Ancestral Indian Development
Author:
Dr.Sanjay RoutPublisher:
ISL PUBLICATIONSLanguage:
EnglishCategory:
Society-social-sciences0 Ratings
Price: ₹ 170
₹
200
Available
For centuries, India has been a land of growth and development. The rich history of India's ancestors and their many achievements in art, science, engineering, and philosophy have left a lasting legacy that continues to influence the modern world. This book is a tribute to the generations of Indians who have helped shape the country and its culture.
From the prehistoric Indus Valley Civilization to the development of the modern Indian Republic, this book will explore the various stages of Indian development. It will look at the historical contributions of India's ancestors, as well as their impact on modern society. The book will also consider the current state of Indian development, including the challenges and successes of recent years.
In addition, this book will provide readers with an overview of Indian culture, including its literature, music, art, religion, and politics. It will also discuss the various social issues that have affected India over the centuries, such as poverty, gender inequality, and caste discrimination. This book will be an invaluable resource for anyone interested in learning more about India's fascinating history and its place in the world today.
ISBN: 8222664794
Pages: 138
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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प्राचीन भारतीय परम्परा में चार्वाक, भगवान बुद्ध, महावीर, कबीर आदि सन्तों तथा चिन्तकों ने कार्यकारण-भाव के आधार पर व्यक्ति, समाज, धर्म की समीक्षा कर उसे विवेकवादी तथा विज्ञाननिष्ठ बनाने की पहल की। महाराष्ट्र में सन्त तुकाराम, सन्त ज्ञानेश्वर, सन्त गाडगे बाबा, महात्मा फुले, महर्षि विट्ठल रामजी शिंदे, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, राजर्षि शाहूजी महाराज तथा डॉ. बाबासाहेब आदि चिन्तकों एवं सुधारकों ने इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने भी इसी परम्परा को आगे ले जाने का कार्य किया
है।
प्रस्तुत किताब डॉ. नरेंद्र दाभोलकर द्वारा लिखित चार लेखों और एक दीर्घ साक्षात्कार का संकलन है। पहले लेख में 'समाजवादी युवक दल' की स्थापना और उसके कार्य का विवेचन है।
‘संघर्ष के मोर्चे पर’ लेख में बुवा-बाबा द्वारा चलाए गए गुरुडम जैसे अन्धविश्वासों तथा समिति द्वारा इसके विरोध में किए गए आन्दोलनों का विवेचन है। ऐसे अन्धविश्वासों के ख़िलाफ़ आन्दोलन कर चुनौती प्रक्रिया पूरी करते समय समिति के कार्यकर्ता कौन-सी सावधानियाँ बरतें, इसका मार्गदर्शन है। ‘कौल विवेक का’ लेख में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेकवाद के आधार पर जीवन की उन्नति सम्भव है तथा इन्हीं हथियारों से गुरुडम के ख़िलाफ़ संघर्ष कर समाज को अन्धविश्वास से मुक्त किया जा सकता है, इसका सन्देश है। ‘एक अनन्त यात्रा’ एक प्रकार से लेखक की तथा ‘अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति’ की जीवन-यात्रा ही है। इस यात्रा में ‘अंनिस’ के कार्य की शुरुआत, उसका विस्तार तथा महाराष्ट्र की जनता के मन में जाग्रत किए गए विज्ञाननिष्ठ तथा विवेकवादी का विवेचन है।
Goongi Rulaai Ka Chorus
- Author Name:
Ranendra
- Book Type:

- Description: भारतीय जन-जीवन का एक लम्बा दौर ऐसा भी रहा जिसमें हिन्दू और मुस्लिम धर्मों के अति-साधारण लोग बिना किसी वैचारिक आग्रह या सचेत प्रयास के, जीवन की सहज धारा में रहते-बहते एक साझा सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित हो रहे थे। एक साझा समाज का निर्माण कर रहे थे, जो अगर विभाजन-प्रेमी ताकतें बीच में न खड़ीं होतीं तो एक विशिष्ट समाज-रचना के रूप में विश्व के सामने आता। हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी इसके अवशेष मिल जाते हैं। परम्परा का एक बड़ा हिस्सा तो उसके ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में हमारे पास है ही। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत भी उसी विरासत का हिस्सा है जो इस उपन्यास के केंद्र में है। खिलजी शासनकाल में देवगिरी के महान गायक गोपाल नायक और अमीर खुसरो के मेल से जिस संगीत की धारा प्रवाहित हुई, अकबर, मुहम्मद शाह रंगीले और वाजिद अली शाह के दरबारों से बहती हुई वह संगीत के अलग-अलग घरानों तक पहुँची। मैहर के बड़ो बाबा अलाउद्दीन खान की तरह इस उपन्यास के बड़ो नानू उस्ताद मह्ताबुद्दीन खान के यहाँ भी संगीत ही इबादत है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के खुर्शीद जोगी और बंगाल के बाउल परम्परा के कमोल उनके घर से दामाद के रूप में जुड़े। लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में विभाजन-प्रेम एक नशे के तौर पर उभर कर आता है। गुजरात में सदी के शुरू में जो हुआ वह अब यहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक मुख्यधारा का सबसे तेज़ रंग है। इस जहरीले परिवेश में नानू अयूब खान, अब्बू खुर्शीद जोगी, बाबा मदन बाउल और अंत में कमोल कबीर एक-एक कर खत्म कर दिए जाते हैं। बच जाती है एक रुलाई जो खुलकर फूट भी नहीं पाती। हलक तक आकर रह जाती है। यह उपन्यास इसी रुलाई का कोरस है। विभाजन को अपना पवित्रतम ध्येय मानने वाली वर्चस्वशाली विचारधारा के खोखलेपन और उसकी रक्त-रंजित आक्रामकता को रेखांकित करते हुए यह उपन्यास भारतीय संस्कृति के समावेशी चरित्र को हिन्दुस्तानी संगीत की लय-ताल के साथ पुनः स्थापित करने का प्रयास करता है।
Jal Thal Mal
- Author Name:
Sopan Joshi
- Book Type:

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Description:
हर प्राणी प्रकृति के अपार रसों का एक संग्रह होता है। मिट्टी, पानी और हवा के उर्वरकों का एक गठबन्धन। फिर चाहे वह एक कोशिका वाला बैक्टीरिया हो या विराटाकार नीला व्हेल। जब किसी जीव की मृत्यु होती है, तब यह रचना टूट जाती है। सभी रस और उर्वरक अपने मूल स्वरूप में लौट जाते हैं, फिर दूसरे जीवी को जन्म देते हैं।
हर प्राणी सभी रसों का उपयोग नहीं कर सकता। हर जीव जितना हिस्सा भोग सकता है उतना भोगता है, जो नहीं पुसाता उसे त्याग देता है। यही ‘कचरा’ या ‘अपशिष्ट’ दूसरे जीवों के लिए ‘संसाधन’ बन जाता है, किसी और के काम आता है। दूसरे जीवों से लेन-देन किए बिना कोई भी प्राणी जी नहीं सकता। हम भी नहीं। प्रकृति में कुछ भी कूड़ा-करकट नहीं होता। न कचरा, न मैला, न अपशिष्ट ही।
हमारा भोजन मिट्टी से आता है। प्रकृति का नियम है कि मिट्टी से निकले रस वापस मिट्टी में जाने चाहिए। जहाँ का माल है, वहीं लौटना चाहिए। हम जो भी खाते हैं, वह अगले दिन मल-मूत्र बन के हमारे शरीर से निकल जाता है। सहज रूप में उसका संस्कार मिट्टी में ही होना चाहिए। खाद्य पदार्थ की फिर से खाद बननी चाहिए।
किन्तु आधुनिक स्वच्छता व्यवस्था हमारे मल-मूत्र को पानी में डालने लगी है। इससे हमारे जल-स्रोत दूषित हो रहे हैं, मिट्टी बंजर हो रही है। हमारा मल-मूत्र भी चौगुना हुआ है। लेकिन उसे ठिकाने लगाने के तरीक़े चौगुने नहीं हुए हैं। हमारी स्वच्छता आज प्रकृति के साथ युद्ध बन चुकी है।
यह किताब जल-थल-मल के इस बिगड़ते रिश्ते को क़ुदरत की नज़र से देखती है। इसमें उन लोगों का भी वर्णन है जिनके लिए सफ़ाई प्रकृति को बिगाड़ने का नहीं, निखारने का तरीक़ा है। उनकी स्वच्छता में शुचिता है, सामाजिकता है। जल, थल और मल का सुगम संयोग है।
Pita Hona Ek Chunauti Stories Book
- Author Name:
Veerpal Yadav
- Book Type:

- Description: एक ऐसा विषय, जिस पर अब बात बात करने की आवश्यकता है। हमारे समाज में पिता को परमात्मा का दर्जा प्राप्त है। उचित भी है, क्योंकि पिता के संरक्षण, मार्गदर्शन, प्रेम और समर्थन के बिना जीवन अधूरा है, परंतु इससे पिता को यह अधिकार तो प्राप्त नहीं हो जाता कि अपनी संतान को अपनी आकांक्षाओं, अपेक्षाओं, स्वार्थपरता और आत्ममुग्धता (Narcissism) के तले दबा दे। पिता की अनावश्यक दबाव वाली इस मानसिकता से कितनी संतानें आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती हैं। पिता संतान की शिक्षा, कॅरियर, शादी आदि में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वहीं कुछ पिता इस अधिकार का अनुचित लाभ उठाकर अपने अहंकार की संतुष्टि करते हैं; भले ही संतान को जीवन भर उसका भुगतान करना पड़े। किस प्रकार पिता एक आदर्श पिता बन सकते हैं ? किस प्रकार पुत्र को पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपना जीवनयापन करना चाहिए? पिता को अपने अधिकार और कर्तव्यों एवं पुत्र को अपने अधिकार व कर्तव्यों के बीच सामंजस्य कैसे बैठाना चाहिए? इन सब विषयों पर इस पुस्तक में उदाहरण सहित विस्तृत व्याख्या की गई है। उदाहरण हमारे समाज के बीच से ही लिये गए हैं, जिनसे कहीं-न-कहीं हम और आप जुड़ाव महसूस करेंगे। पारिवारिक संबंधों में माधुर्य और सामंजस्य बनाकर एक स्वस्थ-समन्वित समाज बनाने के लिए आधारभूत पुस्तक ।
Janane ki Batein (Vol. 10)
- Author Name:
Deviprasad Chattopadhyay
- Book Type:

- Description: Janane ki Batein (Vol. 10) about Social Studies
Bharat Aur Bharatiya Mansikata
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description: यदि इतिहास का सम्बन्ध सामान्य जन से है तो इतिहासकार उन संस्थाओं, विश्वासों, आग्रहों और विचारों की उपेक्षा नहीं कर सकता जिनसे जनसाधारण की मानसिकता निर्मित होती है। लेकिन आज हम समाज-चिन्तन के एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं जहाँ इतिहास पर ही बात करना खतरनाक होता जा रहा है। एक मनस्वी के रूप में इतिहासकार खत्म हो रहा है। उसका पुनर्जन्म एक योद्धा के रूप में हो रहा है। ‘भारत और भारतीय मानसिकता’ पुस्तक में शामिल निबन्ध इतिहास-लेखन की वास्तविक भूमिका को रेखांकित करते हुए भारतीय समाज की प्राचीनतम अवस्था से लेकर आधुनिक काल तक के कुछ प्रश्नों को उठाते हैं। मुख्य रूप में जो एक बात इन आलेखों में उभरकर आती है वह है एक राष्ट्र के रूप में भारतीय चेतना के विकास का इतिहास और यह प्रश्न कि भारत के सन्दर्भ में ‘नेशन’ की यूरोपीय उन्मादी अवधारणा का कोई अर्थ है या नहीं। ‘नेशन’ की मौजूदा अवधारणा औद्योगिक क्रान्ति के बाद तेजी से विकास करने वाले देशों के व्यवसायियों की जरूरत थी, फिर ऐसा हुआ कि हर देश उसे एक आदर्श मानने लगा। पुस्तक में शामिल ‘आदिम भारत में भाषाओं का अन्तर्मिलन’ भारतीय बोलियों की शब्दावली के अध्ययन की जरूरत को रेखांकित करता है जिससे दसियों हजार साल पहले के विषय में अहम जानकारियाँ मिल सकती हैं जब अनेक भाषाभाषी समूह इस महाद्वीप में विचरण कर रहे थे। बहुलता में एकात्मता के ऐसे ही सूत्रों की तलाश करती यह पुस्तक आज हर उस पाठक की समझ को विस्तार देगी, जो इस देश की सहिष्णु चेतना को समझना-जानना चाहता है!
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