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Book Details
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ISBN9789387310162
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Pages120
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Yashodhra Bhatnagar
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Man Ke : Soor Ke
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Keshavchandra Verma
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Description:
केशव जी की संगीत विषयक अन्य कृतियाँ—‘कोशिश : संगीत समझने की’ तथा ‘राग और रस के बहाने’ एवं ‘शब्द की साख’ (रेडियो शिल्प)। उन्होंने कितना शोध किया होगा—पुराणों का अध्ययन, संगीतशास्त्र के दुर्लभ ग्रन्थों का पारायण, भारतीय इतिहास के विभिन्न कालों में से संगीतज्ञों के बारे में यदा-कदा मिलनेवाले सन्दर्भों का संकलन और कभी लोक प्रचलित किन्तु अब धीरे-धीरे विस्मृत होती जाती किंवदन्तियों का पुनरुद्धार—वास्तव में उनका यह कृतित्व आश्चर्यचकित कर देता है। इतना ही होता तो वह बड़ी उपलब्धि होती, पर इस बड़ी उपलब्धि का अनूठापन यह है कि इन कथाओं की शैली न तो कहीं बोझिल है और न कहीं शास्त्रज्ञान का आत्मप्रदर्शन। रचनाकार सहज, सरल रसमय विषय की अन्तर्निहित-रसधारा में स्वयं सहज भाव से बहता जाता है और अपने पाठक को भी अपने साथ बहा ले जाता है...
—धर्मवीर भारती (इस पुस्तक के ‘आमुख’ से)
Yugpurush Jaiprakash Narayan
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Uma Shanker Verma
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- Description: जनक्रांति झुग्गियों से न हो जब तलक शुरू, इस मुल्क पर उधार है इक बूढ़ा आदमी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के क्रांतिकारी व्यक्तित्व की झलक देतीं सूर्यभानु गुप्त की उपरोक्त पंक्तियाँ बतलाती हैं कि आम जन में परिवर्तन के सपने को जयप्रकाश नारायण ने कैसे रूपाकार दिया था। युगपुरुष जयप्रकाश में प्रसिद्ध कवि, संपादक उमाशंकर वर्मा ने हिंदी के ऐसे सैकड़ों कवियों की कविताएँ संकलित की हैं, जिन्होंने जयप्रकाश के क्रांतिकारी उद्घोष को सुना और उससे उद्वेलित हुए। भगीरथ, दधीचि, भीष्म, सुकरात, चंद्रगुप्त, गांधी, लेनिन और न जाने कैसे-कैसे संबोधन जे.पी. को दिए कवियों ने। उन्हें याद करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सही कहा कि ‘इस देश की संस्कृति का जो कुछ भी उत्तम और वरेण्य है, वह उनके व्यक्तित्व में प्रतिफलित हुआ है।’ आरसी प्रसाद सिंह, इंदु जैन, उमाकांत मालवीय, कलक्टर सिंह केसरी, जगदीश गुप्त, जानकी वल्लभ शास्त्री, धर्मवीर भारती, पोद्दार रामावतार अरुण, बालकवि बैरागी, बुद्धिनाथ मिश्र, रामधारी सिंह दिनकर, कुमार विमल, नीरज आदि प्रसिद्ध कवियों-गीतकारों सहित सैकड़ों रचनाकारों की लोकनायक के प्रति काव्यांजलि को आप यहाँ पढ़ सकते हैं। —कुमार मुकुल
Himalaya Ne Pukara
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Gopal Singh 'Nepali'
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- Description: गहरी और सक्रिय राजनीतिक चेतना से सम्पन्न ‘हिमालय ने पुकारा’ की कविताएँ उस भारतीय जन का आह्वान करती हैं जिसके पास साहस भी है और शौर्य का इतिहास भी, लेकिन वह कभी अध्यात्म तो कभी अतिरिक्त सहिष्णु भाव के चलते सम्मुख मौजूद परिस्थितियों को अनदेखा कर जाता है। पुस्तक की भूमिका में नेपाली जी एक कथा के माध्यम से इस ओर इशारा भी करते हैं और तत्कालीन राजनीतिक हालात का हवाला देते हुए सच्चे सैनिक की तरह आम जन-गण को संगठित होकर उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करते हैं।कह दो कि हिमालय तो क्या पत्थर भी न देंगे| लद्दाख की क्या बात है बंजर भी न देंगे आसाम हमारा है रे मर कर भी न देंगे जिस दौर की ये कविताएँ हैं, उसकी पृष्ठभूमि में चीन और भारत का संघर्ष है, इसलिए कई कविताओं-गीतों में उसकी स्पष्ट छवियाँ दिखाई देती हैं। लेकिन जो चीज इन्हें आज भी पुनः-पुनः पठनीय बनाती है, वह है कवि की मनीषा और काव्यात्मक सामर्थ्य। वे छन्द को एक शस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं, और अपने भावों को भी कहीं अस्पष्ट नहीं होने देते। यह सन्तुलन आज के कवियों के लिए खास तौर पर अनुकरणीय है।
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