Mathura ke Chaturvedi
(0)
Author:
Heramb ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
350
₹ 280 (20% off)
Available
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माथुर-चतुर्वेदी' 'प्रारम्भिक आर्य' थे, जिन्होंने इस भारत-भूमि को आबाद किया था। उन्होंने अपने बौद्धिक, सांस्कृतिक सैन्य एवं राजनीतिक श्रेष्ठता के चलते, न केवल अपने प्रभुत्व की स्थापना की थी, अपितु, अपनी संस्कृति को भारत में प्रचलित करके अग्रणी संस्कृति और, अन्ततः, प्रभावी या मुख्य-धारा की संस्कृति के रूप में स्थापित कर दिया! हालांकि, उन्होंने उस भूमिका से अपने प्रभुत्व की स्थापना भारत में की थी, जिसे हम बाद के कालों में 'ब्रह्म-क्षत्रिय' की भूमिका के रूप में चिन्हित करते हैं, किन्तु, उनका योगदान न केवल आर्य संस्कृति का प्रचार-प्रसार था, अपितु, उस संस्कृति के ग्रन्थों की रचना का भी था! अतः, वे 'पुरोहित-राजन' की भूमिका में ही दिखाई देते हैं। मनु-उत्तर काल में समाज के सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित हुए, क्योंकि, वे अपने हाथ से न्यायविद की भूमिका नहीं जाने देना चाहते थे। ये वही लोग थे, जो टेथिस सागर के समापन पर उभरे नवीन स्थल पर आर्य संस्कृति के प्रथम प्रचारक थे!
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माथुर-चतुर्वेदी' 'प्रारम्भिक आर्य' थे, जिन्होंने इस भारत-भूमि को आबाद किया था। उन्होंने अपने बौद्धिक, सांस्कृतिक सैन्य एवं राजनीतिक श्रेष्ठता के चलते, न केवल अपने प्रभुत्व की स्थापना की थी, अपितु, अपनी संस्कृति को भारत में प्रचलित करके अग्रणी संस्कृति और, अन्ततः, प्रभावी या मुख्य-धारा की संस्कृति के रूप में स्थापित कर दिया! हालांकि, उन्होंने उस भूमिका से अपने प्रभुत्व की स्थापना भारत में की थी, जिसे हम बाद के कालों में 'ब्रह्म-क्षत्रिय' की भूमिका के रूप में चिन्हित करते हैं, किन्तु, उनका योगदान न केवल आर्य संस्कृति का प्रचार-प्रसार था, अपितु, उस संस्कृति के ग्रन्थों की रचना का भी था! अतः, वे 'पुरोहित-राजन' की भूमिका में ही दिखाई देते हैं। मनु-उत्तर काल में समाज के सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित हुए, क्योंकि, वे अपने हाथ से न्यायविद की भूमिका नहीं जाने देना चाहते थे। ये वही लोग थे, जो टेथिस सागर के समापन पर उभरे नवीन स्थल पर आर्य संस्कृति के प्रथम प्रचारक थे!
Book Details
-
ISBN9789349180437
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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