Diddi : Shivani Ki Kahani
(0)
Author:
Ira PandePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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‘दिद्दी : शिवानी की कहानी’ में हम हिन्दी की अत्यन्त लोकप्रिय कथाकार शिवानी को उनकी बेटी की निगाहों से देखते हैं। यह भी कह सकते हैं कि यहाँ हमें वह शिवानी दिखती हैं जिन्हें हम उनकी साहित्यिक छवि में अक्सर नहीं पाते। हाँ, उनकी कहानियों और उनके पात्रों में हम ज़रूर उस स्त्री को पहचान सकते हैं जो एक ख़ास वातावरण में एक ख़ास दृष्टि से संसार को देख रही थी। यह किताब उनके इस वातावरण को भी प्रकाशित करती है, और उसके बीच बनती एक कथाकार की यात्रा को भी। एक भारतीय घर-परिवार की संस्तरीकृत संरचना में मानवीय संवेदना के अनेकानेक रंगों के साथ उन्होंने उसकी विडम्बनाओं को कैसे समझा और फिर उसे अपनी कथा ऋचाओं में अंकित किया, यह वृत्तान्त हमें यह जानने में भी मदद करता है। शिवानी के साथ इस पुस्तक में कुमाऊँनी समाज की संस्कृति और समाज के विभिन्न पक्षों से भी हमारा परिचय होता है, और उनकी कुछ चर्चित रचनाओं और उनकी पृष्ठभूमि से भी।
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‘दिद्दी : शिवानी की कहानी’ में हम हिन्दी की अत्यन्त लोकप्रिय कथाकार शिवानी को उनकी बेटी की निगाहों से देखते हैं।
यह भी कह सकते हैं कि यहाँ हमें वह शिवानी दिखती हैं जिन्हें हम उनकी साहित्यिक छवि में अक्सर नहीं पाते। हाँ, उनकी कहानियों और उनके पात्रों में हम ज़रूर उस स्त्री को पहचान सकते हैं जो एक ख़ास वातावरण में एक ख़ास दृष्टि से संसार को देख रही थी।
यह किताब उनके इस वातावरण को भी प्रकाशित करती है, और उसके बीच बनती एक कथाकार की यात्रा को भी। एक भारतीय घर-परिवार की संस्तरीकृत संरचना में मानवीय संवेदना के अनेकानेक रंगों के साथ उन्होंने उसकी विडम्बनाओं को कैसे समझा और फिर उसे अपनी कथा ऋचाओं में अंकित किया, यह वृत्तान्त हमें यह जानने में भी मदद करता है।
शिवानी के साथ इस पुस्तक में कुमाऊँनी समाज की संस्कृति और समाज के विभिन्न पक्षों से भी हमारा परिचय होता है, और उनकी कुछ चर्चित रचनाओं और उनकी पृष्ठभूमि से भी।
Book Details
-
ISBN9789360867584
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम’ ने कहा है—लोक पर जब कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है परन्तु जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारणार्थ पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ। अवतार श्रीराम का यह कथन हनुमानजी के महान व्यक्तित्व का बहुत सुन्दर प्रकाशन कर देता है। श्रीराम का कितना अनुग्रह है उन पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन के श्रेय का सौभाग्य सदैव उन्हीं को प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान कि जो श्रीराम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं। भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अपूर्व, अद्भुत, अप्रतिम, एकान्त भक्ति के कारण अन्य की इसी प्रकार की भक्ति का आलम्बन बन जानेवाला हनुमान जैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व में नहीं। यही कारण है कि संस्कृत से लेकर समस्त मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में श्री हनुमान में परम पावन चरित्र का गान किया गया है और उनके मन्दिर भारतवर्ष के प्रत्येक कोने में पाए जाते हैं। इस पुस्तक की रचना में ‘वाल्मीकीय रामायण’, ‘अध्यात्म रामायण’ तथा ‘आनन्द रामायण’ से विशेष सहायता ली गई है। ‘स्कंदपुराण’, ‘पद्मपुराण’ आदि एवं ‘महाभारत’ (वनपर्व) भी रचना में सहायक सिद्ध हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों—‘रामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ एवं ‘कम्बन’ रचित ‘कम्ब रामायण’ (तमिल रचना) से भी यत्र-तत्र सहायता ग्रहण की गई है। इनके अतिरिक्त श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ रचित ‘आंजनेय' कल्याण पत्रिका के ‘हनुमानांक’ (1975 ई.) तथा डॉ. गोविन्दचन्द्र राय की पुस्तक ‘हनुमान के देवत्व और मूर्ति का विकास’ आदि से भी यथावसर सामग्री प्राप्त की गई है।
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