Shiksha, Samaj Aur Bhavishya
(0)
Author:
Shyamacharan DubePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
595
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राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के शिक्षा एवं समाज–वैज्ञानिक प्रो. श्यामाचरण दुबे की इस पुस्तक में शिक्षा, परम्परा और विकास के अन्तर्सम्बन्धों पर चौदह महत्त्वपूर्ण निबन्ध शामिल हैं। इनमें तीसरी दुनिया के शैक्षिक परिदृश्य का समाजशास्त्रीय दृष्टि से सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।</p> <p>प्रो. दुबे की यह पुस्तक वैकल्पिक भविष्य के निर्माण में शिक्षा की भूमिका पर जो स्थापनाएँ प्रस्तुत करती हैं, वे निश्चय ही मौलिक और प्रभावशाली हैं। इसके अतिरिक्त यह कृति भारतीय शिक्षा–व्यवस्था पर भी लेखक की पैनी नज़र से परिचित कराती है। इस सन्दर्भ में सुधार की दिशा में जो दिशा–निर्देश दिए गए हैं, उनकी प्रासंगिकता भी निर्विवाद है।</p> <p>कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रो. दुबे की यह कृति सम्बद्ध विषय का पूरी गम्भीरता और गहराई से विश्लेषण करती है।
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राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के शिक्षा एवं समाज–वैज्ञानिक प्रो. श्यामाचरण दुबे की इस पुस्तक में शिक्षा, परम्परा और विकास के अन्तर्सम्बन्धों पर चौदह महत्त्वपूर्ण निबन्ध शामिल हैं। इनमें तीसरी दुनिया के शैक्षिक परिदृश्य का समाजशास्त्रीय दृष्टि से सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।</p>
<p>प्रो. दुबे की यह पुस्तक वैकल्पिक भविष्य के निर्माण में शिक्षा की भूमिका पर जो स्थापनाएँ प्रस्तुत करती हैं, वे निश्चय ही मौलिक और प्रभावशाली हैं। इसके अतिरिक्त यह कृति भारतीय शिक्षा–व्यवस्था पर भी लेखक की पैनी नज़र से परिचित कराती है। इस सन्दर्भ में सुधार की दिशा में जो दिशा–निर्देश दिए गए हैं, उनकी प्रासंगिकता भी निर्विवाद है।</p>
<p>कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रो. दुबे की यह कृति सम्बद्ध विषय का पूरी गम्भीरता और गहराई से विश्लेषण करती है।
Book Details
-
ISBN9788171195459
-
Pages131
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: For centuries, India has been a land of growth and development. The rich history of India's ancestors and their many achievements in art, science, engineering, and philosophy have left a lasting legacy that continues to influence the modern world. This book is a tribute to the generations of Indians who have helped shape the country and its culture. From the prehistoric Indus Valley Civilization to the development of the modern Indian Republic, this book will explore the various stages of Indian development. It will look at the historical contributions of India's ancestors, as well as their impact on modern society. The book will also consider the current state of Indian development, including the challenges and successes of recent years. In addition, this book will provide readers with an overview of Indian culture, including its literature, music, art, religion, and politics. It will also discuss the various social issues that have affected India over the centuries, such as poverty, gender inequality, and caste discrimination. This book will be an invaluable resource for anyone interested in learning more about India's fascinating history and its place in the world today.
Bharat Aur Bharatiya Mansikata
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description: यदि इतिहास का सम्बन्ध सामान्य जन से है तो इतिहासकार उन संस्थाओं, विश्वासों, आग्रहों और विचारों की उपेक्षा नहीं कर सकता जिनसे जनसाधारण की मानसिकता निर्मित होती है। लेकिन आज हम समाज-चिन्तन के एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं जहाँ इतिहास पर ही बात करना खतरनाक होता जा रहा है। एक मनस्वी के रूप में इतिहासकार खत्म हो रहा है। उसका पुनर्जन्म एक योद्धा के रूप में हो रहा है। ‘भारत और भारतीय मानसिकता’ पुस्तक में शामिल निबन्ध इतिहास-लेखन की वास्तविक भूमिका को रेखांकित करते हुए भारतीय समाज की प्राचीनतम अवस्था से लेकर आधुनिक काल तक के कुछ प्रश्नों को उठाते हैं। मुख्य रूप में जो एक बात इन आलेखों में उभरकर आती है वह है एक राष्ट्र के रूप में भारतीय चेतना के विकास का इतिहास और यह प्रश्न कि भारत के सन्दर्भ में ‘नेशन’ की यूरोपीय उन्मादी अवधारणा का कोई अर्थ है या नहीं। ‘नेशन’ की मौजूदा अवधारणा औद्योगिक क्रान्ति के बाद तेजी से विकास करने वाले देशों के व्यवसायियों की जरूरत थी, फिर ऐसा हुआ कि हर देश उसे एक आदर्श मानने लगा। पुस्तक में शामिल ‘आदिम भारत में भाषाओं का अन्तर्मिलन’ भारतीय बोलियों की शब्दावली के अध्ययन की जरूरत को रेखांकित करता है जिससे दसियों हजार साल पहले के विषय में अहम जानकारियाँ मिल सकती हैं जब अनेक भाषाभाषी समूह इस महाद्वीप में विचरण कर रहे थे। बहुलता में एकात्मता के ऐसे ही सूत्रों की तलाश करती यह पुस्तक आज हर उस पाठक की समझ को विस्तार देगी, जो इस देश की सहिष्णु चेतना को समझना-जानना चाहता है!
Ramuva-Kaluva-Budhiya Aur Rashtrawad
- Author Name:
Ram Milan
- Book Type:

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Description:
‘रमुआ-कलुआ-बुधिया और राष्ट्रवाद’ पुस्तक एक गम्भीर विषय है। रमुआ-कलुआ-बुधिया दरअसल सिर्फ़ नाम न होकर आम-जनमानस का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें कभी जाति के नाम पर कभी धर्म के नाम पर तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर छला जाता है।
भारत के परिप्रेक्ष्य में आज जब भुखमरी, बेरोज़गारी एवं आर्थिक विफलता जैसे गम्भीर मुख्य मुद्दों को छद्म राष्ट्रवाद के सहारे कुचल देने का प्रायोजित षड्यंत्र चल रहा हो तो यह पुस्तक राष्ट्रवाद के विमर्श में आम जनमानस की आकांक्षाओ का प्रतिनिधित्व करती दिखाई पड़ती है।
देश में अफ़ीमचियों से भी अधिक ख़तरनाक छद्म राष्ट्रवादी आज गली-नुक्कड़ और चौराहों पर आसानी से देखे जा सकते हैं, या टेलीविज़न चैनलों और अख़बार के पन्नों पर तो इनकी भरमार है।
राष्ट्रवाद का आधार तर्क और वैचारिकता ही है। मनुष्य और पशु में मात्र ‘विचारों’ का अन्तर होता है। आज के परिवेश में जहाँ एक तरफ़ ‘विचारों’ की हत्या की जा रही हो तो ऐसी पुस्तक पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
राष्ट्रवाद की परिकल्पना जाति, धर्म, मज़हब, सम्प्रदाय, लिंग, भाषा, संस्कृति, क्षेत्र, उपनिवेश, राजनीति जैसे संकीर्ण दायरों को तोड़ते हुए सार्वभौमिक राष्ट्रवाद के सन्निकट दिखाई पड़ती है जिसके केन्द्र में निश्चित तौर पर रमुआ-कलुआ-बुधिया अर्थात् आम-जनमानस ही हैं।
सामाजिक विमर्श में रुचि रखनेवाले अध्येताओं, छात्रों एवं विद्वानों के लिए यह पुस्तक उपयोगी हो सकेगी।
सुबचन राम
प्रधान आयकर आयुक्त
भारत सरकार
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