Pratinidhi Kavitayen : Praveen Shakir
(0)
Author:
Parveen Shakir, Abdul BismillahPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
199
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पाकिस्तान की उर्दू शायरी में परवीन शाकिर की गणना प्रेम की नाजुक मूर्ति के रूप में होती है। परवीन का प्रेम अपने अद्वितीय अन्दाज़ में ‘नर्म सुख़न’ बनकर फूटा है और अपनी ‘ख़ुशबू’ से उसने उर्दू शायरी की दुनिया को सराबोर कर दिया है।</p> <p>पाकिस्तान की ही प्रसिद्ध कवयित्री फ़हमीदा रियाज़ के अनुसार, ‘परवीन के शे’रों में लोकगीतों की सी सादगी और लय भी है और क्लासिकी मौसीकी (शास्त्रीय संगीत) की नफ़ासत और नज़ाकत भी। उसकी नज़्में और ग़ज़लें भोलेपन और सॉफ़िस्टिकेशन का दिलआवेज़ संगम हैं।’</p> <p>परवीर शाकिर की शायरी का केन्द्रीय विषय ‘स्त्री’ है। प्रेम में टूटी हुई, बिखरी हुई खुद्दार स्त्री। लेकिन उसकी शायरी की यह कोई सीमा नहीं है। वस्तुतः परवीन की शायरी प्रेम की एक ऐसी लोरी है जो अपने मद्धिम-मद्धिम सुरों से सोते हुओं को जगाने का काम करती है।</p> <p>परवीन की शायरी में रूमानियत भी है और गहरी ऐंद्रिकता भी, पर कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि सामने की दुनिया सिर्फ़ एक सपना है। अपनी सूक्ष्म यथार्थपरकता के कारण ही मुख्य रूप से ‘स्त्री’ और ‘प्रेम’ को आधार बनाकर लिखी गई ये कविताएँ अनुभूति के व्यापक द्वार खोलती हैं।
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पाकिस्तान की उर्दू शायरी में परवीन शाकिर की गणना प्रेम की नाजुक मूर्ति के रूप में होती है। परवीन का प्रेम अपने अद्वितीय अन्दाज़ में ‘नर्म सुख़न’ बनकर फूटा है और अपनी ‘ख़ुशबू’ से उसने उर्दू शायरी की दुनिया को सराबोर कर दिया है।</p>
<p>पाकिस्तान की ही प्रसिद्ध कवयित्री फ़हमीदा रियाज़ के अनुसार, ‘परवीन के शे’रों में लोकगीतों की सी सादगी और लय भी है और क्लासिकी मौसीकी (शास्त्रीय संगीत) की नफ़ासत और नज़ाकत भी। उसकी नज़्में और ग़ज़लें भोलेपन और सॉफ़िस्टिकेशन का दिलआवेज़ संगम हैं।’</p>
<p>परवीर शाकिर की शायरी का केन्द्रीय विषय ‘स्त्री’ है। प्रेम में टूटी हुई, बिखरी हुई खुद्दार स्त्री। लेकिन उसकी शायरी की यह कोई सीमा नहीं है। वस्तुतः परवीन की शायरी प्रेम की एक ऐसी लोरी है जो अपने मद्धिम-मद्धिम सुरों से सोते हुओं को जगाने का काम करती है।</p>
<p>परवीन की शायरी में रूमानियत भी है और गहरी ऐंद्रिकता भी, पर कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि सामने की दुनिया सिर्फ़ एक सपना है। अपनी सूक्ष्म यथार्थपरकता के कारण ही मुख्य रूप से ‘स्त्री’ और ‘प्रेम’ को आधार बनाकर लिखी गई ये कविताएँ अनुभूति के व्यापक द्वार खोलती हैं।
Book Details
-
ISBN9788126707669
-
Pages142
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘कुठाँव’ में स्त्री और पुरुष का, प्रेम और वासना का, हिन्दू और मुसलमान का और ऊँची-नीची जातियों का एक भीषण परिदृश्य रचा गया है। अब्दुल बिस्मिल्लाह समाज और विशेष रूप से मुस्लिम समाज की आन्तरिक विडम्बनाओं और विसंगतियों को बख़ूबी चित्रित करते रहे हैं। इस उपन्यास में मेहतर समाज की मुसलमान औरत इद्दन और उसकी बेटी सितारा है जो ऊँची जाति के, पैसेवाले मुस्लिम मर्दों से लोहा लेती हैं। स्त्री और पुरुष के और भी आमने-सामने के कई समीकरण यहाँ रचे गए हैं और यौन को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करके अपनी सामाजिक और मर्दाना प्रतिष्ठा को द्विगुणित करने के कुप्रयासों का भी निर्दयतापूर्वक भंडाफोड़ किया गया है। यह प्रश्न कि सदियों से ताक़त के क़िस्म-क़िस्म के चौखटों में जकड़ी, लड़ती-भिड़ती और जीतती-हारती औरतों के लिए आख़िर मुक्ति की राह कहाँ है? इस सन्दर्भ में उपन्यास सपनों की अनन्त उड़ानों पर विराम लेता है। हम जान पाते हैं कि ये सपने ही हैं जो उन्हें अन्तत: मुक्ति की मंज़िल तक ले जाएँगे। तब न कोई अपनी दैहिक ताक़त से उन्हें परास्त कर पाएगा, न सामाजिक ताक़त से।
Jheeni-Jheeni Beeni Chadariya
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Abdul Bismillah
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बनारस के साड़ी-बुनकरों पर केन्द्रित अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास हिन्दी कथा-साहित्य में एक नये अनुभव-संसार को मूर्त करता है और इस अनुभव-संसार में साड़ी-बुनकरों की जिस अभावग्रस्त और रोग-जर्जर दुनिया में हम मतीन, अलीमुन और नन्हें इक़बाल के सहारे प्रवेश करते हैं, वहाँ मौजूद हैं रऊफ चचा, नजबुनिया, नसीबुन बुआ, रेहाना, कमरुन, लतीफ, बशीर और अल्ताफ़ जैसे अनेक लोग, जो टूटते हुए भी साबुत हैं–हालात से समझौता नहीं करते, बल्कि उनसे लड़ना और उन्हें बदलना चाहते हैं और अन्ततः अपनी इस चाहत को जनाधिकारों के प्रति जागरूक अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि इक़बाल को सौंप देते हैं। इस प्रक्रिया में लेखक ने शोषण के उस पूरे तंत्र को भी बारीकी से बेनकाब किया है जिसमें एक छोर पर है गिरस्ता और कोठीवाल, तो दूसरे छोर पर भ्रष्ट राजनीतिक हथकंडे और सरकार की तथाकथित कल्याणकारी योजनाएँ। साथ ही उसने बुनकर-बिरादरी के आर्थिक शोषण में सहायक उसी की अस्वस्थ परम्पराओं, सामाजिक कुरीतियों, मजहबी जड़वाद और साम्प्रदायिक नज़रिये को भी अनदेखा नहीं किया है।
Taki Sanad Rahe
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Abdul Bismillah
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अब्दुल बिस्मिल्लाह उस जीवन-यथार्थ के कहानीकार हैं, जहाँ छोटी-से-छोटी इच्छा पूरी करने के लिए अथक संघर्ष करना पड़ता है। इस जीवन को व्यापक सामाजिकता के कुलीन विवरणों के बीच पहचानना एक दृष्टि-सम्पन्न रचनाकार का ही काम है। हाशिए पर चल रही सक्रियताओं को रचनाशीलता के केन्द्र में प्रतिष्ठित करते हुए अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपनी कहानियों को आकार दिया है।
‘ताकि सनद रहे’ अब्दुल बिस्मिल्लाह के चार कहानी-संग्रहों—'रैन बसेरा', ‘कितने-कितने सवाल’, ‘टूटा हुआ पंख’ और ‘ज़ीनिया के फूल’ में शामिल रचनाओं का समग्र है। इनमें से बहुत सारी कहानियाँ पाठकों व आलोचकों के बीच चर्चित हो चुकी हैं।
यदि हम मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के जीवन का समकालीन यथार्थ पहचानना चाहते हैं तो इन कहानियों में क़दम-क़दम पर ठहरकर हमें ग़ौर से देखना होगा। लेखक ने सामाजिक विकास की आलोचना इस तरह की है कि स्थितियों को जीनेवाले चरित्र पाठक की संवेदना का हिस्सा बन जाते हैं। अलग से यह घोषित करने की ज़रूरत नहीं कि लेखक की प्रतिबद्धता क्या है और उसके सरोकार क्या हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह की भाषा पारदर्शी है। सहज और अर्थ की त्वरा से भरी। इस सहजता की अन्विति कई बार ऐसे होती है, ‘नाले के इस पार सड़क थी और उस पार जंगल। उन दिनों जंगल का रंग इस क़दर हरा हो गया था कि वह हमेशा काले बादलों में डूबा हुआ नज़र आता था। वहाँ जो एक छोटी-सी, ऊँची-नुकीली पहाड़ी थी, वह घास के ताजिए की तरह लगती थी। उस जंगल में शाजा, सलई, धवा, हर्रा, पलाश, कुसुम और जामुन के पेड़ कसरत से भरे हुए थे। उन दिनों कुसुम के फल तो झड़कर ख़तम हो गए थे, पर जामुन अभी बचे हुए थे। हवा चलती तो काले-काले जामुन भद-भद नीचे गिरते और ऐसा लगता मानो प्यार के रस में डूबी हुई आँखें टपकी पड़ रही हों।'
वस्तुतः इन कहानियों को समग्रता में पढ़ना परिचित परिवेश में भी अप्रत्याशित यथार्थ से साक्षात्कार करने सरीखा है।
Shaadi ka Joker
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Abdul Bismillah
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‘शादी का जोकर’ वरिष्ठ कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह का महत्त्वपूर्ण कहानी-संग्रह है। इस संग्रह में सत्रह कहानियाँ हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपनी रचनाशीलता का प्रस्थान व्यापक सामाजिक सरोकारों से निर्मित किया था। उपन्यासों और कहानियों की सार्थक व यशस्वी रचना-यात्रा करने के बाद उनमें नई तरह की सादगी जगमगाने लगी है।
प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ सक्रिय शब्दों में व्यक्त हुई हैं। लेखक ने आम ज़िन्दगी से झाँकती परेशानी, पशेमानी और कशमकश से इन कहानियों के सूत्र सहेजे हैं। पहली ही कहानी ‘ख़ून' रिश्तों की हिफ़ाज़त करनेवाले शख़्स और बेमुरव्वत दुनिया की दास्तान है। 'त्राहिमाम', 'कैलेंडर', ‘महामारी’, ‘तीसरी औरत’ सरीखी रचनाएँ रेखांकित करती हैं कि पठनीयता और सार्थकता की सहभागिता से स्मरणीय का जन्म होता है।
यह उल्लेखनीय है कि एक नैतिक निष्कपट क़िस्सागोई अब्दुल बिस्मिल्लाह की पहचान है। सामाजिक अविश्वास और उत्पीड़न के प्रसंग को 'शादी का जोकर' में अद्भुत अभिव्यक्ति मिली है। बारिश होने पर गाँव की बरात में आए दिल्ली के कला रसिकों का भागना और कला की दशा का बखान ‘तूफ़ानी पहलवान’ के इन शब्दों में है—‘अब सिर्फ़ बच गई अमराई में दोनों चारपाइयाँ, जो भीगती रहीं उस धारासार वर्षा में और आम के तने से चिपटे खड़े रहे तूफ़ानी पहलवान हाथ जोड़े। भीगती रही काँधे से लटकी उनकी ढोलक और उसकी डोरियों से टपकता रहा बूँद-बूँद पानी टप्प-टप्प...।'
ज़ाहिर है कि 'शादी का जोकर' एक उल्लेखनीय कहानी-संग्रह है। कथा-रस के साथ समकालीन सभ्यता में व्याप्त असमंजस की अभिव्यक्ति इसकी विशेषता है।
Mukhara Kya Dekhe
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Abdul Bismillah
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‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ (1986) के प्रकाशन के ठीक दस वर्षों बाद आनेवाला अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास अपनी महाकाव्यात्मक गरिमा के साथ एक ऐसे मुखड़े का रहस्योद्घाटन कर रहा है जो बाहर से बहुत भव्य है, पर भीतर से अत्यन्त कुरूप। ‘मुखड़ा क्या देखे’ की कथा भारतीय स्वाधीनता के कुछ बाद से लेकर इमरजेंसी तक फैली हुई है। इस पूरे दौर में देश के भीतर घटित सारी घटनाओं की छाप ग्रामीण जीवन पर किस रूप में पड़ी, उपन्यास की नींव इसी प्रश्न पर डाली गई है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि देश-दुनिया में घटनेवाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को बुद्धिजीवी और इतिहासकार जिस रूप में देखते हैं, गाँव के सामान्य लोग उसी रूप में नहीं देखते। उनके विचार और निष्कर्ष भले ही ग़लत होते हों, पर होते हैं ठोस। निस्सन्देह ‘मुखड़ा क्या देखे’ ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इसमें भारतीय इतिहास के अनेक बिन्दुओं की ऐसी व्याख्या है, जो इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलेगी।
‘मुखड़ा क्या देखे’ उपन्यास किसी विशेष गाँव या विशेष पात्रों की कथा न होकर सामान्य भारतीय जनमानस की कथा है। इस उपन्यास को बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक समाज की दृष्टि से भी नहीं देखा जा सकता। भारतवर्ष बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषायी देश है। हिन्दी में ऐसे अनेक उपन्यास आए हैं, जो या तो बहुसंख्यक समाज की कहानी कहते हैं या फिर अल्पसंख्यक समाज की, लेकिन ‘मुखड़ा क्या देखे’ समग्र भारतीय समाज की कहानी कहता है, जिसमें सम्पन्न वर्ग के हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर हिन्दू ‘परजा’ और मुसलमान ‘परजा’ का शोषण करते हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिस विषय पर लिखते हैं, उसमें आकंठ डूब जाते हैं। यही कारण है कि इस उपन्यास में जिस प्रामाणिकता के साथ उन्होंने मुसलमान रीति-रिवाज़ों का चित्रण किया है, उसी प्रामाणिकता के साथ हिन्दू और ईसाई समुदाय के रीति-रिवाज़ों का भी। अर्थात् पिछले बीस वर्षों में आए हिन्दी उपन्यासों में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हिन्दी में लिखा गया यह उपन्यास समूचे भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अन्तर्वस्तु और शिल्प पर ठेठ देसी रंगों एवं संस्कारों की गहरी छाप है।
Nashtar
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Hasan Shah +1
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‘नश्तर’ को पहला भारतीय उपन्यास कहा जा सकता है। सन् 1790 में जब हसन शाह ने इसे लिखा था तब तक हमारे यहाँ अंग्रेज़ी तर्ज़ के ‘नॉवेल’ का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था।
यह वो ज़माना था जब भारत में नवाबी शानो-शौक़त अपने उतार पर थी और अंग्रेज़ों ने जगह-जगह अपनी जड़ें जमाना शुरू कर दिया था। अब वे ही स्वयं को नवाब समझने लगे थे और यहाँ की नाचने-गाने वाली स्त्रियों से अपना मनोरंजन करना उनका शौक़ बन गया था। इसके चलते इस व्यवसाय से जुड़ी स्त्रियों के समूह भी रोज़ी-रोज़गार के सिलसिले में अंग्रेज़ी दरबारों से जुड़ने लगे थे।
‘नश्तर’ का कथानायक ऐसे ही एक समूह की एक लड़की के प्रेम में पड़ जाता है जिसका अंजाम किसी ग्रीक ट्रेजेडी से कम नहीं होता। खानम जान के मोहक लेकिन सशक्त व्यक्तित्व ने उस ट्रेजेडी को जो गरिमा प्रदान की है, वह अद्भुत है।
‘नश्तर’ एक आत्मकथात्मक उपन्यास है। एक प्रेमकथा। एक त्रासदी...किन्तु यह केवल प्रेम की नहीं, बल्कि नृत्य-संगीत और कला-संस्कृति से जुड़ी एक पूरी ज़िन्दगी, पूरी परम्परा की भी त्रासदी है।
मूलत: फ़ारसी भाषा में रची गई अठारहवीं शताब्दी की इस कृति में शिल्प के स्तर पर आधुनिकता के अनेक लक्षणों को भी देखा जा सकता है।
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