Bharat Mein Mahila Andolan : Vimarsh Aur Chunautiyan
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Author:
Sadhna AryaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
399
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भारत में महिला आन्दोलनों ने लम्बी दूरी तय की है और वर्तमान में भी उनकी निरन्तरता बनी हुई है। उन्होंने न केवल महिलाओं के मुददों पर बने मौन को तोड़ा है बल्कि अलग-अलग तबकों की महिलाओं द्वारा छेड़े गए संघर्षों की विशिष्टताओं को समझने के साथ-साथ पितृसत्ता की जटिलताओं और उनके अन्तर्सम्बन्धों के बारे में हमारी समझ को भी गहरा किया है। परिवार, विवाह, समुदाय, जाति, यौनिकता और श्रम को नए सिरे से परिभाषित कर महिलाओं पर होनेवाली हिंसा और उत्पीड़न के तमाम रूपों को उजागर किया है।</p> <p>महिलाओं के अनुभवों, संघर्षों और उनके सामने खड़ी चुनौतियों को लेकर उपलब्ध अकादमिक सामग्री और नारीवादी शोध व अध्ययनों ने सामाजिक विज्ञानों में प्रचलित शब्दों, अवधारणाओं और पद्धतियों की आलोचनात्मक समीक्षा पेश की है और यह सन्तोषजनक है कि अलग-अलग अनुशासनों के पाठयक्रम में उसे स्थान मिला है। लेकिन यह भी सच है कि अब भी हिन्दी में ऐसी सामग्री का अभाव बना हुआ है।</p> <p>‘भारत में महिला आन्दोलन’ पुस्तक इसी कमी को पूरा करना चाहती है और महिलाओं के आन्दोलनों और अध्ययन के सामने खड़े तमाम मुददों और बहसों पर एक व्यापक नज़रिया पेश करती है।
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भारत में महिला आन्दोलनों ने लम्बी दूरी तय की है और वर्तमान में भी उनकी निरन्तरता बनी हुई है। उन्होंने न केवल महिलाओं के मुददों पर बने मौन को तोड़ा है बल्कि अलग-अलग तबकों की महिलाओं द्वारा छेड़े गए संघर्षों की विशिष्टताओं को समझने के साथ-साथ पितृसत्ता की जटिलताओं और उनके अन्तर्सम्बन्धों के बारे में हमारी समझ को भी गहरा किया है। परिवार, विवाह, समुदाय, जाति, यौनिकता और श्रम को नए सिरे से परिभाषित कर महिलाओं पर होनेवाली हिंसा और उत्पीड़न के तमाम रूपों को उजागर किया है।</p>
<p>महिलाओं के अनुभवों, संघर्षों और उनके सामने खड़ी चुनौतियों को लेकर उपलब्ध अकादमिक सामग्री और नारीवादी शोध व अध्ययनों ने सामाजिक विज्ञानों में प्रचलित शब्दों, अवधारणाओं और पद्धतियों की आलोचनात्मक समीक्षा पेश की है और यह सन्तोषजनक है कि अलग-अलग अनुशासनों के पाठयक्रम में उसे स्थान मिला है। लेकिन यह भी सच है कि अब भी हिन्दी में ऐसी सामग्री का अभाव बना हुआ है।</p>
<p>‘भारत में महिला आन्दोलन’ पुस्तक इसी कमी को पूरा करना चाहती है और महिलाओं के आन्दोलनों और अध्ययन के सामने खड़े तमाम मुददों और बहसों पर एक व्यापक नज़रिया पेश करती है।
Book Details
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ISBN9789391950309
-
Pages352
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Author Name:
Sanjay Jha
- Book Type:

- Description: झारखंड में सब कुछ है। यहाँ कुछ भी नहीं है। सरकार है। प्रशासन है। नेता है। पुलिस है। वायदे हैं। भाषण है। योजना है। घोटाला है। संघर्ष है। जीवन है। जल है। जमीन है। आदिवासी है। तमाशा है। लूट है। भ्रष्टाचार है। अखबार है। समाचार है। अदालत है। वकील है। न्याय है। अन्याय है। भूख है। गरीबी है। फटे हालजी है। कंगाली है। यहाँ तो रोटी पर नून नहीं है। खनिज है। संपदा है। बेरोजगारी है। मजदूर है। किसान है। गाँव है। खेत है। खलिहान है। सब उजड़ रहे हैं। जमीन छिन रही है। संघर्ष जारी है। पत्रकारिता के अखबारी दुनिया से अलग झारखंड संक्रमण के दौर में है। पत्रकारिता भी इसका शिकार है। इसलिए बिना अक्षरों का मुखौटा लगाए सच बयान करने का साहस कर रहा हूँ। पत्रकारिता तथा उसके सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जीवन पर पड़ रहे प्रभाव का विश्लेषण किया गया है, जो सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए रुचिकर है।
Sadharan Log, Asadharan Shikshak :Bharat Ke Asal Nayak
- Author Name:
S. Giridhar
- Book Type:

- Description: सरकारी स्कूल असल मायने में ‘पब्लिक स्कूल’ हैं। ये हर व्यक्ति के और हर जगह काम आते हैं—इसमें सबसे पिछड़े इलाक़ों के सबसे ज़्यादा वंचित लोग भी शामिल हैं। पिछले लगभग दो दशकों से एस. गिरिधर अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के साथ अपने काम के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रमण करते हुए सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को क़रीब से देखते रहे हैं। इन वर्षों में वे ऐसे सैकड़ों सरकारी स्कूल शिक्षकों से मिले हैं जो अपनी देखरेख में आने वाले बच्चों की ज़िन्दगियों को बेहतर बनाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध रहे हैं। ये वे शिक्षक हैं जो हर सीमा को लाँघने का साहस रखते हैं क्योंकि इनका मानना है कि हर बच्चा सीख सकता है।
Vishwas Aur Andhvishwas
- Author Name:
Narendra Dabholkar
- Book Type:

-
Description:
विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Vikas O Arthatantra
- Author Name:
Narendra Jha
- Book Type:

- Description: Social Economic
The Feminists
- Author Name:
JULIE GUIOL +1
- Book Type:

- Description: We are all human. But for women, equality and the right to self-determination are far from being acquired! What are the conditions of women throughout the world? How have feminist movements been constructed over time? How can men be a part of feminism? The POCQQ collection deals with current topics with the perspective that allows everyone to form their own opinion.
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