It's Not That Hard
(1)
Author:
Manas Shalini MukundPublisher:
Inkfeathers PublishingLanguage:
EnglishCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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When 16-year-old Manas complains of back pain, his parents assume it to be a result of his back-to-back cricket matches. Little do they know that this is going to turn out to be a malignant tumour which leads to partial paralysis. The Covid pandemic also sets in, adding its own complications to the mix. What kind of battle are this life-loving, strong-willed teenager and his family compelled to face? This boy's journey full of determination and courage provokes a question: How rock solid does one need to be to go through a tunnel this deep and walk out to be able to say, 'It's not that hard'?
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When 16-year-old Manas complains of back pain, his parents assume it to be a result of his back-to-back cricket matches. Little do they know that this is going to turn out to be a malignant tumour which leads to partial paralysis. The Covid pandemic also sets in, adding its own complications to the mix. What kind of battle are this life-loving, strong-willed teenager and his family compelled to face?
This boy's journey full of determination and courage provokes a question: How rock solid does one need to be to go through a tunnel this deep and walk out to be able to say, 'It's not that hard'?
Book Details
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ISBN978-93-90882-53-3
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Pages90
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginN/A
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- Description: Veer Savarkar was the first man who called the mutiny of 1857 ‘A War of Independence’. Until his time, no Indian had dared to say so. The martyrs of 1857 are really fortunate that they got such a historian to tell their history who himself was both a historian and a creator of history. At times, we visualise Veer Savarkar coloured in the red colour of that revolution, as if he himself was present on the battlefield and participated in the heroic war. At other times, we see him patiently analyse the strengths and weaknesses of both sides—why the mutineers lost and why the British won. The way he analyses the politico-military aspects of the revolution shows his wisdom as a youth of 26 years. The Indian War of Independence, 1857, is a step by step account of the uprising of Indian Hindus and Muslims against the ruthless British rulers. Tracing footsteps of the barefooted, undernourished and almost unarmed Indian masses challenging the British bullets by the sheer force of their will power, the author establishes beyond an iota of doubt that the uprising was a War of Independence and not a mere Sepoy Mutiny as dubbed by the British.
Ek Jindagi Kafi Nahi
- Author Name:
Kuldeep Nayar
- Book Type:

- Description: यह किताब उस दिन से शुरू होती है जब 1940 में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव' पास किया गया था। तब मैं स्कूल का एक छात्र मात्र था, लेकिन लाहौर के उस अधिवेशन में मौजूद था जहाँ यह ऐतिहासिक घटना घटी थी। यह किताब इस तरह की बहुत-सी घटनाओं की अन्दरूनी जानकारी दे सकती है, जो किसी और तरीक़े से सामने नहीं आ सकती—बँटवारे से लेकर मनमोहन सिंह की सरकार तक। अगर मुझे अपनी ज़िन्दगी का कोई अहम मोड़ चुनना हो तो मैं इमरजेंसी के दौरान अपनी हिरासत को ऐसे ही एक मोड़ के रूप में देखना चाहूँगा, जब मेरी निर्दोषिता को हमले का शिकार होना पड़ा था। यही यह समय था जब मुझे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के हनन का अहसास होना शुरू हुआ। साथ ही, व्यवस्था में मेरी आस्था को भी गहरा झटका लगा था। पाकिस्तान और बांग्लादेश में बहुत-से लोगों के साथ मेरे व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं और मुझे इन सम्बन्धों पर गर्व है। मेरा विश्वास है कि किसी दिन दक्षिण एशिया के सभी देश यूरोपीय संघ की तरह अपना एक साझा संघ बनाएँगे। इससे उनकी अलग-अलग पहचान पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मैं पूरी ईमानदारी से कह सकता हूँ कि नाकामयाबियाँ मुझे उस रास्ते पर चलने से रोक नहीं पाई हैं जिसे मैं सही मानता रहा हूँ और लड़ने लायक़ मानता रहा हूँ। ज़िन्दगी एक लगातार बहती अन्तहीन नदी की तरह है, बाधाओं का सामना करती हुई, उन्हें परे धकेलती हुई, और कभी-कभी ऐसा न कर पाते हुए भी। यह बता पाना बस से बाहर है कि पिछले आठ दशकों से कौन सी चीज़ मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रही है—नियति या संकल्प? या ये दोनों ही? आख़िर तमाशा जारी रहना चाहिए। मैं इस मामले में महान उर्दू शायर ग़ालिब से पूरी तरह सहमत हूँ—शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक। —भूमिका से
Na Rahoon Kisi Ka Dastnigar
- Author Name:
Capt. Abbas Ali
- Book Type:

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Description:
यह किताब भारतीय समाज और उसकी सभ्यता के एक हज़ार वर्षों के परिवर्तनों का संक्षिप्त मगर जीवन्त दस्तावेज़ है। इस किताब में राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान रही धाराओं ख़ासकर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के कांग्रेस छोड़ने और ‘आज़ाद हिन्द फौज़’ का गठन कर देश की आज़ादी के लिए लड़ी गई लड़ाई का ज़िक्र विस्तार से किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि ‘आज़ाद हिन्द फौज़’ के सिपाहियों के साथ स्वतंत्र भारत की सरकार ने कैसा बर्ताव और सुलूक किया।
इस किताब में आज़ादी के बाद क़रीब तीन दशकों तक चले समाजवादी आन्दोलन, उसकी टूट, एका और बिखराव का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है। साथ ही इस आन्दोलन में भाग लेनेवाले प्रमुख नेताओं—आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और उनके सहयोगियों के राजनीतिक चरित्र का वस्तुगत वर्णन और विश्लेषण ईमानदारी के साथ किया गया है। एक मायने में यह आत्मकथा इतिहास की उन विकृतियों की ओर इशारा करती है जो अभी भी जनमानस में गहरी पैठ किए हुए हैं और जिनका सुधारा जाना ज़रूरी है।
Jo Kuchh Rah Gaya Ankaha
- Author Name:
Kedarnath Pandey
- Book Type:

- Description: ‘जो कुछ रह गया अनकहा’ लेखक के जीवन संघर्षों की औपन्यासिक गाथा है। इसे पढ़ते हुए लेखक के जीवन से ही नहीं, युग-युग के उस सच से भी अवगत हो सकते हैं जो अपनी प्रक्रिया में एक दिन एक मिसाल बनता है। उत्तर प्रदेश के ज़िला ग़ाज़ीपुर का गाँव वीरपुर, जहाँ लेखक का जन्म हुआ, यह खाँटी बाँगर मिट्टी का क्षेत्र है। यहाँ सिंचाई के अभाव में तब मुश्किल से ज्वार, बाजरा की फ़सल उपजती। लेखक ने खेती करते हुए पढ़ाई की तो आजीविका के लिए भटकाव की स्थिति से गुज़रना पड़ा। सबसे पहले कानपुर में 60 रुपए मासिक वेतन की नौकरी की, यह नौकरी रास नहीं आई तो नौ माह पश्चात् ही घर आ गए और गाँव के निजी संस्कृत विद्यालय में अध्यापन का कार्य सँभाला। पढ़ने की ललक निरन्तर बनी रही तो धीरे-धीरे एम.ए., एम.एड. तक की शिक्षा प्राप्त कर ली। फिर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के ज़िला सचिव का पद मिला। 1977 में सीवान में अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन हुआ तो सीवान ज़िला इकाई का सचिव पद मिला। फिर 1992 में मुज़फ़्फ़रपुर राज्य संघ में महासचिव हुए। 2008 में अखिल भारतीय शान्ति एकजुटता संगठन के सौजन्य से वियतनाम में आयोजित द्वितीय भारत वियतनाम मैत्री महोत्सव में शिष्टमंडल के सदस्य रहे। समय तेज़ी से परिवर्तित होता गया, लेखक को वह दौर भी देखने को मिला जब दुनिया-भर में शिक्षा और शिक्षकों के समक्ष एक ही प्रकार की चुनौतियाँ आईं। शिक्षा पर निजीकरण और व्यावसायीकरण का ख़तरा मँडराया, जब शिक्षकों के संवर्ग को समाप्त कर अल्पवेतन, अल्प योग्यताधारी शिक्षकों की नियुक्ति कर शिक्षा को पूर्णतः बाज़ार के हवाले कर देने की योजना को बढ़ावा मिला। लेखक इससे विचलित तो नहीं हुआ परन्तु शारीरिक तौर पर अस्वस्थता ने जीवन-नौका को डुबाने की कगार पर ला दिया। अन्ततः एन्जियोप्लास्टी के कष्ट को भी झेलना पड़ा। एक बार फिर जीवन संघर्षों से जूझने को बाध्य हो गया। तब लगा कि जीवन संघर्षों से ही निखरता है जैसे सोना अग्नि में तपकर चमकता है। हम कह सकते हैं कि यह पुस्तक अपने आख्यान में जीवन्त तो है ही, अपने पाठ में जीने और जीतने की कला भी सिखाती है।
Customer Reviews
4 out of 5
Book
03/01/2023
Sarvani P
From the book: “No matter what, I would not accept things the way they were. My goal was simple. I will play cricket again. I will stand up, start walking, start running, and will be on field again. To achieve this, I will take any step that would make my progress easier and achieve my goal” my insights: As a doctor I shall see cancer patients day in and out. I shall see their suffering but only few can explain them to others Manas is one among them. Manas - A cheerful athletic 16 year old boy with many dreams for future and life, diagnosed with B-cell lymphoblastic lymphoma and suffered from partial paralysis. Through this book he gave detailed insights of his and his family struggles physically and emotionally and how they together beat the bad phase even in the COVID time. How keeping a goal, a vision for future and with positive attitude one can overcome the hardest struggles even - can be learnt from Manas I really recommend this book at least once to know how important our mindset to overcome the hurdles and achieve success happy reading.