Ek Safar Hamsafar Ke Sath…
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Author:
Panna Devi, Arjun Ram MeghwalPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
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"भारतीय दर्शन के अनुसार वैवाहिक संस्कार सोलह संस्कारों में से सबसे महत्त्वपूर्ण होता है । इस संस्कार के द्वारा जब दापत्य जीवन की शुरुआत होती है और किसी पुरुष को पत्नी के रूप में हमसफर का साथ मिलता है तो जीवन के अहम पड़ावों में हमसफर की प्रकृति और उसके स्वभाव के कारण पुरुष सफलता के शिखर पर पहुँचता है । जब वह पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखता है तो यह स्पष्ट है कि प्रत्येक पुरुष की सफलता में उसकी पत्नी का हर मोड़ पर सबसे बड़ा योगदान होता है। मैं भी मेरे जीवन में बाल्यकाल व किशोरावस्था से निकलकर वैवाहिक जीवन की जटिलताओं को समझता हुआ, गृहस्थ जीवन के उतार-चढ़ाव को देखता हुआ आगे बढ़ा तो मैंने पाया कि मेरे जीवन की सफलता में यदि सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह है मेरी धर्मपत्नी पानादेवी का। रेते के धोरों (टीलों ) से निकलकर, जीवन के उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए सफलता की इस यात्रा को मैं मेरी धर्मपत्नी पानादेवी के समर्पण के बिना पूरी नहीं कर सकता था। यह पुस्तक ' एक सफर हमसफर के साथ' समर्पित है मेरी अर्धांगिनी को ।
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"भारतीय दर्शन के अनुसार वैवाहिक संस्कार सोलह संस्कारों में से सबसे महत्त्वपूर्ण होता है । इस संस्कार के द्वारा जब दापत्य जीवन की शुरुआत होती है और किसी पुरुष को पत्नी के रूप में हमसफर का साथ मिलता है तो जीवन के अहम पड़ावों में हमसफर की प्रकृति और उसके स्वभाव के कारण पुरुष सफलता के शिखर पर पहुँचता है । जब वह पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखता है तो यह स्पष्ट है कि प्रत्येक पुरुष की सफलता में उसकी पत्नी का हर मोड़ पर सबसे बड़ा योगदान होता है।
मैं भी मेरे जीवन में बाल्यकाल व किशोरावस्था से निकलकर वैवाहिक जीवन की जटिलताओं को समझता हुआ, गृहस्थ जीवन के उतार-चढ़ाव को देखता हुआ आगे बढ़ा तो मैंने पाया कि मेरे जीवन की सफलता में यदि सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह है मेरी धर्मपत्नी पानादेवी का।
रेते के धोरों (टीलों ) से निकलकर, जीवन के उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए सफलता की इस यात्रा को मैं मेरी धर्मपत्नी पानादेवी के समर्पण के बिना पूरी नहीं कर सकता था। यह पुस्तक ' एक सफर हमसफर के साथ' समर्पित है मेरी अर्धांगिनी को ।
Book Details
-
ISBN9789390372546
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विश्वास क्या है? कब वह अन्धविश्वास का रूप ले लेता है? हमारे संस्कार हमारे विचारों और विश्वासों पर क्या असर डालते हैं? समाज में प्रचलित धारणाएँ कैसे धीरे-धीरे सामूहिक श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती हैं। टेलीविज़न जैसे आधुनिक आविष्कार के सामने मोबाइल साथ में लेकर बैठा व्यक्ति भी चमत्कारों, भविष्यवाणियों और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित कहानियों पर क्यों विश्वास करता रहता है? क्यों कोई समाज लौट-लौटकर धार्मिक जड़तावाद और प्रतिक्रियावादी-पश्चमुखी राजनीतिक और सामाजिक धारणाओं की तरफ़ जाता रहता है?
क्या यह संसार किसी ईश्वर द्वारा की गई रचना है? या अपने कार्य-कारण के नियमों से चलनेवाला एक यंत्र है? ईश्वर के होने या न होने से हमारी सोच तथा जीवन-शैली पर क्या असर पड़ेगा? वह हमारे लिए क्या करता है और क्या नहीं करता? क्या वह ख़ुद ही हमारी रचना है? मन क्या है, उसके रहस्य हमें कैसे प्रकाशित या दिग्भ्रमित करते हैं? फल-ज्योतिष और भूत-प्रेत हमारे मन के किस ख़ाली और असहाय कोने में सहारा बनकर आते हैं? क्या अन्धविश्वासों का विरोध नैतिकता का विरोध है? क्या धार्मिक जड़ताओं पर कुठाराघात करना सामाजिक व्यक्ति को नीति से स्खलित करता है? या इससे वह ज्यादा स्वनिर्भर, स्वायत्त, स्वतंत्र और सुखी होता है?
स्त्रियों के जीवन में अन्धविश्वासों और अन्धश्रद्धा की क्या भूमिका होती है? वे ही क्यों अनेक अन्धविश्वासों की कर्ता और विषय दोनों हो जाती हैं? इस पुस्तक की रचना इन तथा इन जैसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर की गई है। नरेंद्र दाभोलकर के अन्धविश्वास या अन्धश्रद्धा आन्दोलन की वैचारिक-सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक में स्पष्ट तौर पर आ गई है जिसकी रचना उन्होंने आन्दोलन के दौरान उठाए जानेवाले प्रश्नों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए की।
Vidhyarthiyon Ke Liye Gita
- Author Name:
Acharya Mayaram 'Patang'
- Book Type:

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‘गीता’ कालजयी ग्रंथ है। यह भक्ति के साथ-साथ कर्म की ओर प्रवृत्त करती है। अपने कर्तव्य-पथ से भटक रहे अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर ही कर्म-पथ पर प्रवृत्त किया। इसलिए हमारे जीवन में गीता का बहुत व्यावहारिक उपयोग है, महती योगदान है। विद्यार्थी काल में ही गीता का भाव समझ गए तो यह जीवन में पग-पग पर काम आएगा। जीने की कला आ जाएगी। आपत्तियों तथा कष्टकर परिस्थितियों में निराशा नहीं घेरेगी। अपने-पराए और मित्र-शत्रु के मोह से मुक्त होने का ज्ञान हो जाएगा। अधिकांश लोग सेवानिवृत्त होकर गीता पढ़ते हैं। जब सारा जीवन मोह, लोभ, काम, क्रोध और अहंकार की भेंट चढ़ गया, दुःख और संतापों का ताप सह लिया, तिल-तिल कर मरते रहे, फिर गीता पढ़ी तो क्या लाभ हुआ? पाप और पुण्य कर्मों का फल तो भोगना निश्चित ही हो गया! इस पुस्तक को विशेष रूप से छात्रों-विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। गीता के हर अध्याय में जो महत्त्वपूर्ण श्लोक हैं, जिन्हें स्मरण किया जा सके, गाया जा सके, उन्हें संकलित किया गया है। स्पष्ट है कि यह संपूर्ण गीता नहीं है, बल्कि मात्र प्रेरणा है। इसे पढ़कर छात्र सन्मति पाएँ, नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए सन्मार्ग पर चलकर जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचें, यही इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य है। विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण तथा कर्तव्य-पथ पर सतत चलने की प्रेरणा देनेवाली एक अनुपम पुस्तक।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 2 : Aachar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : आचार' पुस्तक में धर्म के नाम पर कर्मकांड और पाखंडों के ख़िलाफ़ आन्दोलन, जन-जागृति कार्यक्रम और भंडाफोड़ जैसे प्रयासों का ब्योरा है।
पुस्तक में भूत से साक्षात्कार कराने का पर्दाफाश, ओझाओं की पोल खोलती घटनाएँ, मंदिर में जाग्रत देवता और गणेश देवता के दूध पीने के चमत्कार के विवरण पठनीय तो हैं ही, उनसे देखने, सोचने और समझने की पुख्ता ज़मीन भी उजागर होती है। निस्सन्देह अपने विषयों के नवीन विश्लेषण से यह पुस्तक पाठकों में अहम भूमिका निभाने जैसी है।
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली यह पुस्तक परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Andhavishwas Unmoolan : Vol. 1 : Vichar
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

- Description:
अंधविश्वास उन्मूलन और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। निरन्तर 25 वर्षों की मेहनत का फल है यह। अंधविश्वास उन्मूलन का कार्य महाराष्ट्र में विचार, उच्चार, आचार, संघर्ष, सिद्धान्त जैसे पंचसूत्र से होता आ रहा है। भारतवर्ष में ऐसा कार्य कम ही नज़र आता है।
'अंधविश्वास उन्मूलन : विचार' पुस्तक में अंधविश्वास उन्मूलन से सम्बन्धित बुनियादी बातों का ज़िक्र है। इसमें 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण', 'विज्ञान की कसौटी पर फलित ज्योतिष', 'वास्तुशास्त्र नहीं वास्तुश्रद्धाशास्त्र', 'छद्म विज्ञान अर्थात् स्यूडो साइंस', 'मनोविकार', 'भूतप्रेत बाधा या भूतावेश', 'सम्मोहन', 'देवी सवारना' जैसे विषयों पर विचार और विवेचन किया गया है जिससे यथार्थ और भ्रम का सदियों पुराना अन्तर स्पष्ट होता है।
लेखक के आत्मप्रत्यय और चेतना की नींव पर खड़ी यह पुस्तक अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Aao Viveksheel Banein
- Author Name:
Narendra Dabholkar +3
- Book Type:

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Awating description for this book
Bihari Mazdooron Ki Peeda
- Author Name:
Arvind Mohan
- Book Type:

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मज़दूरों का विस्थापन न तो अकेले भारत में हो रहा है, न आज पहली बार। सभ्यता के प्रारम्भ से ही कामगारों-व्यापारियों का आवागमन चलता रहा है, लेकिन आज भूमंडलीकरण के दौर में भारत में मज़दूरों को प्रवासी बनानेवाली स्थितियाँ और वजहें बिलकुल अलग क़िस्म की हैं। उनका स्वरूप इस क़दर अलग है कि उनसे एक नए घटनाक्रम का आभास होता है। ज्ञात इतिहास में शायद ही कभी, लाखों नहीं, करोड़ों की संख्या में मज़दूर अपना घर-बार छोड़कर कमाने, पेट पालने और अपने आश्रितों के भरण-पोषण के लिए बाहर निकल पड़े हों।
देश के सबसे पिछड़े राज्य बिहार और सबसे विकसित राज्य पंजाब के बीच मज़दूरों की आवाजाही आज सबसे अधिक ध्यान खींच रही है। यह संख्या लाखों में है। पंजाब की अर्थव्यवस्था, वहाँ के शहरी-ग्रामीण जीवन में बिहार के 'भैया' मज़दूर अनिवार्य अंग बन गए हैं और बिहार के सबसे पिछड़े इलाक़ों के जीवन और नए विकास की सुगबुगाहट में पंजाब की कमाई एक आधार बनती जा रही है। यह पुस्तक इसी प्रवृत्ति, इसी बदलाव, इसी प्रभाव के अध्ययन की एक कोशिश है। इस कोशिश में लेखक के साल-भर गहन अध्ययन, लम्बी यात्राओं और मज़दूरों के साथ बिताए समय से पुस्तक आधिकारिक दस्तावेज़ और किसी रोचक कथा जैसी बन पड़ी है।
पंजाब और बिहार के बीच शटल की तरह डोलते मज़दूरों की जीवन-शैली की टोह लेती यह कथा कभी पंजाब का नज़ारा पेश करती है तो कभी बिहार के धुर पिछड़े गाँवों का। शैली इतनी रोचक और मार्मिक है कि लाखों प्रवासी मज़दूरों और पंजाब पर उनके असर के तमाम विवरणों का बखान करती यह पुस्तक कब ख़त्म हो जाती है, पता ही नहीं चलता।
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