजी प्रस्तुति करते हुए यह उपन्यास मेवातियों की उन शौर्य-गाथाओं को भी सामने लाता है जिनका इतिहास में बहुत उल्लेख नहीं हुआ है। प्रसंगवश इसमें हमें कुछ ऐसे उद्घाटनकारी सूत्र भी मिलते हैं जो इतिहास की तोड़-मरोड़ से त्रस्त हमारे वर्तमान को भी कुछ राहत दे सकते हैं। मसलन बाबर और उसका भारत आना। हिन्दू अस्मिता का उस वक्त के मुस्लिम आक्रान्ताओं से क्या रिश्ता बनता था, धर्म-परिवर्तन की प्रकृति और उद्देश्य क्या थे और इस प्रक्रिया से वह भारत कैसे बना जिसे गंगा-जमुनी तहजीब कहा गया, इसके भी कुछ संकेत इस उपन्यास में मिलते हैं।
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