Yugdrashta-Pathsrashta
(0)
Author:
Devraj Singh JadaunPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
300
₹ 240 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी सौ वर्षों की यात्रा में समाज-जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। असंख्य तपोनिष्ठ कार्यकर्ताओं ने माँ भारती को परम वैभव पर पहुँचाने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। इनकी अहर्निश राष्ट्र-साधना ने समाज में समरसता, समानता, चरित्र-निर्माण, राष्ट्रभक्ति और सत्यनिष्ठ-सरल जीवन जीने के पथ को आलोकित किया है। संघ-संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार, द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी व तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरसजी ने अपने त्यागपूर्ण, संयमित व प्रेरक जीवन से संघ के स्वयंसेवकों को 'राष्ट्र सर्वोपरि' का मूलमंत्र दिया। अपने स्वयं के सरल सौम्य जीवन से उन्होंने प्रेरित किया, जीवन की सार्थकता से परिचित करवाया और देशसेवा के लिए उद्यत किया। यह पुस्तक इन तीन परमपूजनीय सरसंघचालकों के जीवन के ऐसे प्रसंगों का संकलन है, जो सदैव न केवल स्वयंसेवकों वरन् राष्ट्र के प्रति सरोकार रखनेवाले हर व्यक्ति को प्रेरित करेंगे, उनमें राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत् करेंगे।"
Read moreAbout the Book
"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी सौ वर्षों की यात्रा में समाज-जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। असंख्य तपोनिष्ठ कार्यकर्ताओं ने माँ भारती को परम वैभव पर पहुँचाने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। इनकी अहर्निश राष्ट्र-साधना ने समाज में समरसता, समानता, चरित्र-निर्माण, राष्ट्रभक्ति और सत्यनिष्ठ-सरल जीवन जीने के पथ को आलोकित किया है।
संघ-संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार, द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी व तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरसजी ने अपने त्यागपूर्ण, संयमित व प्रेरक जीवन से संघ के स्वयंसेवकों को 'राष्ट्र सर्वोपरि' का मूलमंत्र दिया। अपने स्वयं के सरल सौम्य जीवन से उन्होंने प्रेरित किया, जीवन की सार्थकता से परिचित करवाया और देशसेवा के लिए उद्यत किया।
यह पुस्तक इन तीन परमपूजनीय सरसंघचालकों के जीवन के ऐसे प्रसंगों का संकलन है, जो सदैव न केवल स्वयंसेवकों वरन् राष्ट्र के प्रति सरोकार रखनेवाले हर व्यक्ति को प्रेरित करेंगे, उनमें राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत् करेंगे।"
Book Details
-
ISBN9789355624062
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
31 GREEN HABITS TO SAVE OUR PLANET
- Author Name:
Shri Rohit Mehra (Irs)
- Book Type:

- Description:
Rohit Mehra is an IRS officer of 2004 batch. He is a man of versatile hobbies, passions and creativity. He is an author, blogger and motivational speaker. He is a passionate environmentalist and pioneer of vertical gardens in India. He is known as Greenman and has created more than 40 micro- jungles using the principles of Vruksayurveda and Miyawaki. He has planted nearly 7.50 lakhs plants in nearly 4 years and created more than 550 vertical gardens. He has spearheaded the movement of seed-balls in India and has got made and distributed close to 20 lakhs seed-balls in last 3 years which in itself is a record. He has created 2 mobile applications by the name ‘Sundari’ and ‘Election-Eye’. He has been the guiding force to create a mobile app ‘Tirth-yatra’. He is running a successful blog on personality development by the name ‘Design Your Destiny’. He has also written articles on various topics which have featured in national newspapers.
Bharatvarsh Mein Jatibhed
- Author Name:
Kshitimohan Sen Shastri
- Book Type:

- Description:
भारतवर्ष में सबसे ऊँची जाति ब्राह्मण है। ब्राह्मणों में ऊँच-नीच के असंख्य भेद हैं। प्रदेश-गत भेद भी गिनकर ख़तम नहीं किए जा सकते। इसलिए यह कहना असम्भव है कि ब्राह्मणों की कौन श्रेणी सबसे ऊँची है। दक्षिण भारत में स्पर्श-विचार और भी प्रबल है। वहाँ जिनके स्पर्श से ब्राह्मण लोग अपवित्र नहीं होते और जिनका जल ग्रहणीय होता है, वे ही अच्छी जातियाँ हैं। नीच जाति का छुआ जल ग्रहण करने योग्य नहीं होता। जिनके छूने से मिट्टी के बर्तन भी अपवित्र हो जाते हैं, वे और भी नीच हैं। उनके भी नीचे वे हैं जिनके छूने से धातु के पात्र भी अपवित्र हो जाते हैं। इनके भी नीचे वे जातियाँ हैं, जो यदि मन्दिर के प्रांगण में प्रवेश करें तो मन्दिर अपवित्र हो जाता है। कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं जिनके किसी ग्राम या नगर में प्रवेश करने पर समूचा गाँव-का-गाँव अशुद्ध हो जाता है।
आजकल इस छूआछूत के विषय में नाना स्थानों में लोक-मत हिल चुका है। जो लोग सौभाग्यवश ऊँची जाति में उत्पन्न हुए हैं, वे प्राय: इतना विचार पसन्द नहीं करते, और जो लोग दुर्भाग्यवश तथाकथित नीची जातियों में जन्मे हैं, वे अब अपने को एकदम हीन और पतित मानने को तैयार नहीं है, किन्तु नीची जातियों में अपने से नीच जातियों को दबाकर रखने का प्रयास प्राय: ही दिखाई दे जाता है।
स्वामी दयानन्द का कहना है कि ‘‘भारतवर्ष में असंख्य जातिभेद के स्थान पर केवल चार वर्ण रहें। ये चार वर्ण भी गुण-कर्म के द्वारा निश्चित हों, जनम से नहीं। वेद के अधिकार से कोई भी वर्ण वंचित न हो।’’
महात्मा गाँधी अस्पृश्यता के विरोधी हैं, किन्तु वर्णाश्रम व्यवस्था के विरोधी नहीं हैं। वर्णाश्रम मनुष्य के स्वभाव में निहित है, हिन्दू-धर्म ने उसे ही वैज्ञानिक रूप में प्रतिष्ठित किया है। जन्म से वर्ण निर्णीत होता है, इच्छा करके कोई इसे बदल नहीं सकता।
Ancestral Indian Development
- Author Name:
Dr.Sanjay Rout
- Book Type:

- Description:
For centuries, India has been a land of growth and development. The rich history of India's ancestors and their many achievements in art, science, engineering, and philosophy have left a lasting legacy that continues to influence the modern world. This book is a tribute to the generations of Indians who have helped shape the country and its culture. From the prehistoric Indus Valley Civilization to the development of the modern Indian Republic, this book will explore the various stages of Indian development. It will look at the historical contributions of India's ancestors, as well as their impact on modern society. The book will also consider the current state of Indian development, including the challenges and successes of recent years. In addition, this book will provide readers with an overview of Indian culture, including its literature, music, art, religion, and politics. It will also discuss the various social issues that have affected India over the centuries, such as poverty, gender inequality, and caste discrimination. This book will be an invaluable resource for anyone interested in learning more about India's fascinating history and its place in the world today.
Sahitya Ka Uttar Samajshastra
- Author Name:
Sudhish Pachauri
- Book Type:

- Description:
गोष्ठियों के रूप अभी भी शादी-ब्याह की तरह हैं। एक दूल्हा, बाक़ी बाराती। गोष्ठी के मंच जातिभेद कराते हैं। ऊपर महान बैठेंगे। नीचे दासानुदास। एकदम विनय पत्रिका वाली हाइरार्की। प्रगतिशील, रूपवादी सब ये ही करते हैं।
बहस न सही, तू-तू, मैं-मैं ही सही। कुछ तो है। बुरा क्या है? नए पूँजीवाद में ये तो होना ही है।
मशाल टार्च बन चुकी है। राजनेता के पास जो ब्रांड टार्च है, वही साहित्यकार के पास है। ‘साहित्य और राजनीति’ की चिर बहस अब मर चुकी है। यही अच्छा है।
पढ़ें तो जानें, क्योंकि ये ‘अन्दर की बात है’। साहित्य का असल समाजशास्त्र है। यह ‘अन्दर की बात’ बहुत जटिल है रे!
और हम सब जो ‘बचे-खुचे’ हैं, तरह-तरह की ‘पूरणीय क्षतियाँ’ हैं जो हर गोष्ठी, सेमिनार, शोकसभा में मौजूद रहती हैं। होंगी कोई हज़ार-पाँच सौ। हम सब अपूरणीय ‘क्षति’ करके ही जाएँगे। बच्चो सावधान!
Kinnar : Abujh Rahasyamay Jeevan
- Author Name:
Sharad Dwivedi
- Book Type:

- Description:
‘किन्नर : अबूझ रहस्यमय जीवन’ में किन्नरों के दर्द, उनकी खूबी, उनके संस्कार, संस्कृति व परम्पराओं को समाहित किया गया है।
थर्ड जेंडर अर्थात किन्नर कानूनी दायरे में नहीं आते। इनसान होने के बावजूद किन्नर उपेक्षित हैं। इनके हित में कानून तो बने लेकिन उसका जमीनी स्तर पर पालन नहीं हो रहा है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि किन्नर न स्त्री हैं और न ही पुरुष। फिर उन्हें कोई आरक्षण अथवा कानून का लाभ कैसे दिया जाए? यह स्थिति भारत सहित विश्व के लगभग सभी देशों में है। आखिर यह बड़ी विडम्बना है ना! यहाँ व्यक्ति को बिना किसी गलती की सजा दी जा रही है। उन्हें धार्मिक, सांस्कृतिक पहचान दिलाने की कागजी कार्रवाई शुरू हुई। लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
यह पुस्तक किन्नरों से आत्मीय जुड़ाव कराती है। साथ ही किन्नरों के अधिकार व सम्मान के लिए पुरजोर आवाज उठाने को प्रेरित भी करती है।
Clymet Change
- Author Name:
Sharad Singh
- Book Type:

- Description:
This book has no description
Udati Stree : Nari-Mukti Ke Arddh-Kathanak
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

- Description:
थेरीगाथा का नारीवाद ठीक वही नारीवाद नहीं है, जिसे पश्चिम की देखादेखी हमने स्वीकार कर लिया। थेरियों की रचनाओं से हम उसके लिए कुछ समर्थन पा सकते हैं, लेकिन उसे उसका प्रतिरूप नहीं कह सकते। थेरियों ने अपने समय में एक प्रतिसमय रचा था जिसे पूरी तरह स्वीकारने में स्वयं बुद्ध को भी समय लगा। उन प्रौढ़ा थेरियों ने अपने शब्दहीन लेकिन स्वानुभूत सच को साकार करने के लिए बुद्ध के धम्म की भट्टी में अपने समय की परम्पराओं, लोक मान्यताओं और दर्शन को पहले किस तरह पिघलाया, और कैसे उसे जनभाषा में ढाला, उसे समझना स्त्री-स्वातंत्र्य की एक बड़ी अवधारणा की तरफ जाना है। थेरीगाथा की रचनाओं का लक्ष्य केवल सामाजिक, नैतिक प्रतिबन्धों से ही नहीं सांसारिकता से भी मुक्ति है और केवल मुक्ति नहीं एक नई स्त्री के रूप में एक नए प्रस्थान की नींव डालना है, एक नई उड़ान भरना है। इन रचनाओं से केवल उनकी कामना को नहीं, उस समय के राज-समाज की शक्ल, स्त्रियों के भौतिक संसार और धर्म-जाति सम्बन्धी प्रतिबन्धों को भी समझना ज़रूरी है, और थेरियों के स्त्रीवाद की संभावनाओं को भी। थेरियों के प्रतिसमय से लेकर हमारे वर्तमान तक फैले स्त्री विरोध की परतें टटोलती यह किताब इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक प्रस्ताव भी है और आरम्भ भी।
Gita Sabhi Ke Liye
- Author Name:
Vinay Patrale
- Book Type:

- Description:
गीता भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। इसमें अत्यंत प्रभावशाली ढंग से दैनंदिन जीवन से जुड़े बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है। यह संपूर्ण मानव जाति के उद्धार के लिए है। इसका अध्ययन करने से हम अपने जीवन के किसी भी प्रकार के कष्ट और समस्याओं का समाधान ढूँढ़ सकते हैं। यह चरित्र-निर्माण का सबसे व्यावहारिक और उत्तम शास्त्र है। गीता जीवन की यात्रा पर निकलते समय साथ रखने का कलेवा है। बच्चे की उँगली पकड़कर उसे स्कूल में ले जानेवाली माता गीता है। यह पुस्तक जनसाधारण को गीता क्या बताती है, इसे समझाने के लिए लिखी गई है। गीतावाचन पुण्य प्राप्त करने के लिए नहीं, अपितु इसके संदेश को जीवन में उतारने का माध्यम है। श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान-सागर में से कुछ सूत्ररत्न चुनकर उन्हें सरल-सुबोध भाषा में प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है यह पुस्तक। बच्चे-बड़े-स्त्री-पुरुष—सबके लिए समान रूप से उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है भगवद्गीता। इसका नियमित अध्ययन आपको जीवन के पथ पर मर्यादित ढंग से सफलतापूर्वक चलने के सूत्र बताएगी।
Marx Aur Pichhade Huye Samaj
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

- Description:
हिन्दी के सुविख्यात समालोचक, भाषाविद् और इतिहासवेत्ता डॉ. रामविलास शर्मा का यह महत्तम ग्रन्थ ‘भूमिका’ और ‘उपसंहार’ के अलावा आठ अध्यायों में नियोजित है। इनमें से पहले में उन्होंने आधुनिक चिन्तन के पुरातन स्रोतों, मार्क्स के ‘व्यक्तित्व-निर्माण’ की दार्शनिक पृष्ठभूमि तथा मार्क्स-एंगेल्स की धर्म विषयक स्थापनाओं के प्रति ध्यान आकर्षित किया है। दूसरे में, सौदागरी पूँजी की विशेषताओं के सन्दर्भ में सम्पत्ति और परिवार-व्यवस्था की कतिपय समस्याओं का विवेचन हुआ है। तीसरे में, मध्यकालीन यूरोपीय ग्राम-समाजों और भारतीय ग्राम-समाजों में भिन्नता को रेखांकित किया गया है। चौथे में, प्राचीन रोमन-यूनानी समाज और प्राचीन भारतीय समाज में श्रम-सम्बन्धी दृष्टिभेद का खुलासा हुआ है। पाँचवें में, मार्क्स-एंगेल्स पर हीगेल के दार्शनिक प्रभाव के बावजूद इतिहास-सम्बन्धी उनकी स्थापनाओं में अन्तर को विस्तार से विेवेचित किया गया है, ताकि हीगेल के यूरोप-केन्द्रित नस्लवादी इतिहास-दर्शन को समझा जा सके। छठा अध्याय मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के जनवादी क्रान्ति-सम्बन्धी विचारों, कार्यों से परिचित कराता है। सातवें में, क्रान्ति-पश्चात् सर्वहारा अधिनायकवाद, राज्यसत्ता में सर्वहारा पार्टी की भूमिका, फासिस्ट तानाशाही से लड़ने की रणनीति तथा राज्यसत्ता के दो रूपों—जनतंत्र एवं तानाशाही—को अलगाकर देखने की माँग है और आठवाँ अध्याय दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एशियाई क्रान्ति के सन्दर्भ में लेनिन की स्थापनाओं को गम्भीरता से न लेने के कारण साम्राज्यविरोधी आन्दोलन में विघटन का गम्भीर विश्लेषण करता है।
संक्षेप में कहें तो डॉ. शर्मा की यह कृति विश्व पूँजीवाद और उसके सर्वग्रासी आर्थिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध मार्क्सवादी समाज-चिन्तन की रोशनी में विश्वव्यापी पिछड़े समाजों के दायित्व पर दूर तक विचार करती है, ताकि समस्त मनुष्य-जाति को विनाश से बचाया जा सके।
Sukhi Parivar Samriddha Rashtra
- Author Name:
Acharya Mahapragya +1
- Book Type:

- Description:
परिवार व राष्ट्र के विकास के माध्यम से ही एक शांतिपूर्ण, सुखी व समृद्ध समाज का विकास हो सकता है। सुविख्यात जैन मुनि आचार्य महाप्रज्ञ तथा पूर्व राष्ट्रपति भारत-रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का समाज के प्रति समर्पण और उसकी उन्नति के प्रति चिंता सर्वविदित है; परंतु विसंगतियों के बावजूद उसके सशक्त होने की क्षमता पर भी उन्हें पूरा भरोसा है। इस विचार-प्रधान पुस्तक ‘सुखी परिवार, समृद्ध राष्ट्र’ में इन दो विशिष्ट व्यक्तियों के परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति सरोकारों को रेखांकित किया गया है। लेखकद्वय का विचार है कि एक उत्तम राष्ट्र का निर्माण करने के लिए इसके बीज परिवार में ही बोए जाने चाहिए। कोई ऐसा व्यक्ति ही, जिसका पालन-पोषण उचित मूल्यों की शिक्षा देनेवाले परिवार में हुआ हो, राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझ सकता है। ऐसा नागरिक ‘निष्ठा से काम करो और निष्ठा से सफलता पाओ’ के सिद्धांत को अपनाएगा। केवल आर्थिक विकास और सैन्य-शक्ति से राष्ट्र उन्नत नहीं होगा, बल्कि इसके लिए मूल्यपरक समाज-जीवन का वातावरण बनाना होगा। यह दर्शन ही इस पुस्तक का मूल सिद्धांत है।
Patrakarita Bihar Se Jharkhand
- Author Name:
Sanjay Jha
- Book Type:

- Description:
झारखंड में सब कुछ है। यहाँ कुछ भी नहीं है। सरकार है। प्रशासन है। नेता है। पुलिस है। वायदे हैं। भाषण है। योजना है। घोटाला है। संघर्ष है। जीवन है। जल है। जमीन है। आदिवासी है। तमाशा है। लूट है। भ्रष्टाचार है। अखबार है। समाचार है। अदालत है। वकील है। न्याय है। अन्याय है। भूख है। गरीबी है। फटे हालजी है। कंगाली है। यहाँ तो रोटी पर नून नहीं है। खनिज है। संपदा है। बेरोजगारी है। मजदूर है। किसान है। गाँव है। खेत है। खलिहान है। सब उजड़ रहे हैं। जमीन छिन रही है। संघर्ष जारी है। पत्रकारिता के अखबारी दुनिया से अलग झारखंड संक्रमण के दौर में है। पत्रकारिता भी इसका शिकार है। इसलिए बिना अक्षरों का मुखौटा लगाए सच बयान करने का साहस कर रहा हूँ। पत्रकारिता तथा उसके सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जीवन पर पड़ रहे प्रभाव का विश्लेषण किया गया है, जो सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए रुचिकर है।
Dalit Sahitya : Nai Chunautiyan
- Author Name:
Ramshankar Katheria
- Book Type:

- Description:
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में, जब इतिहास के अंत की घोषणा की जा रही है, स्मृतियों के ध्वस का नारा उछाला जा रहा है, सामाजिक सरोकारों का विकेंद्रीकरण हो रहा है—ऐसे में यदि दलित साहित्य सीमित और संकीर्ण होता जाएगा, तो वह बाबा साहब भीमराव के आदर्शों के एकदम विपरीत होगा। बाबा भीमराव साहित्य को तरक्की का आधार मानते थे, वहीं साहित्यकारों का महत्त्व भी उनकी दृष्टि में सम्मानजनक था। आज दलित साहित्य जिस प्रकार अपनी समस्याओं और स्वार्थों तक सीमित हो गया है, उससे बाबा साहब कदापि सहमत नहीं हो सकते थे। वे न केवल दलितों को, अपितु दलित साहित्य को संपूर्ण विश्व के दलितों और शोषितों से जोड़ना चाहते थे। इस दृष्टि से दलित साहित्य को न केवल अपनी सर्जनात्मक क्षमता को वैश्विक स्तर पर सिद्ध करना होगा, बल्कि संपूर्ण दलित एवं शोषित समाज को दूसरे दलित एवं शोषितों को नवजागरण के लिए प्रेरित करना होगा। प्रस्तुत पुस्तक इसी प्रयास की शृंखला में एक कड़ी है, जो दलित साहित्य में पेश आनेवाली चुनौतियों एवं कठिनाइयों का दिग्दर्शन कराती है।
Revri Ya Haq : Samajik Suraksha Par Ek Nazaria
- Author Name:
Reetika Khera
- Book Type:

- Description:
इज़्ज़त से जीना रेवड़ी नहीं, हक़ है। इस सहज पुस्तक को पढ़कर न केवल आपकी समझ बढ़ेगी, आपका दिल भी बढ़ेगा। —ज्याँ द्रेज़ पिछले बीस सालों में रीतिका खेरा और उनकी टीम ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक नीतियों के ज़मीनी हालात पर कई प्राथमिक सर्वेक्षण किये हैं, इस पुस्तक का आधार वही सर्वेक्षण हैं। सामाजिक नीतियों का दायरा तय करना आसान नहीं है, लेकिन इनके दायरे में स्कूली शिक्षा, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएँ, आँगनवाड़ियाँ, स्कूलों में मध्याह्न भोजन, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (नरेगा), जन-वितरण प्रणाली, वृद्धावस्था, विधवा और विकलांगता पेंशन एवं मातृत्व लाभ ज़रूर आते हैं। इस किताब में जन्म से मृत्यु तक हमारे सहारे के लिए बनी इन सामाजिक नीतियों का आकलन किया गया है। चर्चा के मुख्य बिन्दुओं में इन योजनाओं का क्रियान्वयन, उसमें रह गईं त्रुटियाँ, उपलब्धियाँ और राज्यों के बीच इनके स्वरूप में जो अन्तर देखने को मिले, उन पर चर्चा की गई है। इस किताब का मक़सद है कि पाठक भारत की सामाजिक नीतियों से परिचित हों, वे इस ढाँचे को पहचानें और उसके पीछे के तर्क को समझें। उनके सामने यह बात स्पष्ट हो कि वे क्या नैतिक और आर्थिक सिद्धान्त हैं जिनके आधार पर न केवल भारत में, बल्कि दुनिया-भर में सरकारें इस तरह के हस्तक्षेप करती हैं? और हमें क्यों इन सामाजिक नीतियों को लोगों के हक़ के रूप में देखना चाहिए, न कि ‘माई-बाप सरकार’ की कृपा या ‘रेवड़ी’ के रूप में। ‘रेवड़ी या हक़ ’ पुस्तक को यह रूप देने और अपने निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए विविध पृष्ठभूमियों और नज़रियों के लोगों और संस्थाओं से भी संवाद किया गया। शोध के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के जीवन-संघर्ष को तो सर्वेक्षणकर्ता ने नज़दीक से देखा ही, नई पीढ़ी के इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के छात्रों से भी बातें हुईं और शहरी मध्यवर्ग से आने वाले मित्र-परिवारों से इन सामाजिक नीतियों को लेकर उनकी सोच क्या है, वह भी जाना। कह सकते हैं कि यह किताब सामाजिक नीतियों पर, इन विभिन्न समूहों और अपने नज़रिये के बीच एक संवाद की कोशिश है।
Aise Kaise Panpe Pakhandi
- Author Name:
Narendra Dabholkar
- Book Type:

- Description:
अन्धविश्वासों की मानव-समाजों में एक समानान्तर सत्ता चली आई है। शिक्षा, विज्ञान और सामाजिक चेतना के विस्तार के साथ इसके औचित्य पर लगातार प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं और लम्बे समय तक इसका शिकार बनते रहे लोगों ने एक समय पर आकर अन्धविश्वासों की जड़ों को मज़बूत करके अपना कारोबार चलानेवाले पाखंडी बाबाओं से मुक्ति भी पाई है, लेकिन वे नए-नए रूपों में आकर वापस लोगों के मानस पर अपना अधिकार जमा लेते हैं।
आज इक्कीसवीं सदी के इस दौर में भी जब तकनीक और संचार के साधनों ने बहुत सारी चीज़ों को समझना आसान कर दिया है, ऐसे बाबाओं की कमी नहीं है जो किसी मनोशारीरिक कमज़ोरी के किसी क्षण में अच्छे-खासे शिक्षित लोगों को भी अपनी तरफ़ खींचने में कामयाब हो जाते हैं। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और उनकी 'अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति' ने महाराष्ट्र में इन बाबाओं और जनसाधारण की सहज अन्धानुकरण वृत्ति को लेकर लगातार संघर्ष किया। लोगों से सीधे सम्पर्क करके, आन्दोलन करके और लगातार लेखन के द्वारा उन्होंने कोशिश की कि तर्क और ज्ञान से अन्धविश्वास की जड़ें काटी जाएँ ताकि भोले-भाले लोग चालाक और चरित्रहीन बाबाओं के चंगुल में फँसकर अपनी ख़ून-पसीने की कमाई और जीवन तथा स्वास्थ्य को ख़तरे में न डालें।
इस पुस्तक में उन्होंने क़िस्म-क़िस्म के बाबाओं, गुरुओं, अपने आप को भगवान या भगवान का अवतार कहकर भ्रम फैलानेवालों का नाम ले-लेकर उनकी चालाकियों का पर्दाफाश किया है। इनमें भगवान रजनीश और साईं बाबा जैसे नाम भी शामिल हैं जो इधर शिक्षित लोगों में भी ख़ासे लोकप्रिय हैं। बाबाओं की ठगी का शिकार होनेवाले अनेक लोगों की कहानियाँ भी उन्होंने यहाँ दी हैं।
Mahabharatkalin Samaj
- Author Name:
Sukhmay Bhattacharya
- Book Type:

- Description:
मुझे यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई है कि श्रीमती पुष्पा जैन ने ‘महाभारतकालीन समाज’ का सुन्दर हिन्दी अनुवाद किया है। इस पुस्तक के लेखक श्री सुखमय जी भट्टाचार्य मेरे बहुत निकट के मित्र हैं। मैने स्वयं देखा है कि उन्होंने कितने परिश्रम से इस ग्रन्थ की रचना की थी, कितनी बार उन्हें ‘महाभारत’ का पारायण करना पड़ा है, कितनी बार उन्हें एक वक्तव्य का दूसरे वक्तव्य से संगति मिलान के लिए माथापच्ची करनी पड़ी है, यह सब मेरे सामने ही हुआ है। वे बड़े धीर स्वभाव के गम्भीर विद्वान हैं। जब तक किसी समस्या का समाधान तर्कसंगत और सन्तोषजनक ढंग से नहीं हो जाता, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता। बड़े धैर्य, अध्यवसाय और उत्साह के साथ उन्होंने इस कठिन कार्य को सम्पन्न किया है। कार्य सचमुच कठिन था।
‘महाभारत’ भारतीय चिन्तन का विशाल विश्वकोश है। पंडितों में यह भी जल्पना-कल्पना चलती रहती है कि इसका कौन-सा अंश पुराना है, कौन-सा अपेक्षाकृत नवीन। कई प्रकार की समाज व्यवस्था का पाया जाना विभिन्न कालों में लिखे गए अंशों के कारण भी हो सकता है। फिर इस ग्रन्थ में अनेक श्रेणी के लोगों के आचार-विचार की चर्चा है। सब प्रकार की बातों की संगति बैठना काफ़ी कठिन हो जाता है। पं. सुखमय भट्टाचार्य जी ने समस्त विचारों और व्यवहारों का निस्संग दृष्टि से संकलन किया है। पाठक को अपने निष्कर्ष पर पहुँचने की पूरी छूट है। फिर भी उन्होंने परिश्रमपूर्वक निकाले अपने निष्कर्षों से पाठक को वंचित भी नहीं रहने दिया, इसीलिए यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है।
इस ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद करके श्रीमती पुष्पा जैन ने उत्तम कार्य किया है। इस अनुवाद के लिए वे सभी सहृदय पाठकों की बधाई की अधिकारिणी हैं।
—हजारीप्रसाद द्विवेदी
Bhrashtachar Ka Bolbala
- Author Name:
Sadachari Singh Tomar
- Book Type:

- Description:
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली में एक-एक हजार करोड़ रुपए की दो परियोजनाएँ विश्व बैंक द्वारा स्वीकृत होकर चालू हुई थीं। इन दोनों परियोजनाओं में एक बड़ी राशि देश के कृषि क्षेत्र का कंप्यूटरीकरण करके इसमें इंटरनेट की सुविधा चालू करनी थी। मैं इस योजना के सहायक महानिदेशक के रूप में पदस्थ हुआ। अतः चयन के बाद कंप्यूटरीकरण का पूर्ण उत्तरदायित्व मुझे लिखित रूप में दिया गया था। इसके साथ ही परियोजना के लिए परियोजना क्रियान्वयन इकाई बनी थी, जिसमें मुझे भी शामिल किया गया। पूरी परियोजना का प्रबंधन और विशेष रूप से कंप्यूटरीकरण का प्रबोधन जब मैंने चालू किया तो इसमें बहुत बड़ी अव्यवस्था एवं अनियमितता सामने आई, जिसे ठीक करने के उद्देश्य से जब मैंने काररवाई चालू की तो पाया कि इन परियोजनाओं में घपलों के लिए परिषद् के महानिदेशक, उप महानिदेशक, सहायक महानिदेशक आदि के साथ ही श्री नीतीश कुमार कृषिमंत्री का भी हाथ है। जाँचों की लीपापोती कर दी और भ्रष्ट लोग दंडित नहीं किए जा सके। वहीं दूसरी ओर श्री नीतीश कुमार मेरे द्वारा घपले उजागर करने से इतना कुपित हुए कि सात बार विभिन्न तरह से मेरी जाँच कराई, फिर भी दोष न पाने पर खीझकर मेरी वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन खराब किया और उसी आधार पर नियम न होते हुए भी मुझे वहाँ से सेवा से ही हटा दिया। प्रकरण अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में अटका पड़ा है। भ्रष्टाचार कैसे फलता-फूलता रहा, इसके बारे में भोगे हुए यथार्थ के रूप में इसका वर्णन किया गया है। इसके लगभग सभी पात्र जिंदा हैं तथा सभी का नाम देकर उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का जिक्र किया गया है।
Hamari Chunautiyan : Bhartiya Samaj Ke Samaksh Chunautiyan-1
- Author Name:
Badri Narayan
- Book Type:

- Description:
यह पुस्तक भारतीय समाज की वर्तमान चुनौतियों पर केन्द्रित है। इन चुनौतियों की जड़ें तो अतीत में हैं परन्तु इनका प्रभाव हमारे भविष्य तक जाता है। इन समकालीन चुनौतियों का प्रसार लोकतंत्र, परम्परा, विस्मरण एवं स्मृति-निर्माण तक फैला है। ये विमर्शपरक व्याख्यान गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद द्वारा आयोजित लोकप्रिय शृंखला ‘भारतीय समाज के समक्ष चुनौतियाँ’ के तहत संस्थान में दिए गए हैं। यह व्याख्यान-शृंखला अनवरत चल रही है। इस व्याख्यान-शृंखला का पहला खंड आज की चुनौतियों पर तो विमर्श करता ही है, साथ ही इन चुनौतियों के भीतर से ही समाधान का छायाचित्र भी निर्मित करता है।
Hamari Chunautiyan : Bhartiya Samaj Ke Samaksh Chunautiyan-1
Badri Narayan
20% off₹ 395
₹ 316
Available
Goongi Rulaai Ka Chorus
- Author Name:
Ranendra
- Book Type:

- Description:
भारतीय जन-जीवन का एक लम्बा दौर ऐसा भी रहा जिसमें हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के अति-साधारण लोग बिना किसी वैचारिक आग्रह या सचेत प्रयास के, जीवन की सहज धारा में रहते-बहते एक साझा सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित हो रहे थे। एक साझा समाज का निर्माण कर रहे थे, जो अगर विभाजन-प्रेमी ताकतें बीच में न खड़ीं होतीं तो एक विशिष्ट समाज-रचना के रूप में विश्व के सामने आता। हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी इसके अवशेष मिल जाते हैं। परम्परा का एक बड़ा हिस्सा तो उसके ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में हमारे पास है ही। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत भी उसी विरासत का हिस्सा है जो इस उपन्यास के केंद्र में है। खिलजी शासनकाल में देवगिरी के महान गायक गोपाल नायक और अमीर खुसरो के मेल से जिस संगीत की धारा प्रवाहित हुई, अकबर, मुहम्मद शाह रंगीले और वाजिद अली शाह के दरबारों से बहती हुई वह संगीत के अलग-अलग घरानों तक पहुँची। मैहर के बड़ो बाबा अलाउद्दीन खान की तरह इस उपन्यास के बड़ो नानू उस्ताद मह्ताबुद्दीन खान के यहाँ भी संगीत ही इबादत है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के खुर्शीद जोगी और बंगाल के बाउल परम्परा के कमोल उनके घर से दामाद के रूप में जुड़े। लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में विभाजन-प्रेम एक नशे के तौर पर उभर कर आता है। गुजरात में सदी के शुरू में जो हुआ वह अब यहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक मुख्यधारा का सबसे तेज़ रंग है। इस जहरीले परिवेश में नानू अयूब खान, अब्बू खुर्शीद जोगी, बाबा मदन बाउल और अंत में कमोल कबीर एक-एक कर खत्म कर दिए जाते हैं। बच जाती है एक रुलाई जो खुलकर फूट भी नहीं पाती। हलक तक आकर रह जाती है। यह उपन्यास इसी रुलाई का कोरस है। विभाजन को अपना पवित्रतम ध्येय मानने वाली वर्चस्वशाली विचारधारा के खोखलेपन और उसकी रक्त-रंजित आक्रामकता को रेखांकित करते हुए यह उपन्यास भारतीय संस्कृति के समावेशी चरित्र को हिन्दुस्तानी संगीत की लय-ताल के साथ पुनः स्थापित करने का प्रयास करता है।
Bhago Nahin Duniya Ko Badlo
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
- Book Type:

- Description:
राहुल सांकृत्यायन का समूचा जीवन घुमक्कड़ी का था। भिन्न-भिन्न भाषा, साहित्य एवं प्राचीन संस्कृत-पाली-प्राकृत-अपभ्रंश आदि भाषाओं का अनवरत अध्ययन-मनन करने का अपूर्व वैशिष्ट्य उनमें था। उनके घुमक्कड़ जीवन के मूल में अध्ययन की प्रवृति ही सर्वोपरि रही। राहुल जी जब जिसके सम्पर्क में गए, उसकी पूरी जानकारी हासिल की। जब वे साम्यवाद के क्षेत्र में गए, तो कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्तालिन आदि के राजनीतिक दर्शन की पूरी जानकारी प्राप्त की। यही कारण है कि उनके साहित्य में जनता, जनता का राज्य और मेहनतकश मजदूरों का स्वर प्रबल और प्रधान है। उनकी रचनाओं में प्राचीन के प्रति आस्था, इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है। यह केवल राहुल जी थे जिन्होंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य-चिन्तन को समग्रत: आत्मसात् कर हमें मौलिक दृष्टि देने का निरन्तर प्रयास किया। ‘भागा नहीं दुनिया का बदलो’ राहुल जी की अनुपम क्रान्तिकारी रचना है। यह कहानियों और उपन्यास के बीच की एक अनोखी राजनीतिक कथाकृति है। इस कृति की रचना का विशेष उद्देश्य यह है कि कम पढ़े-लिखे लोग राजनीति को समझ सकें। उन्हें अपनी अच्छाई-बुराई भी मालूम हो और उन्हें इसका भी ज्ञान हो कि राजनीति की दुनिया में कैसे-कैसे दाँव-पेंच खेले जाते हैं। राहुल-साहित्य में इस कृति का एक विशिष्ट स्थान है।
Jati Vyavstha
- Author Name:
Sachchidanand Sinha
- Book Type:

- Description:
यह पुस्तक देश में चलनेवाली सामाजिक मारकाट, ख़ासकर जातीय दंगों और आदिवासी समूहों के आन्दोलनों के कारणों को समझने की कोशिश में शुरू हुई। इन समस्याओं को अलग–अलग ढंग से देखने की जगह पूरी दुनिया में उभरे संकीर्णतावाद और सामाजिक समूहों के टकराव की आम प्रवृत्ति के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की गई है। इस परिप्रेक्ष्य में यह पुस्तक मुख्यत: जाति व्यवस्था की उत्पत्ति और उसकी वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करती है।
इस पुस्तक का सबसे बड़ा हिस्सा जाति व्यवस्था की वास्तविकता की जाँच–पड़ताल वाला है। यह महसूस किया गया है कि जाति के सन्दर्भ में जिन बातों को वास्तविक मान लिया जाता है, उनका काफ़ी बड़ा हिस्सा काल्पनिक ही है और इससे ग़लत धारणा बनती है, ग़लत निष्कर्ष तक पहुँचा जाता है। ‘जाति पूर्वाग्रह और पराक्रम’ शीर्षकवाला अध्ययन इस मामले में कुछ बातों को बहुत खुले ढंग से बताता है। और एक अर्थ में यही इस अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जिससे अन्य निष्कर्ष भी निकाले जाने चाहिए।
इसमें जाति व्यवस्था से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों की भी परीक्षा की गई है। होमो–हायरार्किकस वाले सिद्धान्त की कुछ ज़्यादा विस्तार से इसमें चर्चा की गई है, क्योंकि इससे इस विनाशकारी दृष्टि को बल मिल सकता है कि जाति व्यवस्था भारतीय मानस में व्याप्त स्वाभाविक भेदभाव का ही एक प्रतिफल है।
यह पुस्तक प्रमुख समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के ऊपर भी गम्भीर सवाल खड़े करती है जो सामाजिक यथार्थ के तार्किक और कार्यकारी पहलुओं पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देते हैं। विचारोत्तेजक सामग्री से भरपूर यह पुस्तक निश्चय ही पाठकों को पसन्द आएगी।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book