Urvashi : Dinkar Granthmala
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उर्वशी और पुरूरवा की प्रेम-कथा का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इस प्राचीनतम आख्यान को अपने युग के नए अर्थ से जोड़ने का सृजनात्मक प्रयास दिनकर की विलक्षण दृष्टि का परिचय है। वे मानते हैं कि उर्वशी सनातन नारी तो पुरूरवा सनातन नर का प्रतीक है। उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत्र की कामनाओं तो पुरूरवा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द से मिलनेवाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य का प्रतीक है।</p> <p>पुरूरवा और उर्वशी का प्रेम मात्र शरीर के धरातल पर आकार नहीं लेता, वह शरीर से जन्म लेकर मन और प्राण के गहन, गुह्य लोकों में प्रवेश करता है। रस के भौतिक आधार से उठकर रहस्य और आत्मा के अन्तरिक्ष में विचरण करता है। पुरूरवा के भीतर देवत्व की तृषा है। इसलिए मर्त्य लोक के नाना सुखों में वह व्याकुल और विषण्ण है। उर्वशी देवलोक से उतरी हुई नारी है। वह सहज, निश्चिन्त भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है। पुरूरवा की वेदना समग्र मानव-जाति की चिरन्तन वेदना से ध्वनित है।</p> <p>उर्वशी से पुरूरवा के बिछड़ने के बाद विरह को दिनकर एक दार्शनिकता के साथ व्यक्त करते हैं—संन्यास प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता, न प्रेम संन्यास को क्योंकि प्रेम प्रकृति और परमेश्वर संन्यास है और मनुष्य को सिखलाया गया है कि एक ही व्यक्ति परमेश्वर और प्रकृति दोनों को प्राप्त नहीं कर सकता। ...और वेदना की भूमि चूँकि पुरूरवा के संन्यास पर समाप्त नहीं हुई, इसलिए औशीनरी की व्यथा ने कविता को वहाँ समाप्त होने नहीं दिया।</p> <p>निहितार्थ यही कि इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श कर प्रेम की आध्यात्मिक महिमा को एक व्यापक धरातल पर रचती 'उर्वशी' दिनकर की अपने पाठ और प्रभाव में कभी न ख़त्म होनेवाली कृति है, एक दुर्लभ गीति-नाट्य कृति।
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उर्वशी और पुरूरवा की प्रेम-कथा का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इस प्राचीनतम आख्यान को अपने युग के नए अर्थ से जोड़ने का सृजनात्मक प्रयास दिनकर की विलक्षण दृष्टि का परिचय है। वे मानते हैं कि उर्वशी सनातन नारी तो पुरूरवा सनातन नर का प्रतीक है। उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत्र की कामनाओं तो पुरूरवा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द से मिलनेवाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य का प्रतीक है।</p>
<p>पुरूरवा और उर्वशी का प्रेम मात्र शरीर के धरातल पर आकार नहीं लेता, वह शरीर से जन्म लेकर मन और प्राण के गहन, गुह्य लोकों में प्रवेश करता है। रस के भौतिक आधार से उठकर रहस्य और आत्मा के अन्तरिक्ष में विचरण करता है। पुरूरवा के भीतर देवत्व की तृषा है। इसलिए मर्त्य लोक के नाना सुखों में वह व्याकुल और विषण्ण है। उर्वशी देवलोक से उतरी हुई नारी है। वह सहज, निश्चिन्त भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है। पुरूरवा की वेदना समग्र मानव-जाति की चिरन्तन वेदना से ध्वनित है।</p>
<p>उर्वशी से पुरूरवा के बिछड़ने के बाद विरह को दिनकर एक दार्शनिकता के साथ व्यक्त करते हैं—संन्यास प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता, न प्रेम संन्यास को क्योंकि प्रेम प्रकृति और परमेश्वर संन्यास है और मनुष्य को सिखलाया गया है कि एक ही व्यक्ति परमेश्वर और प्रकृति दोनों को प्राप्त नहीं कर सकता। ...और वेदना की भूमि चूँकि पुरूरवा के संन्यास पर समाप्त नहीं हुई, इसलिए औशीनरी की व्यथा ने कविता को वहाँ समाप्त होने नहीं दिया।</p>
<p>निहितार्थ यही कि इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श कर प्रेम की आध्यात्मिक महिमा को एक व्यापक धरातल पर रचती 'उर्वशी' दिनकर की अपने पाठ और प्रभाव में कभी न ख़त्म होनेवाली कृति है, एक दुर्लभ गीति-नाट्य कृति।
Book Details
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ISBN9788180313165
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Pages182
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Dilli
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Ramdhari Singh Dinkar
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style="font-weight: 400;">‘दिनकर’ की कविताओं में जो गीतात्मक लयात्मकता है वह ‘दिल्ली’ संग्रह की कविताओं में भी मुखर है। इसमें चार कविताएँ संकलित हैं जो दिल्ली के यथार्थ और निहितार्थ को इतने अनूठे ढंग से प्रकट करती हैं कि यह शहर एक प्रतीक बनकर सामने आता है।
संग्रह की पहली कविता ‘नई दिल्ली के प्रति’ 1929 की है। इसकी पृष्ठभूमि में नई दिल्ली का प्रवेशोत्सव है जो 1929 में मनाया गया था। उसी वर्ष भगत सिंह पकड़े गए और लाहौर-कांग्रेस में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास हुआ। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उस उथल-पुथल भरे दौर में उत्सव और दमन के विरोधाभासों को यह कविता बखूबी मूर्त करती है।
संग्रह की दूसरी कविता ‘दिल्ली और मास्को’ है जिसका रचनाकाल 1945 का है। इसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाजवादी क्रान्ति का जयघोष निहित है जो राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों की प्रभावी भूमिकाओं को दिल्ली के सन्दर्भों में देखे जाने की माँग करती है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व रचित उपरोक्त दोनों कविताओं के विपरीत शेष दो कविताएँ—‘हक़ की पुकार’ और ‘भारत का यह रेशमी नगर’—स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क्रमश: 1952 और 1954 की हैं। इन दोनों कविताओं में दिल्ली का तत्कालीन यथार्थ तो प्रकट हुआ ही है, वह विलासी रूप भी उजागर हुआ है जिससे राजनीतिक कर्मठता को प्रेरणा नहीं मिलती, उलटे बाधा पड़ती है। दिनकर कहते हैं कि देश के नवनिर्माण का कार्य जो इतनी धीमी गति से चल रहा है, उसका भी मुख्य कारण यही है कि कार्याधिकारी देश की आकुलता से अपरिचित हैं। जबकि दिल्ली हमारी सारी शिराओं का केन्द्र है। इसी ऊहापोह की राजनीतिक स्थिति से जो क्षोभ उठता है, वही इन कविताओं का मूल भाव है।
राष्ट्रीय राजधानी पर लिखी इन कविताओं को एक साथ पढ़ने पर पाठक कवि के उपरोक्त दृष्टिकोण को कुछ अधिक न्याय के साथ ग्रहण कर सकेंगे।
Naye Subhashit
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
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सुभाषित संस्कृत काव्य-साहित्य की एक प्रचलित शैली है जिसमें रचित पदों में दृष्टि, सत्य, सौन्दर्य आदि का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। कम शब्दों में बात कहने की कला इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। राष्ट्रकवि दिनकर की इस पुस्तक में इसी शैली में रचे गए हिन्दी-पद शामिल हैं।
सुभाषित हमेशा वाक्-कौशल लिये होते हैं। इनमें अन्तर्निहित सन्देश ऐसी चतुराई से पद्य-बद्ध किए जाते हैं कि इन्हें याद भी किया जा सकता है और अपने व्यावहारिक जीवन में उपयोग भी किया जा सकता है। इस पुस्तक के सुभाषित विभिन्न विषयों से सम्बन्धित हैं और इनका कैनवस बहुत बड़ा है। ये अनुभव और अध्ययन के साँचे में ढले हुए सुभाषित हैं। इसलिए इनमें जो एक अलग छन्दात्मक रंग देखने को मिलता है, उसके प्रभाव में ग़ज़ब का आकर्षण और माधुर्य है। व्यंग्य-विनोद का पुट तो ख़ास है ही।
दिनकर ने अपने इन सुभाषितों में जिस काव्य-कौशल का परिचय दिया है, वह अपनी सम्प्रेषणीयता में एक मिसाल है। मिसाल इस मायने में भी कि आम पाठकों को ध्यान में रखकर भी ऐसे काव्य की रचना की जानी चाहिए। यही कारण है कि ये सुभाषित पढ़नेवाले को अपनी ही कहन का हिस्सा लगने लगते हैं और हृदयतल को छू वहीं ठहर जाते हैं।
इस पुस्तक में ऐसे कई सुभाषित हैं जो आज के उथल-पुथल-भरे समय में साठ साल पहले लिखे जाने के बाद भी प्रासंगिक हैं। इसलिए यह पुस्तक सिर्फ़ पठनीय ही नहीं, एक ज़रूरी पुस्तक भी है।
Hunkar
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Ramdhari Singh Dinkar
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रामधारी सिंह ‘दिनकर’ करुणा को जीने, विषमताओं पर चोट करने, भाग्यवाद को तोड़ने और क्रान्ति में विश्वास करनेवाले कवि हैं। यही कारण है कि पराधीन भारत की बात हो या स्वाधीन भारत की, वे अपने विज़न और वितान में एक अलग ही ऊँचाई पर दिखते हैं। और इस बात की मिसाल है उनका यह संग्रह ‘हुंकार’।
‘हुंकार’ में इस शीर्षक से कोई कविता नहीं है, लेकिन हर कविता एक हुंकार है। काव्य में ओज को कलात्मक रूप देनेवाले कवि हैं दिनकर। उन्होंने अपने काव्य में राष्ट्रीय अस्मिता की वह ज़मीन तैयार की, जिससे स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हो सके। उन्होंने ‘अनल-किरीट’ में लिखा—‘धरकर चरण विजित शृंगों पर झंडा वही उड़ाते हैं/अपनी ही उँगली पर जो खंजर की जंग छुड़ाते हैं।’
दिनकर विसंगतियों और विडम्बनाओं को तटस्थ होकर नहीं देख सकते, वे उनकी जड़ों तक जाते हैं। ‘हाहाकार’ कविता में जो चित्र उन्होंने खींचे हैं, वे बेचैनी से भर देनेवाले हैं, क्योंकि यह धरती ऐसी हो गई है, जहाँ चीखें ही चीखें हैं। विदारक तो यह कि कुछ बच्चे माँ के सूखे स्तन चूस रहे हैं, कुछ की हड्डियाँ क़ब्र से ‘दूध-दूध’ चिल्ला रही हैं। इसलिए ‘दिल्ली’ जो क्रूर, निर्लज्ज और मनमानी की प्रतीक बन चुकी, उसे ललकारते हुए कहते हैं—‘अरी! सँभल, यह क़ब्र न फटकर कहीं बना दे द्वार/निकल न पड़े क्रोध में लेकर शेरशाह तलवार!’
इस संग्रह में दिनकर की दृष्टि वैश्विक है। इसलिए जिस तरह वे ‘तक़दीर का बँटवारा’ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच वार्ता विफल होने पर जन को आगाह करते हैं, उसी तरह ‘मेघ-रन्ध्र में बची रागिनी’ में रक्तपिपासु इटैलियन फ़ासिस्टों के अबीसीनिया पर आक्रमण को लेकर सजग करनेवाली चेतना को प्रतिपादित करने से नहीं चूकते।
‘हुंकार’ क्रान्ति को एक नया रूप देनेवाला ऐसा संग्रह है जो आठ दशकों से विद्रोह की आवाज़ बना हुआ है, सपनों की राह और रोशनी बना हुआ है।
Parshuram Ki Pratiksha : Dinkar Granthmala
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Ramdhari Singh Dinkar
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आधुनिक युग के विद्रोही कवियों में रामधारी सिंह 'दिनकर' का महत्त्वपूर्ण स्थान है, और इसकी मिसाल है 'परशुराम की प्रतीक्षा'। यह पुस्तक एक खंडकाव्य है। इसकी रचना 1962 में भारत-चीन युद्ध के पश्चात् हुई थी। इसके ज़रिए राष्ट्रकवि का सन्देश है कि हमें नैतिक मूल्यों की रक्षा करते हुए अपने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा ख़ातिर सतत जागरूक रहना चाहिए। युद्धभूमि में शत्रु का विनाश करने के लिए हिंसा अनुचित नहीं है।
दिनकर परशुराम धर्म को भारत की जनता का धर्म मानते हैं। परशुराम को भारत की जागरूक जनता का प्रतीक मानते हैं। इसलिए पौराणिक पृष्ठभूमि में परशुराम के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते लिखते हैं—“लोहित में गिरकर जब परशुराम का कुठार पाप-मुक्त हो गया, तब उस कुठार से उन्होंने एक सौ वर्ष तक लड़ाइयाँ लड़ीं और समन्तपंचक में पाँच शोणित-हृद बनाकर उन्होंने पितरों का तर्पण किया। जब उनका प्रतिशोध शान्त हो गया, उन्होंने कोंकण के पास पहुँचकर अपना कुठार समुद्र में फेंक दिया और वे नवनिर्माण में प्रवृत्त हो गए। भारत का वह भाग, जो अब कोंकण और केरल कहलाता है, भगवान् परशुराम का ही बसाया हुआ है। लोहित भारतवर्ष का बड़ा ही पवित्र भाग है। पुराकाल में वहाँ परशुराम का पापमोचन हुआ था। आज एक बार फिर लोहित में ही भारतवर्ष का पाप छूटा है। इसीलिए, भविष्य मुझे आशापूर्ण दिखाई देता है—
ताण्डवी तेज फिर से हुंकार उठा है,
लोहित में था जो गिरा, कुठार उठा है।”
'परशुराम की प्रतीक्षा' राष्ट्रकवि दिनकर की ऐसी कृति है जो भारत-चीन सीमा पर युद्ध के हालात बनते ही समीचीन हो जाती है। हर युग में नई उम्मीद और नए प्रतिरोध के साथ पढ़ी जानेवाली एक काजलयी कृति।
Kavishree
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Ramdhari Singh Dinkar
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श्री' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी कविताओं का संग्रह है। कविताओं में प्रखर राष्ट्रवाद, प्रकृति के प्रति उत्कट प्रेम एवं मानव-कल्याण-कामना की मंगल-भावना के दर्शन होते हैं। 'कविश्री' में संगृहीत हैं दिनकर जी की 'हिमालय के प्रति', 'प्रभाती', 'व्याल विजय' एवं 'नया मनुष्य' जैसी प्रसिद्ध प्रदीर्घ कविताएँ, जो हिन्दी काव्य-साहित्य की अमूल्य निधि हैं। दिनकर का काव्य-व्यक्तित्व जिस दौर में निर्मित हुआ, वह राजसत्ता और शोषण के विरुद्ध हर मोर्चे पर संघर्ष का दौर था। इसलिए 'कविश्री' में संकलित रचनाओं को पढ़ना भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में साहित्य के योगदान से भी परिचित होना है। अपने ऐतिहासिक महत्त्व के कारण पाठकों के लिए एक संग्रहणीय और अविस्मरणीय संग्रह।
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