Pratinidhi kavitayein : Ramdarash Mishra
(0)
Author:
Om Nischal, Ramdarash MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
199
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लगभग एक शताब्दी वय के हिन्दी विश्व के श्रेष्ठ कवि रामदरश मिश्र का कवि व्यक्तित्व प्रारम्भ से ही अभिभूत करने वाला और हिन्दी की चिन्तन प्रक्रिया और कविता के सौन्दर्यबोध को सींचने वाला रहा है। उन्हें मिले लगभग सभी बड़े पुरस्कार भी इस बात की गवाही देते हैं। कविता की बुनियादी ज़मीन गीत, कवित्त, मुक्तक में निष्णात रामदरश जी ने समय रहते नई कविता के स्थापत्य की कमान हाथ में ले ली थी और धीरे-धीरे वे अभिव्यक्ति और अन्दाजे बयां के उस शिखर पर पहुँच गए जहाँ अनुभूति और संवेदना का रसायन गाढ़ा हो उठता है। उनकी कविता में सारे मौसम अपने सौन्दर्य और संघर्ष के साथ सामने आते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि ऋतुओं पर लगभग सबसे ज्यादा कविताएँ उन्होंने लिखी हैं। ‘धरती छंदमयी होगी’ का स्वप्न देखने वाला यह कवि शताब्दी-भर के रचनात्मक समय को अपनी छाती से लगाए जैसे उसकी धड़कनों को बहुत पास से सुन रहा हो। ‘पथ के गीत’ से लेकर ‘समवेत’ तक की उनकी कविता यात्रा कविता की ऊर्ध्वमुखी यात्रा है। उसमें हमारी कवि परम्परा के साथ-साथ पिछली शताब्दी और इस सदी का समय प्रतिबिम्बित होता दिखता है। उनकी कविताओं में विश्वबन्धुता है, विराट का स्पन्दन है, जीवन के एक-एक पल को जीने की चाहत है। उनकी खूबी है कि वे एक कौंध, एक पुलक-भर से कविता रच लेते हैं और यही कौंध, पुलक, सुख, विषाद, विडम्बना और प्रश्नाकुलता उनकी कविताओं के क्रोमोज़ोम में अनुस्यूत है। यही वह कवि का सतत गंवई गार्हस्थ्य है जो यह कहने में गर्व का अनुभव करता है कि ‘हम पूरब से आए हैं’। सच कहें तो इन कविताओं में उनका समूचा कवि व्यक्तित्व समाहित है।<br>—ओम निश्चल
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लगभग एक शताब्दी वय के हिन्दी विश्व के श्रेष्ठ कवि रामदरश मिश्र का कवि व्यक्तित्व प्रारम्भ से ही अभिभूत करने वाला और हिन्दी की चिन्तन प्रक्रिया और कविता के सौन्दर्यबोध को सींचने वाला रहा है। उन्हें मिले लगभग सभी बड़े पुरस्कार भी इस बात की गवाही देते हैं। कविता की बुनियादी ज़मीन गीत, कवित्त, मुक्तक में निष्णात रामदरश जी ने समय रहते नई कविता के स्थापत्य की कमान हाथ में ले ली थी और धीरे-धीरे वे अभिव्यक्ति और अन्दाजे बयां के उस शिखर पर पहुँच गए जहाँ अनुभूति और संवेदना का रसायन गाढ़ा हो उठता है। उनकी कविता में सारे मौसम अपने सौन्दर्य और संघर्ष के साथ सामने आते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि ऋतुओं पर लगभग सबसे ज्यादा कविताएँ उन्होंने लिखी हैं। ‘धरती छंदमयी होगी’ का स्वप्न देखने वाला यह कवि शताब्दी-भर के रचनात्मक समय को अपनी छाती से लगाए जैसे उसकी धड़कनों को बहुत पास से सुन रहा हो। ‘पथ के गीत’ से लेकर ‘समवेत’ तक की उनकी कविता यात्रा कविता की ऊर्ध्वमुखी यात्रा है। उसमें हमारी कवि परम्परा के साथ-साथ पिछली शताब्दी और इस सदी का समय प्रतिबिम्बित होता दिखता है। उनकी कविताओं में विश्वबन्धुता है, विराट का स्पन्दन है, जीवन के एक-एक पल को जीने की चाहत है। उनकी खूबी है कि वे एक कौंध, एक पुलक-भर से कविता रच लेते हैं और यही कौंध, पुलक, सुख, विषाद, विडम्बना और प्रश्नाकुलता उनकी कविताओं के क्रोमोज़ोम में अनुस्यूत है। यही वह कवि का सतत गंवई गार्हस्थ्य है जो यह कहने में गर्व का अनुभव करता है कि ‘हम पूरब से आए हैं’। सच कहें तो इन कविताओं में उनका समूचा कवि व्यक्तित्व समाहित है।<br>—ओम निश्चल
Book Details
-
ISBN9789394902428
-
Pages150
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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उनके रचना-संसार पर समय-समय पर लिखा जाता रहा है। अनेक शोधार्थियों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर कार्य किया है। कहना न होगा कि कुँवर नारायण का कृतित्व बहुवस्तुस्पर्शी है। वर्ष 2002 से पहले तक उनके व्यक्तित्व एवं कृतियों पर लिखे महत्त्वपूर्ण लेख ‘उपस्थिति’ नामक संचयन में समाविष्ट हैं। उसके पश्चात् लिखे निबन्धों का यह संकलन दो खंडों में है : ‘अन्वय’ और ‘अन्विति’। ‘अन्विति’ उनकी कृतियों को केन्द्र में रखकर लिखे आलोचनात्मक निबन्धों का चयन है। इसमें हाल की कुछ प्रकाशित कृतियों को छोड़कर बाक़ी कृतियों पर लिखे लेखों को शामिल किया गया है जो उपस्थिति में सम्मिलित नहीं हैं। अधिकांश लेख 2015 तक के हैं जब कुँवर नारायण का प्रबन्ध-काव्य ‘कुमारजीव’ प्रकाशित हुआ।
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अनामिका के नए संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त—थेरी गाथा : 2014’ को पूरा पढ़ जाने के बाद मेरे मन पर जो पहला प्रभाव पड़ा, वो यह कि यह पूरी काव्य-कृति एक लम्बी कविता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे दृश्य, प्रसंग और थेरियों के रूपक में लिपटी हुई हमारे समय की सामान्य स्त्रियाँ आती हैं। संग्रह के नाम में 2014 का जो तिथि-संकेत दिया गया है, मुझे लगता है कि पूरे संग्रह का बलाघात थेरी गाथा के बजाय इस समय-सन्दर्भ पर ही है। संग्रह के शुरू में एक छोटी-सी भूमिका है, जिसे कविताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए। बुद्ध अनेक कविताओं के केन्द्र में हैं, जो बार-बार प्रश्नांकित भी होते हैं और बेशक एक रोशनी के रूप में स्वीकार्य भी। इस नए संकलन में अनेक उद्धरणीय काव्यांश या पंक्तियाँ मिल सकती हैं, जो पाठक के मन में टिकी रह जाती हैं।
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एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Hazaar Daastaan-e-Ishq
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Sanjiv Saraf
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The exquisite journey of love passes through numerous twists and turns, bringing different experiences to each individual. In Urdu poetry, poets have penned down these diverse experiences in rhyme with a sheer eloquence that aptly expresses the exceptional bond between the lover and the beloved. Meer, Ghalib, Momin, Dagh, Faiz, and hundreds of Urdu poets have given voice to the emotions of lovers going through stages such as longing, interplay, loving, possessiveness, rivalry, separation, breaking up, and frenzy. This eloquence makes every reader share this thought, as was inimitably expressed by Mirza Ghalib: Dekhna taqreer ki lazzat ki jo us ne kahaa Maine ye jaanaa ki goyaa ye bhi mere dil men hai ‘Love Longing Loss in Urdu Poetry’ narrates the enchanting tale of this journey that includes the subtle nuances and the beauty of Urdu poetry with all its grace. Also, this book is available in Hindi and Urdu languages with the title "Hazaar Daastaan-e-Ishq".
Hari Patang Par Hara Patanga
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Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
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Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है।
काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है।
अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
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