Mathura ke Chaturvedi
(0)
Author:
Heramb ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
350
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माथुर-चतुर्वेदी' 'प्रारम्भिक आर्य' थे, जिन्होंने इस भारत-भूमि को आबाद किया था। उन्होंने अपने बौद्धिक, सांस्कृतिक सैन्य एवं राजनीतिक श्रेष्ठता के चलते, न केवल अपने प्रभुत्व की स्थापना की थी, अपितु, अपनी संस्कृति को भारत में प्रचलित करके अग्रणी संस्कृति और, अन्ततः, प्रभावी या मुख्य-धारा की संस्कृति के रूप में स्थापित कर दिया! हालांकि, उन्होंने उस भूमिका से अपने प्रभुत्व की स्थापना भारत में की थी, जिसे हम बाद के कालों में 'ब्रह्म-क्षत्रिय' की भूमिका के रूप में चिन्हित करते हैं, किन्तु, उनका योगदान न केवल आर्य संस्कृति का प्रचार-प्रसार था, अपितु, उस संस्कृति के ग्रन्थों की रचना का भी था! अतः, वे 'पुरोहित-राजन' की भूमिका में ही दिखाई देते हैं। मनु-उत्तर काल में समाज के सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित हुए, क्योंकि, वे अपने हाथ से न्यायविद की भूमिका नहीं जाने देना चाहते थे। ये वही लोग थे, जो टेथिस सागर के समापन पर उभरे नवीन स्थल पर आर्य संस्कृति के प्रथम प्रचारक थे!
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माथुर-चतुर्वेदी' 'प्रारम्भिक आर्य' थे, जिन्होंने इस भारत-भूमि को आबाद किया था। उन्होंने अपने बौद्धिक, सांस्कृतिक सैन्य एवं राजनीतिक श्रेष्ठता के चलते, न केवल अपने प्रभुत्व की स्थापना की थी, अपितु, अपनी संस्कृति को भारत में प्रचलित करके अग्रणी संस्कृति और, अन्ततः, प्रभावी या मुख्य-धारा की संस्कृति के रूप में स्थापित कर दिया! हालांकि, उन्होंने उस भूमिका से अपने प्रभुत्व की स्थापना भारत में की थी, जिसे हम बाद के कालों में 'ब्रह्म-क्षत्रिय' की भूमिका के रूप में चिन्हित करते हैं, किन्तु, उनका योगदान न केवल आर्य संस्कृति का प्रचार-प्रसार था, अपितु, उस संस्कृति के ग्रन्थों की रचना का भी था! अतः, वे 'पुरोहित-राजन' की भूमिका में ही दिखाई देते हैं। मनु-उत्तर काल में समाज के सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित हुए, क्योंकि, वे अपने हाथ से न्यायविद की भूमिका नहीं जाने देना चाहते थे। ये वही लोग थे, जो टेथिस सागर के समापन पर उभरे नवीन स्थल पर आर्य संस्कृति के प्रथम प्रचारक थे!
Book Details
-
ISBN9789349180437
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह किताब हिन्दी में 1968 में ‘सच्ची रामायण' नाम से प्रकाशित हुई थी, जिसके प्रकाशक लोकप्रिय बहुजन कार्यकर्ता ललई सिंह थे। 9 दिसम्बर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया और पुस्तक की सभी प्रतियों को ज़ब्त कर लिया। ललई सिंह यादव ने इस प्रतिबन्ध और ज़ब्ती को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुक़दमा जीत गए। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 16 सितम्बर, 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सर्वसम्मति से फ़ैसला देते हुए राज्य सरकार की अपील को ख़ारिज कर दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय सुनाया।
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- Description: हिंदू त्रिदेवों में भगवान शिव कई आयामों वाले देवता हैं। स्वभाव से उग्र एवं दयालु भगवान शिव जीवन की द्वैतता के प्रतीक हैं। शैव धर्म के केंद्र में शिव की पूजा ही है। शिवलिंग और बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में श्रद्धालुओं की इतनी अधिक आस्था है कि वे अनादि काल से ही इसे अपना तीर्थस्थल मानते आ रहे हैं। ये प्रतिष्ठित स्तंभ व्यक्तिगत कथाओं और विद्वतापूर्ण शोध का हिस्सा बन गए हैं। इस पुस्तक के लेखकों में अमित कपूर, बिबेक देबरॉय, विभव कपूर और कॉनर मार्टिन शामिल हैं। ये सभी लेखक इन ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी कहानियों को संजोने के अलावा उनके सार और समय के साथ उनकी शाब्दिक और रूपक यात्राओं पर विचार करते हैं।
Sufiwad Ke Adhyatmik Ayam
- Author Name:
Zafar Raza
- Book Type:

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Description:
हिन्दी में तसव्वु़फ या सूफ़ीमत पर दो प्रामाणिक पुस्तकें छपी हैं। एक चन्द्रबली पाण्डेय की, दूसरी डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी की। इस्लाम धर्म के अनुयायी विद्वान् की हिन्दी में यह पहली पुस्तक है—सू़फ़ीवाद के आध्यामिक आयाम।
इस पुस्तक में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ सू़फ़ी सिद्धान्तों का बहुत ही स्पष्ट और प्रामाणिक विवेचन है। प्रोफ़ेसर जाफ़र रज़ा ने अपने प्रतिपादन की पुष्टि क़ुर्आन के उद्धरणों से की है। इसके साथ-साथ विभिन्न सू़फ़ी सम्प्रदायों का ऐतिहासिक, दार्शनिक और साधनापरक विवेचन भी इसमें है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पूर्ववर्ती मूल अरबी-फ़ारसी विवेचकों का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है। विशेष रूप से भारत में प्रसिद्ध सू़फ़ी-फ़कीर सम्प्रदायों और उनके प्रमुख हस्ताक्षरों के बारे में बहुत ही प्रामाणिक विवेचन है। प्रोफ़ेसर जाफ़र ऱजा ने अत्यन्त निष्पक्ष होकर सूफ़ीवाद का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया है।
सूफ़ी-दर्शन इस्लाम को मथ करके निकला मक्खन है। यह इस्लाम को प्रतिष्ठा दिलाने में तो सफल हुआ ही है, इसकी पृष्ठभूमि का दिग्दर्शन प्रोफ़ेसर जाफ़र ऱजा ने अच्छी तरह प्रस्तुत किया है।
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