Hadapada Appanna-Lingam
(0)
Author:
Kashinath AmbalgePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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Available
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ध्यान करना चाहूँ तो क्या ध्यान करूँ।</p> <p>मन तेजोहीन धुँधला पड़ गया था, तन शून्य हो गया था।</p> <p>कायक गुण गल चुका। देह से अहं मिट गया था।</p> <p>अपने आपसे प्रकाश में झूमते मैं सुखी बनी</p> <p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p> <p> </p> <p>मन याद कर रहा है।</p> <p>बुरी विषय वासना की ओर मन बहक रहा है।</p> <p>डाली की चोटी की ओर जा रहा है मन</p> <p>मन किसी भी नियम में बँधता नहीं,</p> <p>छोड़ देने पर मन जाता भी नहीं।</p> <p>अपनी इच्छा पर मनमानी करते मन को नियम में बाँधकर</p> <p>लक्ष्य में स्थिर करके शून्य में विहरनेवाले</p> <p>शरणों के चरणों में मैं समा रही</p> <p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p> <p>—लिंगम्मा</p> <p> </p> <p>घास-फूस-कचरा निकालकर स्वच्छ किए</p> <p>हुए खेत में कूड़ा-करकट बोनेवाले पागलों की तरह</p> <p>विषय-सुखों के झूठे भ्रम में लोलुप होकर</p> <p>तकलीफ़ में पड़नेवाले मनुष्य कैसे जान सकते</p> <p>महाघन गुरु के स्वरूप को?</p> <p>मरण बाधा में पड़नेवाले आपको कैसे जान सकते हैं</p> <p>बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा? ॥</p> <p> </p> <p>भूख मिटाने अन्न स्वीकार करते हैं,</p> <p>विषय के मोह में झूठ बोलते हैं,</p> <p>नए-नए व्यसन में पड़कर</p> <p>भस्म धारण करके सारा विश्व घूमते हैं।</p> <p>इस मिथ्या को छोड़कर, माया के धुँधलेपन को दूर किए बिना</p> <p>नहीं समा सकता हमारा बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा॥ </p> <p>—अप्पण्णा
Read moreAbout the Book
ध्यान करना चाहूँ तो क्या ध्यान करूँ।</p>
<p>मन तेजोहीन धुँधला पड़ गया था, तन शून्य हो गया था।</p>
<p>कायक गुण गल चुका। देह से अहं मिट गया था।</p>
<p>अपने आपसे प्रकाश में झूमते मैं सुखी बनी</p>
<p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p>
<p> </p>
<p>मन याद कर रहा है।</p>
<p>बुरी विषय वासना की ओर मन बहक रहा है।</p>
<p>डाली की चोटी की ओर जा रहा है मन</p>
<p>मन किसी भी नियम में बँधता नहीं,</p>
<p>छोड़ देने पर मन जाता भी नहीं।</p>
<p>अपनी इच्छा पर मनमानी करते मन को नियम में बाँधकर</p>
<p>लक्ष्य में स्थिर करके शून्य में विहरनेवाले</p>
<p>शरणों के चरणों में मैं समा रही</p>
<p>अप्पण्णाप्रिय चन्नबसवण्णा॥</p>
<p>—लिंगम्मा</p>
<p> </p>
<p>घास-फूस-कचरा निकालकर स्वच्छ किए</p>
<p>हुए खेत में कूड़ा-करकट बोनेवाले पागलों की तरह</p>
<p>विषय-सुखों के झूठे भ्रम में लोलुप होकर</p>
<p>तकलीफ़ में पड़नेवाले मनुष्य कैसे जान सकते</p>
<p>महाघन गुरु के स्वरूप को?</p>
<p>मरण बाधा में पड़नेवाले आपको कैसे जान सकते हैं</p>
<p>बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा? ॥</p>
<p> </p>
<p>भूख मिटाने अन्न स्वीकार करते हैं,</p>
<p>विषय के मोह में झूठ बोलते हैं,</p>
<p>नए-नए व्यसन में पड़कर</p>
<p>भस्म धारण करके सारा विश्व घूमते हैं।</p>
<p>इस मिथ्या को छोड़कर, माया के धुँधलेपन को दूर किए बिना</p>
<p>नहीं समा सकता हमारा बसवप्रिय कूडल चन्नबसवण्णा॥ </p>
<p>—अप्पण्णा
Book Details
-
ISBN9789389742015
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।
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“I have no doubt that ‘Sri Ramayana Mahanveshanam’ will remain a milestone not only in the history of Kannada literature or Hindi literature, but in the history of Indian literature also. It is his distinct contribution to Ramayana literature.”
—Indira Goswami Professor, Modern Indian Languages & Literary Studies, Delhi University
‘‘मोइली जी को इतनी बड़ी साहित्यिक परियोजना पर सोचने के लिए, उसे पूरा करने के लिए, और भारतीय परम्परा में उसके उचित सन्निवेश के हेतु प्रयास करने के लिए बधाई देना चाहता हूँ...।
—डॉ. वागीश शुक्ल कवि, दार्शनिक, समालोचक तथा प्रोफ़ेसर, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
Leela Aur Bhaktiras
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

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Description:
लीला के विवेचन के बिना हिन्दी भक्ति-कविता की समीक्षा सम्भव नहीं है। लीला भक्तिरस का प्राण है। हिन्दी के आलोचकों ने लगभग आठ दशकों से हिन्दी वैष्णव भक्तिकाव्य की समीक्षा शुरू की है, किन्तु उनका ध्यान इस प्राणवान तत्त्व की ओर नहीं जा सका है। प्रायः अंग्रेज़ी साहित्य से सम्बन्ध सिद्धान्तों तथा प्रकृत लोक मान्यताओं के प्रकाश में भक्ति-कविता की अब तक जो समीक्षाएँ हुई हैं, उनसे इस विशाल साहित्य की मूल प्रकृति स्पष्ट नहीं हो सकी है। इसका मुख्य कारण यह है कि भक्तिकाव्य के अध्यात्म एवं लोक का द्वन्द्व केवल लीला एवं मात्र लीला के माध्यम से ही विवेचित होना सम्भव है। उसके मन्तव्य, अर्थ-रचना एवं भावद्वन्द्व को इस लीलाधर के अभाव में देखा जाना इस भारतीय कविता के साथ अन्याय है। भक्तिरस इसी लीलाधर्मिता की निष्पत्ति है। आचार्य पं. रामचन्द्र शुक्ल जैसे भक्ति-कविता के प्रख्यात समीक्षक भी भक्तिकाव्य की इस मूल अवधारणा से अपनी दृष्टि बचाकर दूसरी ओर जाते दिखाई पड़ते हैं।
प्रस्तुत कृति का मूल मन्तव्य लीला तथा भक्तिरस के इसी सारवान तत्त्व की सैद्धान्तिकता की स्थापना करना है ताकि इसके प्रकाश में हिन्दी भक्तिकाव्य की पुनर्व्याख्या करके उसके साहित्य की ही नहीं, भारतीय संस्कृति और अस्मिता के साथ न्याय किया जा सके।
Main Kaun Hoon? "मैं कौन हूँ" | Spiritual & Enlightenment Book | Swami Vivekananda Book in Hindi
- Author Name:
Swami Vivekanand
- Book Type:

- Description: "स्वामी विवेकानंद भारत में उस समय अवतार लिया, जब यहाँ हिंदू धर्म के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे थे। पंडित-पुरोहितों ने हिंदू धर्म को घोर आडंबरवादी और अंधविश्वासी बना दिया था ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू धर्म को पहचान दी । इसके पहले हिंदू धर्म विभिन्न छोटे-छोटे संप्रदायों में बँटा हुआ था। तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो (अमरीका) की विश्व धर्म-संसद् में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और इसे सार्वभौमिक पहचान दिलवाई। उनतालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जो काम कर गए, वे आनेवाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। प्रस्तुत पुस्तक ‘मैं कौन हूँ?’ में स्वामीजी ने सरल शब्दों में एक आम आदमी के उन सवालों के उत्तर दिए हैं, उन जिज्ञासाओं को शांत करने का प्रयास किया है, जिनमें वह अकसर उलझकर रह जाता है कि आखिर वह है कौन ? ये आत्मा-परमात्मा कौन हैं ? स्वयं को कैसे जाना जा सकता है ? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है ? धर्म का जीवन में क्या महत्त्व है ? जीवन की सार्थकता क्या है? ऐसे ही करनेवाली विख्यात आध्यात्मिक विभूति स्वामी विवेकानंद की एक प्रेरक और ज्ञानवर्धक पुस्तक |"
Dharam Ke Naam Par
- Author Name:
Geetesh Sharma
- Book Type:

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Description:
धर्म के सही चरित्र एवं स्वरूप से परिचित हुए बिना विवेकहीनता, अन्धविश्वासों एवं भ्रान्तियों से मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। इस दिशा में यह पुस्तक एक सार्थक प्रयास है। लेखक ने निष्पक्ष दृष्टि से बिना किसी पूर्वग्रह के तीन धर्मों—हिन्दू, ईसाई और इस्लाम की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए हिंसा, नारी और दासत्व के सन्दर्भ में संक्षिप्त पर तथ्यपरक व वस्तुगत विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
धर्म का बीभत्स और बर्बर रूप आज हम देख रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और अफ़ग़ानिस्तान में धर्म के रक्तरंजित इतिहास को दोहराया जा रहा है। धार्मिक-स्थल अपराधियों के शरण-स्थल बने हुए हैं। धर्म का अपराध के साथ गठजोड़ चिन्तित करता है। भजन-कीर्तन-प्रवचन के आयोजनों और धार्मिक-स्थलों के निर्माण में बेशुमार वृद्धि हुई है, वहीं हत्या, बलात्कार, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार बढ़े हैं। स्वयं मनुष्य अपनी नियति तथा भाग्य का निर्माता है। समता, स्वतंत्रता और न्याय प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। कोई भी ऐसी व्यवस्था जो मनुष्य को इन अधिकारों से वंचित करती है, वह मानव-विरोधी है, चाहे वह धर्म हो या साम्राज्यवाद या फासीवाद या निजी स्वार्थों पर आधारित विकृत तथा जनविरोधी जनतंत्र। मनुष्य सर्वोपरि है, उसके ऊपर कोई नहीं, न धर्म न ईश्वर।
Sai Ki Seva Mein
- Author Name:
Dr. Suresh Haware
- Book Type:

- Description: साईं की सेवा करने का मुझे अवसर मिला, यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा ईश्वरीय आशीर्वाद है, ऐसी मेरे मन की प्रामाणिक भावना है। इस कालावधि में मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। मैं शिरडी कभी आता नहीं था, लेकिन इस पूरे कार्यकाल में मैं शिरडी के सिवाय कहीं जाता ही नहीं था। साईं बाबा का पहले कभी विचार करता नहीं था। लेकिन इस दौरान साईं के सिवाय कोई दूसरा विचार ही नहीं किया। पैर अपने आप शिरडी की ओर खिंचे चले आते थे।
SIDDHARTHA An Indian Tale
- Author Name:
Hermann Hesse
- Book Type:

- Description: Siddhartha: An Indian Tale is a novel by Hermann Hesse. The theme of the novel is the search for self-realization by a young Brahman, Siddhartha. Realizing the contradictions between reality and what he has been taught, he abandons his comfortable life to wander. His goal is to find the serenity that will enable him to defeat fear and to experience with equanimity the contrasts of life, including joy and sorrow, life and death.
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