Shri Ramcharitmanas (Pramanik Path Tatha Teeka)
(0)
Author:
Yogendra Pratap SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
2500
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<strong>‘</strong>श्रीरामचरितमानस<strong>’</strong> भारतीय संस्कारों का श्रेष्ठतम महाकाव्य है। भारतीय संस्कार का अर्थ है<strong>, </strong>समग्र मानव जाति के निखिल मंगल<strong>, </strong>कल्याण एवं हितैषिता के प्रति समर्पित होकर प्रेम<strong>, </strong>स्नेह<strong>, </strong>उदारता<strong>, </strong>ममता<strong>, </strong>सहिष्णुता<strong>, </strong>दया<strong>, </strong>अस्तित्व<strong>, </strong>अहिंसा<strong>, </strong>सत्य<strong>, </strong>परोपकार आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा करना। इस प्रकार<strong>, </strong>मानस मानव अस्तित्व को सर्वोपरि मानकर उसके लिए सबसे सुलभ<strong>, </strong>सर्वाधिक सुगम तथा श्रेयस्कर मार्ग की तलाश की छटपटाहट से संयुक्त है। समाज के सर्वोच्च शुभ की प्रतिष्ठा ही मानसकार तुलसी का महत्तम शुभ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के लिए जिस भव्यतम शुभ का दर्शन किया है<strong>, </strong>मानस की कविता के विविध पात्रों द्वारा उसे जिस प्रकार व्यंजित किया है तथा नैतिक मंगल के सर्वोच्च मूल्य श्रीराम और उनके ठीक विपरीत गर्हित अशुभ एवं अधर्म के प्रतीक रावण को आमने-सामने रखकर जिस मानवीय शुभ की स्थापना की है—उसकी चरम परिणति असत्य पर सत्य की विजय<strong>, </strong>अशुभ पर शुभ की स्थापना<strong>, </strong>क्रूरता पर प्रेम तथा दया का प्रसार<strong>, </strong>प्रपंच तथा छल पर मानवीय सहजता की छाया की स्थापना में होती है। इस सृष्टि पर जब तक मानव जाति रहेगी<strong>, </strong>अपनी सांस्कृतिक धरोहर सत्य<strong>, </strong>प्रेम<strong>, </strong>दया<strong>, </strong>उदारता आदि श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों से सम्पृक्त <strong>‘</strong>श्रीरामचरितमानस<strong>’</strong> जैसे काव्य की रक्षा करती रहेगी। इस प्रकार <strong>‘</strong>श्रीरामचरितमानस<strong>’</strong> निखिल मानव जाति की सनातन धरोहर है और इस टीका का मन्तव्य है—उसकी इस अमूल्य तथा परम शुभमयी धरोहर से उसे बराबर परिचित कराते रहना।
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<strong>‘</strong>श्रीरामचरितमानस<strong>’</strong> भारतीय संस्कारों का श्रेष्ठतम महाकाव्य है। भारतीय संस्कार का अर्थ है<strong>, </strong>समग्र मानव जाति के निखिल मंगल<strong>, </strong>कल्याण एवं हितैषिता के प्रति समर्पित होकर प्रेम<strong>, </strong>स्नेह<strong>, </strong>उदारता<strong>, </strong>ममता<strong>, </strong>सहिष्णुता<strong>, </strong>दया<strong>, </strong>अस्तित्व<strong>, </strong>अहिंसा<strong>, </strong>सत्य<strong>, </strong>परोपकार आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा करना। इस प्रकार<strong>, </strong>मानस मानव अस्तित्व को सर्वोपरि मानकर उसके लिए सबसे सुलभ<strong>, </strong>सर्वाधिक सुगम तथा श्रेयस्कर मार्ग की तलाश की छटपटाहट से संयुक्त है। समाज के सर्वोच्च शुभ की प्रतिष्ठा ही मानसकार तुलसी का महत्तम शुभ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के लिए जिस भव्यतम शुभ का दर्शन किया है<strong>, </strong>मानस की कविता के विविध पात्रों द्वारा उसे जिस प्रकार व्यंजित किया है तथा नैतिक मंगल के सर्वोच्च मूल्य श्रीराम और उनके ठीक विपरीत गर्हित अशुभ एवं अधर्म के प्रतीक रावण को आमने-सामने रखकर जिस मानवीय शुभ की स्थापना की है—उसकी चरम परिणति असत्य पर सत्य की विजय<strong>, </strong>अशुभ पर शुभ की स्थापना<strong>, </strong>क्रूरता पर प्रेम तथा दया का प्रसार<strong>, </strong>प्रपंच तथा छल पर मानवीय सहजता की छाया की स्थापना में होती है। इस सृष्टि पर जब तक मानव जाति रहेगी<strong>, </strong>अपनी सांस्कृतिक धरोहर सत्य<strong>, </strong>प्रेम<strong>, </strong>दया<strong>, </strong>उदारता आदि श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों से सम्पृक्त <strong>‘</strong>श्रीरामचरितमानस<strong>’</strong> जैसे काव्य की रक्षा करती रहेगी। इस प्रकार <strong>‘</strong>श्रीरामचरितमानस<strong>’</strong> निखिल मानव जाति की सनातन धरोहर है और इस टीका का मन्तव्य है—उसकी इस अमूल्य तथा परम शुभमयी धरोहर से उसे बराबर परिचित कराते रहना।
Book Details
-
ISBN9788180316487
-
Pages986
-
Avg Reading Time33 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीसिप्त विशेषताएँ हैं।
इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के तीसरे, चौथे एवं पाँचवें मंडल का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
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