Yaadon Ki Roshni Mein
(0)
Author:
Harishankar ParsaiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
199
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‘यादों की रोशनी में’ परसाई के भाषणों, संस्मरणों, रेखाचित्रों और निबन्धों का संकलन है। वर्ष 1989 में पहली बार प्रकाशित इस पुस्तक में लेखक की जीवन-दृष्टि और सामाजिक सरोकारों का परिचय तो मिलता ही है, उस समय के बारे में भी हमें कई सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।</p> <p>पुस्तक के तीन खंड हैं जिनमें भिन्न-भिन्न प्रकृति की रचनाओं को विभाजित किया गया है। पहले हिस्से में ‘मतवाला और उसकी भूमिका’ जैसा आलेख जहाँ बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की साहित्यिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि से परिचित कराता है, वहीं ‘लेखकों का सचेत और सतर्क दायित्व’ शीर्षक उनका अभिभाषण प्रगतिशील लेखकों और संगठनों की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करता है। दहेज की समस्या को लेकर लिखे गए दो व्यंग्यात्मक आलेख बताते हैं कि परसाई अपने लेखकीय दायित्व को लेकर कितने सजग थे।</p> <p>इनके अलावा श्रीकांत वर्मा, ताज भोपाली और बाबा नागार्जुन पर उनके दिलचस्प संस्मरण भी इस पुस्तक का हिस्सा हैं। कुछ और रचनाओं के अलावा ग़ालिब को लेकर चुटीले अन्दाज में लिखा गया एक व्यंग्य भी इस संकलन में शामिल है जिसमें वे अपने प्रिय शायर को अपने ही ढंग से याद करते हैं।
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‘यादों की रोशनी में’ परसाई के भाषणों, संस्मरणों, रेखाचित्रों और निबन्धों का संकलन है। वर्ष 1989 में पहली बार प्रकाशित इस पुस्तक में लेखक की जीवन-दृष्टि और सामाजिक सरोकारों का परिचय तो मिलता ही है, उस समय के बारे में भी हमें कई सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।</p>
<p>पुस्तक के तीन खंड हैं जिनमें भिन्न-भिन्न प्रकृति की रचनाओं को विभाजित किया गया है। पहले हिस्से में ‘मतवाला और उसकी भूमिका’ जैसा आलेख जहाँ बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की साहित्यिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि से परिचित कराता है, वहीं ‘लेखकों का सचेत और सतर्क दायित्व’ शीर्षक उनका अभिभाषण प्रगतिशील लेखकों और संगठनों की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करता है। दहेज की समस्या को लेकर लिखे गए दो व्यंग्यात्मक आलेख बताते हैं कि परसाई अपने लेखकीय दायित्व को लेकर कितने सजग थे।</p>
<p>इनके अलावा श्रीकांत वर्मा, ताज भोपाली और बाबा नागार्जुन पर उनके दिलचस्प संस्मरण भी इस पुस्तक का हिस्सा हैं। कुछ और रचनाओं के अलावा ग़ालिब को लेकर चुटीले अन्दाज में लिखा गया एक व्यंग्य भी इस संकलन में शामिल है जिसमें वे अपने प्रिय शायर को अपने ही ढंग से याद करते हैं।
Book Details
-
ISBN9789360861728
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Jayee Rajguru: Khurda Vidhroh ke Apratim Krantikari
- Author Name:
Bijay Chandra Rath
- Book Type:

- Description: "प्रखर देशभक्ति, अटूट विश्वास और अदम्य साहस उनके चरित्र की पहचान थी। वे कभी मृत्यु से नहीं डरे और अपने जीवन को उन्होंने मातृभूमि को भेंट कर दिया था। उनकी मृत्यु अमरता की ओर एक कदम था। वे कोई और नहीं, शहीद जयकृष्ण महापात्र उपाख्य जयी राजगुरु हैं, जो ओडिशा में खोर्र्धा राज्य के राजा के राजगुरु थे, जिन्होंने सन् 1804 में इतिहास को बदलने का साहस किया। यह उल्लेखनीय है कि खोर्र्धा भारत के अंतिम स्वतंत्र क्षेत्र ओडिशा का तटीय राज्य था, जो 1803 में अंग्रेजों के हाथों में आया था। तब तक शेष भारत पहले ही ब्रिटिश शासन के अधीन आ चुका था। संयोग से अगले वर्ष, यानी 1804 में ओडिशा के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था, जो ओडिशा में ‘पाइक विद्रोह’ की शुरुआत थी। खोर्र्धा विद्रोह-1804 के नाम से ख्यात यह विद्रोह वास्तव में कई मायनों में एक जन-विद्रोह का रूप ले चुका था। भारतीय स्वतंत्रता के इस प्रारंभिक युद्ध के नायक जयकृष्ण महापात्र थे, जो कि शहीद जयी राजगुरु (1739-1806) के रूप में अधिक लोकप्रिय हुए। इस महान् जननेता और स्वतंत्रता सेनानी का जीवन निस्स्वार्थ बलिदान, अदम्य साहस और अप्रतिम देशभक्ति की गाथा है, जिसे सन् 1806 में अंग्रेजों द्वारा किए गए क्रूर कृत्य के साथ समाप्त कर दिया गया। उनका शानदार नेतृत्व, तीक्ष्ण कूटनीति और राज्य का सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन के लिए उनका योगदान राष्ट्रीय इतिहास में प्रेरक है। यह दुर्भाग्य है कि राष्ट्र की स्मृति में उन्हें उचित स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। —श्रीदेब नंदा, अध्यक्ष, शहीद जयी राजगुरु न्यास"
Satrein Aur Satrein
- Author Name:
Anita Rakesh
- Book Type:

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Description:
यह पुस्तक कथाकार मोहन राकेश के बारे में है जिसे लिखा है—अनीता राकेश ने। यह अनीता जी के अपने बारे में भी है; राकेश जी से उनके रिश्ते के बारे में भी। और इसकी विशेषता है, एक ऐसी क़लम से लिखा जाना जिसने लिखा बहुत कम, और जिया बहुत ज़्यादा। यही वजह है कि आप इसे एक ही बैठक में पढ़ने को बाध्य हो जाते हैं।
मोहन राकेश का अपना जीवन अनेक विडम्बनाओं, दु:खों और परेशानियों में बीता, उनका वैवाहिक जीवन कभी उस तरह सन्तोषजनक नहीं रहा, जैसे सामान्यत: लोगों का होता है। अनीता जी ने जब उनके जीवन में क़दम रखा, तब वे उनसे बहुत छोटी थीं, बहुत लम्बे समय उनके साथ रह भी नहीं पाईं। इससे पहले कि उनके रिश्ते एक स्थिर जीवन में बदलते, राकेश दुनिया छोड़ गए।
इस किताब में उन पेचीदगियों का वर्णन है जिससे कुछ समय के साथ के दौरान, ख़ासकर अनीता जी गुज़रीं, और राकेश भी। इसके बाद उस समय की कथा है जब वे अचानक अकेली रह गईं। एक तरफ़ भावनात्मक अकेलापन और दूसरी तरफ़ जीवन की व्यावहारिक चुनौतियाँ। इस किताब के पन्नों पर इस सबको बिना किसी आलंकारिकता के प्रस्तुत कर दिया गया है।
यह इस संस्मरण शृंखला की दूसरी पुस्तक है। इसमें हम मोहन राकेश के बारे में जितना जान पाते हैं, उतनी ही उस दौर के साहित्यिक माहौल के बारे में भी, और उतना ही मनुष्य जीवन की विकट सच्चाइयों के बारे में भी।
Meri Haqiqat
- Author Name:
Bhalchandra Mungekar
- Book Type:

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Description:
व्यक्ति-विकास की एक पारम्परिक धारणा रही है—या तो वह आनुवंशिक से होता है या परिवेशजन्य। लेकिन इससे परे जाकर मनुष्य-विकास की यात्रा में यदि किसी पर व्यक्ति, विचार या ग्रन्थ का प्रभाव होता है तो वह वंश और परिवेश को भी लाँघकर एक अपनी मिसाल क़ायम करता है। इसका जीता-जागता उदाहरण डॉ. भालचंद्र मुणगेकर की यह आत्मकथा है : ‘मेरी हक़ीक़त’। यह आत्मकथा लेखक के होश सँभालने तक के अठारह वर्ष की ऐसी विकासगाथा है जो ‘दलित’ सीमा को लाँघकर मनुष्य की जिजीविषा का एक अदम्य स्रोत बनकर उभर आती है।
दलित बस्ती में जन्म, ‘युवक क्रान्ति दल’ में जुझारू युवापन। प्रौढ़ावस्था में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर, महात्मा फुले, कार्ल मार्क्स, वि.स. खांडेकर जैसी शख़्सियतों के जीवन, साहित्य और दर्शन का उनके जीवन पर अमिट प्रभाव पड़ा। रिजर्व बैंक के वरिष्ठ अधिकारी, अर्थशास्त्र के प्राध्यापक, मुम्बई विश्वविद्यालय के पहले दलित कुलपति और उससे भी आगे जाकर भारतवर्ष के योजना आयोग के सदस्य बनने तक का करिश्मा कोई जादुई चमत्कार नहीं है, बल्कि इसके पीछे जाति और अस्पृश्यता निर्मूलन, स्त्री-पुरुष समानता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक समाजवाद और मानवतावाद जैसे मूल्यों की पक्षधरता का कैनवस विस्तार लिए हुए है।
‘मेरी हक़ीक़त’ आत्मकथा व्यक्ति-विकास में मूल्यों, विचारों, व्यक्ति-प्रभावों, जीवनधारा व दर्शन की भूमिका को रेखांकित करती है और इसीलिए न सिर्फ़ वह प्रेरक बन जाती है अपितु पठनीय भी।
—सुनीलकुमार लवटे
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