Shrikant Verma Sanchayita
(0)
Author:
Udayan Vajpeyi, Udyan VajpeyiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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श्रीकान्त वर्मा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी के सम्भवत: सबसे ऊर्जस्वित लेखकों में हैं। वे मूर्धन्य कवि हैं, सटीक कहानीकार हैं, और अनोखे उपन्यासकार। वे उन विरले कवियों में हैं जिन्होंने अपने भीतर से होकर बहती पिघलते लोहे-सी काव्य-धारा को पूरे धीरज से सहा और उसे बिल्कुल नए काव्य-विन्यासों में ढाला। यह भी सच है कि कई बार इस पिघले लोहे के-से काव्य-आवेग ने उन्हें धीरज बरत सकने का अवकाश नहीं दिया या शायद अपने घुमड़ते काव्य-आवेग के आगे कवि का धीरज निष्फल हो गया लेकिन तब यह काव्य-आवेग या काव्य-संवेदन उन्हीं की कविताओं के सुघड़ विन्यासों में आसपास, यहाँ-वहाँ चिनगारियों की तरह बिखर गया। शायद इसीलिए उनकी कविताएँ उनके काव्य-संयम और काव्य-असंयम का विलक्षण साक्ष्य और फलन हैं। उनके धीरज और उनकी हड़बड़ी दोनों का पारदर्शी अंकन। ऊर्जस्वित कवि होने के साथ-साथ श्रीकान्त वर्मा पक्के गद्यकार भी हैं। उनका गद्य गद्य की सारी शर्तों पर खरा उतरता गद्य है। उसमें वाक्य-सौन्दर्य है पर ‘कवितायी’ नहीं, उसमें विवरण हैं पर फिजूल ढीलापन नहीं। शायद इतना कसा हुआ गद्य बहुत कम लेखकों ने लिखा होगा। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त और निबन्ध लिखे हैं। श्रीकान्त वर्मा शायद हिन्दी में कविता के सर्वश्रेष्ठ अनुवादक भी रहे हैं। उन्होंने कई रूसी, जर्मन, जापानी, फ्रांसीसी, हंगारी और मैक्सिकन कविताओं के अनुवाद किए। इस संकलन में उनमें से कुछ अनुवादों को भी शामिल किया जा रहा है।
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About the Book
श्रीकान्त वर्मा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी के सम्भवत: सबसे ऊर्जस्वित लेखकों में हैं। वे मूर्धन्य कवि हैं, सटीक कहानीकार हैं, और अनोखे उपन्यासकार। वे उन विरले कवियों में हैं जिन्होंने अपने भीतर से होकर बहती पिघलते लोहे-सी काव्य-धारा को पूरे धीरज से सहा और उसे बिल्कुल नए काव्य-विन्यासों में ढाला। यह भी सच है कि कई बार इस पिघले लोहे के-से काव्य-आवेग ने उन्हें धीरज बरत सकने का अवकाश नहीं दिया या शायद अपने घुमड़ते काव्य-आवेग के आगे कवि का धीरज निष्फल हो गया लेकिन तब यह काव्य-आवेग या काव्य-संवेदन उन्हीं की कविताओं के सुघड़ विन्यासों में आसपास, यहाँ-वहाँ चिनगारियों की तरह बिखर गया। शायद इसीलिए उनकी कविताएँ उनके काव्य-संयम और काव्य-असंयम का विलक्षण साक्ष्य और फलन हैं। उनके धीरज और उनकी हड़बड़ी दोनों का पारदर्शी अंकन।
ऊर्जस्वित कवि होने के साथ-साथ श्रीकान्त वर्मा पक्के गद्यकार भी हैं। उनका गद्य गद्य की सारी शर्तों पर खरा उतरता गद्य है। उसमें वाक्य-सौन्दर्य है पर ‘कवितायी’ नहीं, उसमें विवरण हैं पर फिजूल ढीलापन नहीं। शायद इतना कसा हुआ गद्य बहुत कम लेखकों ने लिखा होगा। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त और निबन्ध लिखे हैं।
श्रीकान्त वर्मा शायद हिन्दी में कविता के सर्वश्रेष्ठ अनुवादक भी रहे हैं। उन्होंने कई रूसी, जर्मन, जापानी, फ्रांसीसी, हंगारी और मैक्सिकन कविताओं के अनुवाद किए। इस संकलन में उनमें से कुछ अनुवादों को भी शामिल किया जा रहा है।
Book Details
-
ISBN9788126706624
-
Pages399
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Ullanghan
- Author Name:
Rajesh Joshi
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उल्लंघन संग्रह में कवि हुक्म-उदूली की अपनी प्राकृतिक इच्छा से आरम्भ करते हुए मौजूदा दौर की उन विवशताओं से अपनी असहमति और विरोध जताता है, जिन्हें सत्ता हमारी दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा बनाने पर आमादा है। एक ऐसे समय में ‘जिसमें न स्मृतियाँ बची हैं/न स्वप्न और जहाँ लोकतंत्र एक प्रहसन में बदल रहा है/एक विदूषक किसी तानाशाह की मिमिक्री कर रहा है’—ये कविताएँ हमें निर्प्रश्न अनुकरणीयता के मायाजाल से निकलने का रास्ता भी देती हैं, और तर्क भी। कवि देख पा रहा है कि ‘सिकुड़ते हुए इस जनतंत्र में सिर्फ़ सन्देह बचा है’, ताक़त के शिखरों पर बैठे लोग नागरिकों को शक की निगाह से देखते हैं, तरह-तरह के हुक्मों से अपने को मापते हैं; कहते हैं कि साबित करो, तुम जहाँ हो वहाँ होने के लिए कितने वैध हो, और तब कविता जवाब देती है–‘ओ हुक्मरानो/मैं स्वर्ग को भूलकर ही आया हूँ इस धरती पर/तुम अगर मुझे नागरिक मानने से इनकार करते हो/तो मैं भी इनकार करता हूँ /इनकार करता हूँ तुम्हें सरकार मानने से!’ लगातार गहरे होते राजनीतिक-सामाजिक घटाटोप के विरुद्ध पिछले चार-पाँच सालों में जो स्वर मुखर रहते आए हैं, राजेश जोशी उनमें सबसे आगे की पाँत में रहे हैं। इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ इसी दौर में लिखी गई हैं। कुछ कविताएँ महामारी के जारी दौर को भी सम्बोधित हैं जिसने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के सरकारी उद्यम पर जैसे एक औपचारिक मुहर ही लगा दी–‘सारी सड़कों पर पसरा है सन्नाटा/बन्द हैं सारे घरों के दरवाज़े/एक भयानक पागलपन पल रहा है दरवाज़ों के पीछे/दीवार फोड़कर निकल आएगा जो/किसी भी समय बाहर/और फैल जाएगा सारी सड़कों पर!’
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