Awarn Mahila Constable Ki Diary
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Author:
Neerja MadhavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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उपन्यास के क्षेत्र में नीरजा माधव असाधारण सिद्धि-सम्पन्न लेखिका हैं। उनकी विचार-विदग्धता, भाव-प्रवणता, अनछुए विषयों का वैविध्य उन्हें अपने समय के अन्य रचनाकारों से अलग रेखांकित करता है। उनके एक-एक शब्द में एक संस्कृति, जीवन-शैली अथवा सुख-दु:ख की आकृति सिमटी होती है जिसे दृष्टि-ओझल करते ही कथा-सूत्र के छूट जाने का भय होता है। यहाँ पर वे उन लेखकों से बिलकुल भिन्न हैं जो एक ही दृश्य के लम्बे, उबाऊ और शब्दों के मकड़जाल में पाठकों को उलझाए रखने का व्यापार करते हैं। नीरजा माधव के उपन्यासों में अपने युग की व्यापक बेचैनी, वेदना और सार्थक प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति दिखलाई पड़ती है। दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श के प्रचलित मुहावरों से बिलकुल पृथक् वे अपना मुहावरा स्वयं गढ़ती हैं और इस प्रकार अपनी राह भी। कुछ क्षण के लिए शिराओं में झनझनाहट पैदा करनेवाला साहित्य देने के पक्ष में वे कभी नहीं रहीं। इस उपन्यास की भूमिका में भी वे लिखती हैं—‘साहित्य का लक्ष्य मनुष्य के भीतर प्रेम, संयम, समर्पण और त्याग की उदात्त भावनाओं को जाग्रत करना है। ऐसे में यदि साहित्यकार भी मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति को ही उत्तेजित करने का व्यापार करने लगेगा तो यह सृजन तो नहीं ही हुआ।’</p> <p>एक अनछुए विषय पर लिखा गया अप्रतिम और पठनीय उपन्यास है : ‘अवर्ण महिला कान्स्टेबल की डायरी’।</p> <p>आस्था पर हमलों और धार्मिक संघर्षों का इतिहास प्राचीन होते हुए भी नित नए विकृत रूपों में समाज को प्रभावित कर रहा है। ऐसे ही एक प्राचीन धार्मिक स्थल की सुरक्षा में लगी अवर्ण महिला कान्स्टेबल अपनी कर्तव्यनिष्ठा का निर्वहन करते हुए आसपास के परिवेश को अपनी पैनी दृष्टि से देखती है और इतिहास तथा वर्तमान की अपनी व्याख्या करती है। नायिकाप्रधान यह उपन्यास अतीत की विसंगतियों के साथ वर्तमान में भी जड़ें जमाए अनेक कुंठाओं एवं आग्रहों के साथ दलित-विमर्श के कई अनछुए पक्षों को रेखांकित करता चलता है।
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उपन्यास के क्षेत्र में नीरजा माधव असाधारण सिद्धि-सम्पन्न लेखिका हैं। उनकी विचार-विदग्धता, भाव-प्रवणता, अनछुए विषयों का वैविध्य उन्हें अपने समय के अन्य रचनाकारों से अलग रेखांकित करता है। उनके एक-एक शब्द में एक संस्कृति, जीवन-शैली अथवा सुख-दु:ख की आकृति सिमटी होती है जिसे दृष्टि-ओझल करते ही कथा-सूत्र के छूट जाने का भय होता है। यहाँ पर वे उन लेखकों से बिलकुल भिन्न हैं जो एक ही दृश्य के लम्बे, उबाऊ और शब्दों के मकड़जाल में पाठकों को उलझाए रखने का व्यापार करते हैं। नीरजा माधव के उपन्यासों में अपने युग की व्यापक बेचैनी, वेदना और सार्थक प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति दिखलाई पड़ती है। दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श के प्रचलित मुहावरों से बिलकुल पृथक् वे अपना मुहावरा स्वयं गढ़ती हैं और इस प्रकार अपनी राह भी। कुछ क्षण के लिए शिराओं में झनझनाहट पैदा करनेवाला साहित्य देने के पक्ष में वे कभी नहीं रहीं। इस उपन्यास की भूमिका में भी वे लिखती हैं—‘साहित्य का लक्ष्य मनुष्य के भीतर प्रेम, संयम, समर्पण और त्याग की उदात्त भावनाओं को जाग्रत करना है। ऐसे में यदि साहित्यकार भी मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति को ही उत्तेजित करने का व्यापार करने लगेगा तो यह सृजन तो नहीं ही हुआ।’</p>
<p>एक अनछुए विषय पर लिखा गया अप्रतिम और पठनीय उपन्यास है : ‘अवर्ण महिला कान्स्टेबल की डायरी’।</p>
<p>आस्था पर हमलों और धार्मिक संघर्षों का इतिहास प्राचीन होते हुए भी नित नए विकृत रूपों में समाज को प्रभावित कर रहा है। ऐसे ही एक प्राचीन धार्मिक स्थल की सुरक्षा में लगी अवर्ण महिला कान्स्टेबल अपनी कर्तव्यनिष्ठा का निर्वहन करते हुए आसपास के परिवेश को अपनी पैनी दृष्टि से देखती है और इतिहास तथा वर्तमान की अपनी व्याख्या करती है। नायिकाप्रधान यह उपन्यास अतीत की विसंगतियों के साथ वर्तमान में भी जड़ें जमाए अनेक कुंठाओं एवं आग्रहों के साथ दलित-विमर्श के कई अनछुए पक्षों को रेखांकित करता चलता है।
Book Details
-
ISBN9788183613835
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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“बागेश्वर धाम सरकार – पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अद्भुत यात्रा” सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है—एक युवा साधक से लेकर राष्ट्र की आस्था के केंद्र बन चुके पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक की प्रेरणादायी गाथा। इस पुस्तक में लेखक सचिन चौधरी ने न सिर्फ बागेश्वर धाम सरकार से अपनी पहली मुलाकात, बल्कि पिछले चार वर्षों में उनके साथ हुए अनुभवों, संवादों और आत्मीय क्षणों को सच्चाई और श्रद्धा के साथ शब्दों में पिरोया है। किताब में वर्णित है कि कैसे एक सामान्य से गाँव गढ़ा से शुरू होकर, बाबा का तेज, ज्ञान और दिव्य दृष्टि लोगों के जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन लेकर आए। यह पुस्तक इस बात की साक्षी है कि कैसे बुंदेलखंड की धरती से निकला एक युवा आज करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन गया है। बागेश्वर धाम सरकार की महिमा, श्रद्धालुओं की अडिग भक्ति, खजुराहो जैसे क्षेत्रों पर इसका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, और बाबा के अनदेखे पहलुओं को उजागर करती यह पुस्तक—हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जो आस्था, अध्यात्म और आत्मबल की शक्ति को समझना चाहता है।
Main Barbad Hona Chahti Hoon
- Author Name:
Malika Amar Shaikh +1
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मलिका अमर शेख उस समय मात्र उन्नीस बरस की थीं जब वे मराठी के युग-प्रवर्तक कवि नामदेव ढसाल के साथ विवाह-बन्धन में बँध गईं। लेकिन जल्द ही यह शादी टूट गई। दलित पैंथर्स के सह-संस्थापक नामदेव न तो एक पति के रूप में, न पिता के रूप में, और न ही एक पुरुष के रूप में वैसे निकले जैसी उम्मीद मलिका ने की थी। यह मुख्यतः उस विवाह की कहानी है, जिसमें हम उस स्त्री से मिलते हैं जो एक पुरुष-संसार में अपनी जगह ढूँढ़ने की कोशिश में है। लेकिन यह कहानी मराठी दलित आन्दोलन के अन्तर्विरोधों, मुम्बई शहर, उसके कवियों और एक्टिविस्टों की कहानी भी है। मूल रूप से मराठी में प्रकाशित यह आत्मकथा छपते ही एक सनसनी बन गई थी। व्यक्तिगत बनाम राजनीतिक, वाम विचारधारा बनाम दलित आन्दोलन और अपने पति के प्रति प्रेम और घृणा के बीच फँसी एक स्त्री की यह आत्मकथा कई मायनों में एक दस्तावेज़ की हैसियत रखती है।
Yogigatha, Yogi Adityanath Ki Jivangatha
- Author Name:
Shantanu Gupta
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यह जीवनी आपको अपने चार खंडों में योगी आदित्यनाथ के जीवन के चार पहलुओं से होकर ले जाती है। पुस्तक का आरंभ योगी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के वर्तमान रूप, 2017 की उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति, यू.पी. का सी.एम. चुने जाने के तथ्यों और पंचम तल (यू.पी. के सीएम का दफ्तर) से होता है। दूसरा खंड आपको योगी आदित्यनाथ के पाँच बार के सांसद के रूप में लंबे कार्यकाल, चुनावी जीत, संसद् में उनकी कुशल भागीदारी, उनके तथाकथित विवादित भाषणों की सच्चाई, लव-जिहाद की उनकी सोच के पीछे का तर्क, घर वापसी, हिंदू युवा वाहिनी और भाजपा के साथ उनके संबंध से परिचित कराता है। तीसरे खंड में लेखक अपने पाठकों को गोरखनाथ मठ के महंत अवेद्यनाथ, योगी आदित्यनाथ, उनकी कठोर यौगिक दिनचर्या, नाथ पंथ के गुरुओं और कई दशकों से मठ की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से होकर ले जाते हैं। आखिरी खंड में लेखक अपने पाठकों को उत्तराखंड के इलाके में पले अजय सिंह बिष्ट के बचपन से जुड़ी कुछ बेहद दिलचस्प और उनके अपनों के मुँह से कही बातों के साथ छोड़ देते हैं, जो गायों, खेतों, पहाड़ों, नदियों के बीच पला-बढ़ा और आगे चलकर एक सांसद और मुख्यमंत्री बना।
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