Awaz-Beawaz
Author:
Ashok Kumar PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
‘आवाज़-बेआवाज़’ की कविताएँ मानवीय और राजनीतिक सरोकारों का एक विशाल वितान रचती हैं। ये एक ऐसे हस्सास मन का प्रतिबिम्ब हैं, जिसकी चिन्ताएँ अपने अध्ययन-कक्ष से लेकर संसार के हर उस कोने तक व्यापती हैं जहाँ मनुष्यता संकट में है, जहाँ सर्वसत्तावादी राजनीति मानव-जीवन को अपना चारा बनाने को उद्यत है।
ये एक चिन्तनशील और सजग मस्तिष्क के वे हार्दिक उद्गार हैं जो केवल कविता में ही व्यक्त हो सकते थे। कश्मीर से लेकर फ़लस्तीन और प्रेम की सान्द्र अनुभूतियों से लेकर व्यक्ति के तीक्ष्ण व्यर्थताबोध तक ये कविताएँ अपने सघन शिल्प में एक लम्बी सड़क बनाती हैं जिस पर आप वर्तमान समय की वास्तविकताओं के एक बहुरूपदर्शी सफ़र पर निकलते हैं।
राजनीति की मौजूदा भंगिमाओं को ये कविताएँ अकसर ही अचूक ढंग से निडरतापूर्वक रेखांकित करती हैं, और उनके फलितार्थों के प्रति हमें आगाह करती हैं। ‘आवाज़ें पहले से रिकॉर्ड हैं’—यह एक वाक्य ही हमारे इस काल की सर्वाधिक भयावह परिस्थिति को समझने के लिए पर्याप्त है, जहाँ वे तमाम चीज़ें जिनसे जनतंत्र को उम्मीद थी, भीतर से ख़ाली हो गई प्रतीत होती हैं।
इन कविताओं के असंख्य बिम्ब और उनका आन्तरिक तनाव देर तक आपके साथ रहता है।
ISBN: 9789360860844
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: भारत के प्रसिद्ध विद्वान और इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल की यह केवल संजीवनी व्याख्या टीका ही नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति के विकास का इतिहास भी है। अनेक शब्दों की इतनी मार्मिक व्याख्या की गई है कि उनके द्वारा नए सांस्कृतिक सन्दर्भ और प्रसंग व्याख्यायित होते हैं। किसी भी मध्यकालीन ग्रन्थ की ऐसी टीका हिन्दी में नहीं है। इस पुस्तक के द्वारा न केवल जायसी को बल्कि पूरे मध्यकालीन सूफ़ी काव्य को गहराई से समझा जा सकता है।
Pata Hi Nahin Chalta
- Author Name:
Priyadarshi Thakur 'Khayal'
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Description:
इस दौर में जब कविता पर अमूर्तन के आरोप लग रहे हों प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ कविता की बाहरी सरहद पर हमला कर अमूर्त को मूर्तित करने के दुष्कर से काम में लगे हैं। पहले तो उन्होंने आलोचकों के उस बने-बनाए तर्क को ध्वस्त किया है कि अब कविता को छन्द की ज़रूरत नहीं और दूसरे, विजातीय समझे जानेवाले रूपाकारों को स्वीकृति देकर ग़ज़ल और आज़ाद नज़्मों को हिन्दी की मुख्यधारा के समानान्तर ला खड़ा किया है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों का प्रस्तुत संचयन कम-से-कम यह दिलासा तो देता है कि भारी तादाद में लिखी जा रहीं ग़ज़लें हिन्दी की ही हैं। खाँटी हिन्दी की। इसलिए भी कि उर्दू और हिन्दी में अगर कोई फ़र्क़ है तो वह इतना ही है कि उन्हें दो लिपियों में लिखा जा सकता है। और उनकी ख़ूबी यह है कि वे जब चाहे अतीत के ख़ज़ाने से शब्द ले सकनेवाली आधुनिक भाषाएँ हैं जिनके पास मिली-जुली विरासत के रूप में दूसरी ज़बानों की सम्पदा भी है।
कविता का सामान्य गुण है कि आप उन्हें किसी भी प्रयोजन के लिए दुहरा सकते हैं। और जहाँ तक असामान्य गुणों की बात है तो कविता जहाँ एक ओर मर्मभेदी है, वहीं दूसरी तरफ़ वह उत्सवधर्मी प्रमोदन और प्रबोधन से भी जुड़ी है। ग़रज़ यह कि कविता भितरघात भी करती है और वह उदार सीमान्तों का निर्माण भी करती है। प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ अपनी ग़ज़लों और नज़्मों से एक अभूतपूर्व प्रयोग यह भी कर रहे हैं कि वे सादा से सादा शब्दावली द्वारा गहन, अगोचर अनुभवों को वाणी देने के लिए आसान भाषा का अन्वेषण करने में जुटे हैं। और यही एक बड़ा कारण है कि वे मुक्त छन्द से ग़ज़ल तक में प्रयोगरत हैं।
‘पता ही नहीं चलता’ का मूल सरोकार सांस्कृतिक विराटता को शब्दांकित करना तो है ही, गहरे अर्थ में उदारता, स्वतंत्रता और स्वाधीनचेता असहमति की पक्षधरता को रेखांकित करना भी है।
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