Prayag Ki Ramlila
(0)
₹
400
320 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
प्रयाग की रामलीला कब से आयोजित हो रही है, इसका साक्ष्य मुगल शासक अकबर काल से मिलने लगता है, किन्तु अर्थ यह नहीं कि प्रयाग की रामलीला अकबर के समय से शुरू हुई थी। प्रयाग में रामलीला का आयोजन मुगल काल के पहले से होता रहा है। जहाँ तक, भारत का प्रश्न है, इस देश में रामलीला ईसा की आरम्भिक शतियों से होती चली आ रही है। इसका सबसे प्राचीन साक्ष्य पंतजलि का महाभाष्य है, जिसमें वानरों तथा राक्षसों एवं उनके दलों के युद्धों का संकेत मिलता है—एते श्वेतमुखा: एते कृष्णमुखा:.....आदि। नाट्य परम्परा में इसके सबसे प्राचीनतम साक्ष्य भास कृत प्रतिमा तथा अभिषेक नाटक के हैं। यही नहीं, यह रामकथा नाट्य तथा लीला के साथ-साथ प्रारम्भ से ही मधुर संगीत परम्परा से भी सम्बद्ध रही है। वाल्मीकि स्वयं कहते हैं, रामकथा में प्रवीण कुशीलव नामक चारण जातियाँ राजदरबारों में इसका तंत्रीस्वरों के साथ गायन करती रही हैं।<br>इस संदर्भ को केन्द्र में रखते हुए ‘ऐतिहासिकता तथा समसामयिकता’ इन दोनों से समन्वित पुस्तक ‘प्रयाग की रामलीला’ आपके सामने है। आज प्रयाग नगर के प्रत्येक मुहल्लों तथा जनपद की प्रत्येक तहसीलों के विविध कस्बों तथा गांवों में इस समय जिस उत्साह के साथ लीला आयोजन की चमक दिखाई पड़ती है, लगता है, लोक-जीवन की त्यागमयी, आदर्श आचरणमयी तथा कल्याणमयी नयी चेतना फिर से ग्यारह दिनों के लिए जन-जन के बीच परमोन्मेष के साथ उमंगित हो उठी है।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
प्रयाग की रामलीला कब से आयोजित हो रही है, इसका साक्ष्य मुगल शासक अकबर काल से मिलने लगता है, किन्तु अर्थ यह नहीं कि प्रयाग की रामलीला अकबर के समय से शुरू हुई थी। प्रयाग में रामलीला का आयोजन मुगल काल के पहले से होता रहा है। जहाँ तक, भारत का प्रश्न है, इस देश में रामलीला ईसा की आरम्भिक शतियों से होती चली आ रही है। इसका सबसे प्राचीन साक्ष्य पंतजलि का महाभाष्य है, जिसमें वानरों तथा राक्षसों एवं उनके दलों के युद्धों का संकेत मिलता है—एते श्वेतमुखा: एते कृष्णमुखा:.....आदि। नाट्य परम्परा में इसके सबसे प्राचीनतम साक्ष्य भास कृत प्रतिमा तथा अभिषेक नाटक के हैं। यही नहीं, यह रामकथा नाट्य तथा लीला के साथ-साथ प्रारम्भ से ही मधुर संगीत परम्परा से भी सम्बद्ध रही है। वाल्मीकि स्वयं कहते हैं, रामकथा में प्रवीण कुशीलव नामक चारण जातियाँ राजदरबारों में इसका तंत्रीस्वरों के साथ गायन करती रही हैं।<br>इस संदर्भ को केन्द्र में रखते हुए ‘ऐतिहासिकता तथा समसामयिकता’ इन दोनों से समन्वित पुस्तक ‘प्रयाग की रामलीला’ आपके सामने है। आज प्रयाग नगर के प्रत्येक मुहल्लों तथा जनपद की प्रत्येक तहसीलों के विविध कस्बों तथा गांवों में इस समय जिस उत्साह के साथ लीला आयोजन की चमक दिखाई पड़ती है, लगता है, लोक-जीवन की त्यागमयी, आदर्श आचरणमयी तथा कल्याणमयी नयी चेतना फिर से ग्यारह दिनों के लिए जन-जन के बीच परमोन्मेष के साथ उमंगित हो उठी है।
Book Details
-
ISBN9788180316135
-
Pages123
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Shri Ramcharitmanas (Pramanik Path Tatha Teeka)
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
‘श्रीरामचरितमानस’ भारतीय संस्कारों का श्रेष्ठतम महाकाव्य है। भारतीय संस्कार का अर्थ है, समग्र मानव जाति के निखिल मंगल, कल्याण एवं हितैषिता के प्रति समर्पित होकर प्रेम, स्नेह, उदारता, ममता, सहिष्णुता, दया, अस्तित्व, अहिंसा, सत्य, परोपकार आदि मूल्यों की प्रतिष्ठा करना। इस प्रकार, मानस मानव अस्तित्व को सर्वोपरि मानकर उसके लिए सबसे सुलभ, सर्वाधिक सुगम तथा श्रेयस्कर मार्ग की तलाश की छटपटाहट से संयुक्त है। समाज के सर्वोच्च शुभ की प्रतिष्ठा ही मानसकार तुलसी का महत्तम शुभ है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानवीय अस्तित्व की सार्थकता के लिए जिस भव्यतम शुभ का दर्शन किया है, मानस की कविता के विविध पात्रों द्वारा उसे जिस प्रकार व्यंजित किया है तथा नैतिक मंगल के सर्वोच्च मूल्य श्रीराम और उनके ठीक विपरीत गर्हित अशुभ एवं अधर्म के प्रतीक रावण को आमने-सामने रखकर जिस मानवीय शुभ की स्थापना की है—उसकी चरम परिणति असत्य पर सत्य की विजय, अशुभ पर शुभ की स्थापना, क्रूरता पर प्रेम तथा दया का प्रसार, प्रपंच तथा छल पर मानवीय सहजता की छाया की स्थापना में होती है। इस सृष्टि पर जब तक मानव जाति रहेगी, अपनी सांस्कृतिक धरोहर सत्य, प्रेम, दया, उदारता आदि श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों से सम्पृक्त ‘श्रीरामचरितमानस’ जैसे काव्य की रक्षा करती रहेगी। इस प्रकार ‘श्रीरामचरितमानस’ निखिल मानव जाति की सनातन धरोहर है और इस टीका का मन्तव्य है—उसकी इस अमूल्य तथा परम शुभमयी धरोहर से उसे बराबर परिचित कराते रहना।
Shri Ramcharitmanas (Pramanik Path Tatha Teeka)
Yogendra Pratap Singh
20% off₹ 2500
₹ 2000
Available
Shri Ramcharitmanas : dwitya sopan Ayodhyakand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Shri Ramcharitmanas : Shasth Sopan (Lankakand)
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
‘श्रीरामचरितमानस’ लीलान्वयी काव्य है। इनकी मान्यताएँ वाल्मीकि रामायण से न जुड़कर भागवत पुराण से जुड़ती हैं। वाल्मीकि अपनी ‘रामायण’ के ‘लंकाकांड’ में ‘रावण वध’ की समापन कथा कहते हैं, किन्तु तुलसीकृत मानस का ‘लंकाकांड’ रावण का मुक्ति का आख्यान है।
प्रभु के प्रति द्वेष भी भक्ति ही है और उस अमर्ष भाव में आकंठ डूबे रावण जैसे व्यक्तित्व के प्रति श्रीराम का क्रोध उनकी कृपा तथा अनुग्रह है। इसलिए तुलसीदासकृत लंकाकांड को कथा समापन के रूप में नहीं लेना चाहिए, वरन् मध्यकालीन लीलाभक्ति की उस अवधारणा से जोड़कर देखना चाहिए, जहाँ शत्रु-मित्र, साधु-असाधु, राक्षस-मानव के बीच स्थिर दीवार को तोड़कर सभी को एक मंच पर बैठाने की तत्परता दिखाई पड़ती है। हिन्दू-अहिन्दू को एक तार से जोड़नेवाली यह भक्ति निश्चित ही भारतीय संस्कृति की विषमता के युग में एक बहुत बड़ी सम्बल थी।
तुलसी अपने इस ‘लंकाकांड’ में ‘रावण वध’ की कथा न कहकर राम एवं रावण के बीच रागात्मक ऐक्य की स्थापना की कथा कहते हैं। रावण के भौतिक शरीर को विनष्ट करके उसकी तेजोमयी चेतना का श्रीराम के शरीर में विलयन भक्ति द्वारा स्थापित रागात्मक समन्वय का सबसे बड़ा साक्ष्य है।
Sriramcharit Manas : Pancham Sopan Sundarkand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
तुलसी कृत सुन्दरकांड के कथा नायक हनुमान हैं, परन्तु वह लगते नहीं। कवि सुन्दरकांड के माध्यम से श्रीराम के माहात्म्य, उनके प्रति भक्ति तथा प्रपत्ति एवं शरणागति भाव को व्यंजित करना चाहता है। इस दृष्टि से, सुन्दरकांड में आए हनुमान, सीता, रावण एवं विभीषण के चरित्रों का तुलनात्मक अध्ययन करें तो विभीषण का स्थान सर्वोपरि है। सुन्दरकांड के इस विभीषण का चरित्र ऐतिहासिक नहीं, स्वयं तुलसीदास का अपना निजी भोगा हुआ उपेक्षित व्यक्तित्व है। विभीषण एवं तुलसी दोनों श्रीराम की शरणागति में ही जीवन की सार्थकता प्राप्त करते हैं। यदि और स्पष्ट ढंग से कहना चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि इस विभीषण का पर्याय तुलसीयुगीन सम्पूर्ण निराश्रित जनसमूह है।
तुलसी सुन्दरकांड में विभीषण का विद्रावक तथा संवेदनशील व्यक्तित्व निर्मित करके इस कथा का मुख ग़रीब एवं असहाय जनता की ओर मोड़ देते हैं। इसीलिए, इस सुन्दरकांड में कवि अपनी सम्पूर्ण रचनात्मक ऊर्जा न हनुमान की शक्ति एवं बल से सम्बद्ध करता है, न रावण के प्रति अन्याय और आक्रोश में लगाता है, साथ ही, उसे न वह श्रीराम की प्राणप्रिया सीता की विरह पीड़ा से ही जोड़ता है; वह पूरी तरह से सजग तथा संवेदनशील होकर आश्रयविहीन विभीषण को अपना भावात्मक समर्पण देकर उसे सार्थक बनाने की चेष्टा करता है। इस सुन्दरकांड के कवि तथा उसकी कविता की यही भव्यता है।
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand Literary Criticism Ram Sahitya
Ram Sahitya Kosh : Vols. 1-2
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
यह कोश केवल एक सन्दर्भ कोश मात्र नहीं है। यह समग्र भारत की राष्ट्रीय रागात्मक एकता का स्वयं में बृहत्तर तथा व्यापक साक्ष्य है। आप कल्पना करें, उस कालखंड की, जब भारत की समृद्धि एवं अखंडता पर विदेश हमले शुरू हुए। प्रारम्भिक स्थिति में शक, हूण, किरात, खास आभीर, यूनानी शक्तियों के भारत पर हमले हुए, जिनमें से कुछ तो भाग गए और कुछ हम भारतीयों के बीच रहते हुए पूरी तरह से भारतीय बन गए। इन सबके बावजूद, हमारा अपना भारत अभी तक अपनी इसी सांस्कृतिक अडिगता का साक्ष्य है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद, हमारी सांस्कृतिक धरोहर देश की अस्मिता के ध्वज को एक बार फिर विश्वमंच पर फहराने लगी है और इसी आशा के साथ, आज समग्र भारत में शतियों-शतियों से सांस्कृतिक धरोहर बनी यह रामकथा 'राम साहित्य कोश' के रूप में आपके सामने रखी जा रही है। इस साहित्य कोश का उद्देश्य केवल भारतीयों के सामने समीक्षा कोश की प्रस्तुति का लक्ष्य नहीं है, अपितु इसके द्वारा यह सिद्ध करना लक्ष्य है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह भारतीय संस्कृति, त्याग एवं शीलवादी आस्था बनकर हज़ारों-हज़ारों वर्षों से संचित आर्य संस्कारों की थाती हमें गहन-से-गहन संकटों में कैसे जीवित रहने के लिए संजीवनी शक्ति देती आ रही है। राम साहित्य कोश की इस प्रस्तुति का मन्तव्य भी यही है कि हम एक बार फिर अपनी भारतीय संस्कृति के त्यागवाद, परोपकारवाद, आस्थावादी अस्मिता को सबके सामने प्रस्तुत करके उन्हें इन मूल्यों से जोड़ने के लिए पुनः प्रेरित करें।
Sarjan Aur Rasasvadan : Bhartiya Paksh
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल के अन्तर्गत सन् 1942 तक एक ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘रस मीमांसा लिखकर समसामयिकता के सन्दर्भ में इसके प्रासंगिक कपाटों को खोलने की चेष्टा की है तो दूसरी ओर नई कविता के आन्दोलन ने रस चिन्तन को रूढ़, प्राचीन, अप्रासंगिक, ऐतिहासिक, मृत आदि घोषित करने की चेष्टा की है और अज्ञेय, लक्ष्मीकान्त वर्मा, जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी आदि ने इसे उसकी मूल सत्ता से च्युत किया। आधुनिक हिन्दी साहित्य में रस चिन्तन का यह द्वन्द्व, निश्चित ही एक जटिल बनकर हमारे सामने आता है।
मानव जाति के कलात्मक स्वभाव की यह रागात्मक चेतना भारतीय चिन्तन में रस के रूप में व्याख्यायित हुई है और आज उसे आकस्मिक रूप से नई कविता के कवियों तथा समीक्षकों द्वारा मृत घोषित कर दिया जाना, उनकी तथाकथित आधुनिकता के मोह का प्रतिफल है, जो सर्वथा असंगत है।
यही नहीं, आधुनिक युग के सृजनात्मक विस्तार के बीच रस चिन्तन की व्याप्ति की सम्भावनाओं का पुनर्विश्लेषण आवश्यक है। सृजन का सम्बन्ध केवल साहित्य से ही नहीं है, चित्र, वाद्य, नृत्य, संगीत, स्थापत्य आदि कलाएँ आज जो विस्तार प्राप्त कर रही हैं, उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ आस्वादन की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। सम्पूर्ण कलाओं के आस्वादन फल का ही नाम रस है। मानव मन की रागात्मक चेतना एवं अनुभूति जगत् के विस्तार से रस व्याप्ति की सम्भावनाओं का भी विस्तार हो रहा है और ऐसी स्थिति में, आज उसके बार-बार विश्लेषण की आवश्यकता है, नकारने या पलायन की नहीं।
इस प्रकार, इस कृति का मूल मन्तव्य है, आज की निषेधवादी विचारधाराओं का खंडन करते हुए इसकी सामयिक प्रासंगिकता का विश्लेषण।
Hindi Kavya Chintan Ke Mooladhar
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
वैश्विक परिदृश्य की ओर बढ़ती हिन्दी भाषा के अपने काव्य-चिन्तन के मूलाधार का न होना स्वयं में चिन्ताजनक सन्दर्भ है। आठवीं शती में प्रारम्भ होनेवाली आज की इस राष्ट्रभाषा के रचनात्मक साहित्य का मूल्यांकन या तो भारतीय संस्कृत भाषा साहित्य के काव्यशास्त्रीय मानकों पर दृष्टि डालने के लिए विवश करता है या फिर विदेशी साहित्य सिद्धान्तों की ओर दृष्टि दौड़ते हैं। राष्ट्रभाषा हिन्दी की कविता के लिए यह कितना लज्जाजनक है। देश-भर के विश्वविद्यालयों से जुडी भारतीय हिन्दी परिषद संस्था की राष्ट्रीय संगोष्ठियों में डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. नागेन्द्र, डॉ. भागीरथ मिश्र आदि विद्वान इस विषय पर बार-बार प्रश्न उठा चुके हैं किन्तु अभी तक इस दिशा में किए गए प्रयास सार्थक नहीं हो पाए।
इस प्रश्न के सन्दर्भ में यहाँ यदि यह कहा जाए कि ‘हिन्दी काव्य चिन्तन के मूलाधार’ शीर्षक ग्रन्थ हिन्दी की अपनी अस्मिता से जुड़े अपने नए मानकों की तलाश तथा हिन्दी भाषा की प्रकृति एवं उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ इतिहासबोध तथा संस्कृति को गहराई से देखने का एक मौलिक सन्दर्भ है। हिन्दी काव्य-चिन्तन की दिशा में निश्चित ही उसकी मौलिकता की प्रस्तुति को रखने, देखने, विश्लेषित करते हुए नए रूप में निष्कर्षबद्ध करने का यह सर्वथा नवीन प्रयास है।
Goswami Tulsidas Ki Jiwangatha
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
गोस्वामी तुलसीदास का जीवन-चरित प्राय: उनके जीवनकाल से ही लिखा जाता रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने अपनी दीर्घायु के बीच पर्याप्त ख्याति अर्जित कर ली थी और मुग़ल सम्राट अकबर, राजा मानसिंह, अछल रहीम खानखाना, मीराँबाई, राजा टोडर आदि ने उनकी श्रीरामभक्ति के प्रति पर्याप्त श्रद्धा और सम्मान अर्पित किया था। साहित्य की परम्परा में उनकी कालजयी कृति श्रीरामचरितमानस की चर्चा भक्ति एवं रीतिकाल से ही बराबर होती चली रही है।
गोस्वामी तुलसीदास की जीवनगाथा की मूल समस्या है कि इन पाँच सौ वर्षों के अवशेषों में बाबा को कहाँ खोजा जाए? यहाँ बाबा तुलसीदास की खोज का आधार उनकी कृतियाँ तथा पाठ हैं। प्रत्येक सर्जक अपनी कृति के पाठ में वर्ण से लेकर उसकी समग्र प्रबन्ध रचना तक व्याप्त रहता है—कण-कण में व्याप्त निर्गुण ब्रह्म की भाँति। साधक के लिए, अणु-अणु में व्याप्त ब्रह्म से आत्मसाक्षात्कार करके, उसे समाधि चित्त में उतारना बड़ी दुर्लभ समस्या है। ठीक उसी प्रकार, तुलसी की कृतियों में सर्वत्र व्याप्त महात्मा तुलसीदास का आत्मसाक्षात्कार करके उन्हें स्वानुभूति एवं सृजन के स्तर पर उतारना लेखक की वर्षपर्यन्त तक की चेष्टा रही है। इसे औपन्यासिक कृति का रूप देने के लिए ‘क्वचिदन्यतोपुपि’ का भी उसे आधार लेना पड़ा है—किन्तु चेष्टा यही रही है कि कृतियों का सृजन करके उन्हीं में विलीन गोस्वामी तुलसीदास को शब्दों से कैसे रेखांकित किया जाए। जो बन पड़ा, वह सामने है।
इस कृति के प्रकाशन में आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए अयोध्या शोध-संस्थान, अयोध्या-फ़ैज़ाबाद के निदेशक डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह तथा रजिस्ट्रीकरण अधिकारी व विशेष कार्याधिकारी डी.ए.पी. गौड़ का प्रकाशक हृदय से आभार व्यक्त करता है।
Bhartiya Kavya Shastra Ki Bhumika
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
भारतीय काव्य-चिन्तन की दृष्टि कविता के स्थापत्य से जुड़ी है। काव्य-सृजन शब्दार्थ का एक अद्वैत सहयोग है और कवि अपनी प्रतिभा के संयोग से इस शब्दार्थ में चित्त को विगलित करने की सामर्थ्य उत्पन्न करता है। पश्चिम में, यदि प्लेटो तथा अरस्तू से इसका प्रारम्भ माने तो सत्रहवीं शती तक वहाँ इसका अव्यवस्थित एवं अक्रमबद्ध विवेचन मिलता है, जबकि आचार्य भरत से प्रारम्भ होकर भारतीय काव्य-चिन्तन सत्रहवीं शती तक अपने विकास के चरम शीर्ष पर पहुँच जाता है।
‘शब्दार्थ’ रचना की प्रमुख समस्याएँ—‘सर्जन का मूलाधार’ (काव्य हेतु), ‘सृजन की केन्द्रीय चेतना’ (काव्यात्मा), ‘सृजन का मूल उद्देश्य’ (काव्य प्रयोजन), ‘कवि-कर्म का वैशिष्ट्य’ जैसे महत्त्वपूर्ण पक्षों पर यहाँ क्रमश: चिन्तन किया गया है और सार्वभौम हल निकालने की चेष्टा की गई है। भारतीय काव्य चिन्तन की केन्द्रीय धुरी ‘शब्दार्थ’ रचना ही है क्योंकि कविता की निष्पत्ति के लिए एकमात्र और अन्तिम मूल सामग्री वही है—भारतीय काव्य-चिन्तन का समग्र विकास अर्थात् शब्द सौष्ठव से लेकर आस्वादन तक का विवेचन, इसी शब्दार्थ पर ही आधारित रहा है और प्रस्तुत कृति का सम्बन्ध भारतीय कविता-चिन्तन के इसी वैशिष्ट्य को इंगित करना है।
Devki Ka Athwa Beta
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Vinay Patrika
- Author Name:
Tulsidas +2
- Book Type:

- Description:
आत्म निवेदन का सीधा सम्बन्ध अन्तःकरण के आयतन से है। इस तरह की रचनाओं में आत्म-संवाद झलकता है। सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य के इतिहास में तुलसीदास की ‘विनय पत्रिका’ और निराला की ‘अणिमा’ से लेकर ‘सांध्यकाकली’ तक की रचनाओं में यह स्वर विशेष रूप से सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखी होकर किया गया आत्मविश्लेषण, अन्तर्द्वन्द्वों की गहराई, निर्भय होकर की गई आत्म-समीक्षा और सामाजिकता इन रचनाओं को अपने युग का प्रतिनिधित्व प्रदान करती हैं।
तुलसीदास के ‘हौं’ और निराला के ‘मैं’ की प्रकृति, घनत्व और आत्मविस्तार का धरातल उन्हें भिन्न कालखंडों में भी समानधर्मा बनाता है—‘उत्पस्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा, कालो ह्यं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी’। ‘विनय पत्रिका’ और निराला की परवर्ती रचनाओं में अभिव्यक्त विनय-भावना कपोल कल्पना या आत्म-प्रवंचना नहीं है। यह दोनों कवियों के जीवन की गाढ़ी कमाई और सर्जनात्मक उपलब्धि है। दार्शनिक स्तर पर जीवन-जगत के प्रति द्वन्द्वात्मक अन्तर्दृष्टि एवं ‘अखिल कारुणिक मंगल’ के प्रसार की कामना ने भक्ति का साधारणीकरण कर दिया है। तुलसीदास का ‘हौं’ एवं निराला का ‘मैं’, अपने समाज से अन्तःक्रिया करते हुए बना है। आत्म-मुक्ति आत्म-प्रसार की भावना से अविच्छिन्न है। दोनों की विनय भावना का अन्त न तो भाग्यवाद में होता है और न ही निराशा में। इस दृष्टि से ‘विनय पत्रिका’ का अन्तिम पद और निराला की अन्तिम रचना सहज तुलनीय है।
Bhartiya Bhashaon Mein Ramkatha
- Author Name:
Dr. Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

- Description:
यह पुस्तक अयोध्या शोध संस्थान की शोध-पत्रिका ‘साक्षी’ के प्रकाशित विशेषांक ‘भारतीय भाषाओं में रामकथा' का ‘साक्षी' पुस्तकाकार रूप है। एक शोध विशेषांक को पुस्तकाकृति का स्वरूप प्रदान करना स्वयं में सांस्कृतिक महत्त्व तथा भारतीय गौरवबोध की संकल्पना का प्रतीक है। राम राष्ट्रीय संस्कृति के प्रतीक पुरुष हैं। अन्तरराष्ट्रीय मानवता के प्रतीक पुरुष राम सुमात्रा, जावा, कम्बोडिया, वर्मा, लंका, नेपाल, बोर्नियो आदि-आदि कितने देशों में स्वीकृत मानवतावादी चेतना के साक्ष्य हैं। देश की समस्त लोकभाषाओं में रामकथा 10वीं सदी से व्याप्त दिखाई पड़ती है। तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, गुजराती, मराठी, सिंधी, कश्मीरी, पहाड़ी, पंजाबी, असमिया, बांग्ला, ओड़िया, हिन्दी आदि समस्त भाषा-रूपों में यह रामकथा कितनी आत्मीयतापूर्वक लोकग्राह्य रही है, इसका उदाहरण यह कृति है। इस प्रकार, यह कृति राममयी भारतीय चेतना की राष्ट्रीय अस्मिता का वह साक्ष्य है, जिसके माध्यम से हम समग्र भारतीय राग-द्वेष त्यागकर महामानवतावाद के विशाल मंच पर एक साथ खड़े दिखाई पड़ते हैं और यहाँ न जाति है, न धर्म-संकीर्णता है, न राजनीतिक असहिष्णुता है और न ऊँच-नीच का भेदभाव है। समत्व एवं मानवीयता इस संस्कृति का प्राणवान तत्त्व है। यही भारतीय राष्ट्रीय चेतना का भी सारतत्त्व है। इस कृति का मुख्य लक्ष्य भारतीय राष्ट्रीय चेतना के इसी प्राणवान तत्त्व को उजागर करना है।
Shri Ramcharitmanas : Pratham Sopan Balkand
- Author Name:
Dr. Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

Computer Ki Medha
- Author Name:
Dr. Yogendra Pratap Singh
- Book Type:

- Description:
भविष्य में, यह महत्त्वपूर्ण होगा कि हम एआई के विकास और उपयोग को ऐसे ढंग से नियंत्रित करें जो इनसानी कौशल और रचनात्मकता को बढ़ावा दे, न कि उसे प्रतिस्थापित करे। —AI चैटबॉट कम्प्यूटर की मेधा पुस्तक कृत्रिम बुद्धि की बहस को आगे ले जाती है। इस पुस्तक में पहली बार कृत्रिम मेधा की चर्चा की गयी है जो भविष्य की सम्भावना को दिखाती है। यह कृत्रिम बुद्धि के द्वारा भाषा के क्षेत्र में होने वाले क्रान्तिकारी बदलाव को यह पुस्तक सामने लाती है। ‘कम्प्यूटर की मेधा’ न केवल भाषा प्रौद्योगिकी के लोगों के लिए उपयोगी है, वरन् मानविकी एवं समाज-विज्ञान के विद्वानों एवं चिन्तकों को इस नवाचार और नवोन्मेष के प्रति सोचने हेतु भी विवश करती है। कॉपीराइट और बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को कृत्रिम बुद्धि के द्वारा मिलने वाली चुनौती के विविध आयामों को भी इसमें प्रायोगिक रूप से दिखाया गया है। योगेन्द्र प्रताप सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज के हिन्दी एवं भारतीय भाषा विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने कई पुस्तकों का लेखन व सम्पादन किया है जिनमें प्रमुख हैं—बात बने, न बने, संचार माध्यम बनाम साहित्य, मीडिया और साहित्य, वैश्वीकरण और हिन्दी, भारतीय राष्ट्रीयता एवं सन्त-परम्परा, प्रयोजनमूलक हिन्दी, काव्यशास्त्र एवं साहित्यालोचन, नई कहानी, आधुनिक हिन्दी कहानी, हिन्दी निबन्ध एवं अन्य गद्य विधाएँ, एकांकी सप्तक, कहानी सप्तक। उन्होंने आधुनिक हिन्दी भाषा एवं साहित्य में सर्वेक्षणात्मक शोध-अध्ययन की पहल की। 1975 से 2000 तक के हिन्दी साहित्य का सर्वेक्षण (वृहत् शोध-परियोजना, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग), लॉकडाउन के दौरान साहित्यिक अभिरुचि का सर्वेक्षण किया। काव्यभाषा का भी सर्वेक्षण। वे भारतीय हिन्दी परिषद, प्रयागराज के प्रधानमंत्री; मानव संसाधन मंत्रालय एवं संसदीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्व राजभाषा सलाहकार और प्रथम राष्ट्रीय हिन्दी विज्ञान लेखक सम्मेलन, लखनऊ (2018) के संयोजक रहे हैं। 2000 से 2001 तक संस्कृति विभाग, भारत सरकार के कनिष्ठ फेलो रहे। फिलहाल मानविकी एवं समाजविज्ञान के अन्तर्विषयी शोध पर आधारित अर्द्धवार्षिक अन्तरराष्ट्रीय शोध जर्नल ‘शोध-संचयन’ के प्रधान सम्पादक है। उन्हें ‘मदन मोहन मालवीय सम्मान’, ‘वैश्वीकरण एवं हिन्दी’ पुस्तक पर हिन्दुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज के ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान-2018’, ‘उत्तर प्रदेश भाषा मित्र सम्मान-2018’, ‘आचार्य क्षेमेन्द्र मनीषी साहित्य सम्मान’, ‘पं. प्रतापनारायण मिश्र स्मृति युवा साहित्यकार सम्मान-1999’ से सम्मानित किया गया है।
Main Ram Bol Raha Hoon
- Author Name:
Pramod Kumar Agrawal
- Book Type:

- Description:
राम का जीवन भारतीयों के लिए एक आदर्श जीवन है। जन्म से लेकर अंत तक राम का चरित्र एक दीप-स्तंभ है। ऐसे सार्वकालिक राष्ट्रीय नायक का कथानक किसी भी कृति को गौरवान्वित करता है। ‘रामचरितमानस’ के धीरोदात्त नायक राम कथनी से अधिक करनी में विश्वास रखते थे। अतः उनके जो भी कथन उपलब्ध हैं, वे भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर हैं। राम के प्रस्तुत उद्घोष तुलसीकृत रामचरितमानस एवं लेखक की समांतर कृति ‘रामचरितमानस: नाट्य रूप’ से उद्धृत किए गए हैं। विश्वास है, सुधी पाठक प्रस्तुत कृति से प्रेरणा ग्रहण करके अपने जीवन को सफल बनाएँगे और भारतीय तथा विश्व-समाज को समुन्नत करने में योगदान देंगे।
Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg
- Author Name:
Vishen Lakhiani
- Book Type:

- Description:
Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg Hindi Translation of The Buddha and The Badass: The Secret Spiritual Art of Succeeding at Work. क्या आपने गौर किया है कि कैसे कुछ लोग नौकरी में कमाल के भाग्यशाली होते हैं! वे बड़ी आसानी से समाधान सुझा देते हैं। वे सही लोगों को आकर्षित करते हैं। लोग उनके अभियानों, कंपनियों, उनकी टीमों का हिस्सा बनना चाहते हैं। वे बड़े-बड़े काम मुसकराते हुए पूरा कर लेते हैं और वेतन में अच्छी वृद्धि के साथ ही प्रमोशन भी पा लेते हैं। ये सुपरस्टार कमाल की एकाग्रता और रचनात्मकता का प्रदर्शन कर खास दायरे का हिस्सा बन जाते हैं।यह पुस्तक बताती है कि उनके साथ कैसे जुड़ें। आप जहाँ भी हों, आप में अनोखी शक्तियाँ हैं। यह आधुनिक युग का भ्रम है कि कठिन परिश्रम और संघर्ष से ही सफलता मिलती है। आपके भीतर एक आत्मा है और एक बार आपने काम के क्षेत्र में इसकी पूरी शक्ति का प्रयोग किया, तो बस कमाल हो जाता है। अपने भीतर के बुद्ध और निर्भीक योद्धा को जगाना एक ऐसी प्रक्रिया है, जो आपके काम करने के तरीके को बदलकर रख देगी। आप उन तरीकों को जान लेंगे, जो वास्तविकता के हर नियम को आपके पक्ष में ला देंगे।
Rumi: Rooh-E-Kainat
- Author Name:
- Book Type:

- Description:
Desc awaiting from Publisher
Shri Hanuman Chalisa | Devotional & Spirituality Prayer of Lord Hanuman Book in Hindi
- Author Name:
Kishor Makwana::Rasikba Kesariya
- Book Type:

- Description:
श्री हनुमान चालीसा भगवान् श्रीराम तक पहुँचने का एक मार्ग है। जन-मानस में व्याप्त श्रीहनुमान चालीसा कोई सिद्ध कर ले, नित्य सौ बार पठन करे तो हनुमानजी उसकी सब इच्छा-आकांक्षा पूर्ण करते हैं, ऐसी मान्यता है। मनुष्य के जीवन को सफल बनानेवाली ये रत्नमणिकाएँ हैं। श्रीहनुमानजी का संपूर्ण चरित्र हम सबमें श्रद्धा, विश्वास, ज्ञान, शक्ति, पुरुषार्थ, भक्ति, सत्य, प्रामाणिक प्रयत्न, समर्पण भाव, पराक्रम, संस्कार- संपन्न वाणी, विवेक और निष्काम कर्म जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए अनेक गुणों का सिंचन करता है।
Gita-Mata
- Author Name:
Mahatma Gandhi
- Book Type:

- Description:
महात्मा गांधीजी ने गीता को ‘माता’ की संज्ञा दी थी। उसके प्रति उनका असीम अनुराग और भक्ति थी। उन्होंने गीता के श्लोकों का सरल-सुबोध भाषा में तात्पर्य दिया, जो ‘गीता-बोध’ के नाम से प्रकाशित हुआ। उन्होंने सारे श्लोकों की टीका की और उसे ‘अनासक्तियोग’ का नाम दिया। कुछ भक्ति-प्रधान श्लोकों को चुनकर ‘गीता-प्रवेशिका’ पुस्तिका निकलवाई। इतने से भी उन्हें संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने ‘गीता-पदार्थ-कोश’ तैयार करके न केवल शब्दों का सुगम अर्थ दिया, अपितु उन शब्दों के प्रयोग-स्थलों का निर्देश भी किया। गीता के मूल पाठ के साथ वह संपूर्ण सामग्री प्रस्तुत पुस्तक में संकलित है। गीता को हमारे देश में ही नहीं, सारे संसार में असाधारण लोकप्रियता प्राप्त है। असंख्य व्यक्ति गहरी भावना से उसे पढ़ते हैं और उससे प्रेरणा लेते हैं। जीवन की कोई भी ऐसी समस्या नहीं, जिसके समाधान में गीता सहायक न होती हो। उसमें ज्ञान, भक्ति तथा कर्म का अद्भुत समन्वय है और मानव-जीवन इन्हीं तीन अधिष्ठानों पर आधारित है। महात्मा गांधी की कलम से प्रसूत गीता पर एक संपूर्ण पुस्तक, जो जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालकर पाठक की कर्मशीलता को गतिमान करेगी।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book