Uttar Paigamber
Author:
Arun DevPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 128
₹
160
Available
v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main">कौतुकपूर्ण सृजन का अतिरेक आपको उन्मत्त कर सकता है, लेकिन सामूहिक चेतना में जो कुछ भी छिपा रहता है, उसे केवल अनछुए सच का इलाक़ा ही बाहर निकालता है। यह केवल सृजन का विवेक ही है जो इस अनछुए को चमकाता है। सुप्रसिद्ध अवधी कवि मलिक मुहम्मद जायसी पर लिखी अरुण देव की कविता इसी तरह आपको बाँध लेती है।
अवधी कविता के इस महाचितेरे कवि जायसी की स्मृतियों को कवि नाना अर्थ छवियों से टहोकता चलता है और जायसी की काव्यात्मक शख़्सियत से जुड़े अनुत्तरित सवालों की तरफ़ हमारा ध्यान खींचता है।
अपनी कविताओं—‘चाहत’, ‘रफ़ी के लिए’ और ‘विज्ञापन और औरत’—में अरुण देव समकालीन जीवन के तमाम घुमाव-पेचोख़म को एक साथ पकड़ने की कोशिश करते हैं। नरेटर चिर-परिचित यथार्थ से जूझते हुए उससे परे जाना चाहता है जिसे रोज़ बदलते सामाजिक मूल्यों ने जकड़ रखा है।
अरुण देव उबाऊ क़िस्म के लम्बे विवरणों से बचते हैं और उस संवेदनशीलता का ध्रुवीकरण करते चलते हैं जो दमघोंटू नहीं है। कविताओं में कवि विषयासक्ति की चकाचौंध और निरी भावुकता से बचता चलता है। वह हाज़िर जवाब है। स्थिर उबाऊ टेकों के लिए उसके यहाँ कोई जगह नहीं। उसकी कविताएँ चाक्षुष बोध की कविताएँ हैं। विश्लेषी बोध की नहीं। ये कविताएँ हमें यथार्थ से रूबरू कराती चलती हैं और इनमें किसी भी तरह की भावोत्तेजना का घोल नहीं। उनकी तीखी व्यंजनाएँ आत्म-दया में तिरोहित नहीं होतीं और उनकी बहुत–सी कविताएँ प्रेम-बोध की कविताएँ हैं जिनमें शनै:-शनै: प्रेम का स्वर धीमा होता जाता है और मूलभाव उभरकर सामने आता है।
अरुण देव की कविताएँ मानव मन की थाह लेती हैं और अपनी व्यंजनाओं में जीवन की विषमताओं को पचाती चलती हैं। उनके लिए कविता ही एकमात्र साधन है जो हमें मुक्त करता है।
—शफी किदवई, द हिन्दू</
ISBN: 9789389598032
Pages: 152
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
विश्वनाथप्रसाद तिवारी के वर्षों के सक्रिय कवि-कर्म के सफ़र को देखते हुए आज यह बात कही जा सकती है कि अपने समकालीनों के बीच रहते हुए भी उन्होंने अपने समकालीनों का अतिक्रमण किया। वे अपनी पीढ़ी के उन कवियों में शुमार हैं जिनके मितकथन और मितभाषा के प्रयोग सघन और ताक़तवर हैं, जो आज उनकी काव्योपलब्धि के रूप में रेखांकित किए जा सकते हैं।
विश्वनाथप्रसाद तिवारी के कवि-कर्म के सरोकारों की गहरी छानबीन की जाए तो उसकी मुख्य थीम में तीन प्रस्थान-बिन्दु चिह्नित होते हैं—स्वाधीनता, स्त्री-मुक्ति और मृत्यु-बोध। ग़ौर से देखें तो उनकी समूची काव्य-यात्रा इन तीन प्रस्थान-बिन्दुओं को लेकर गहन अनुसन्धान करती हैं। इन तीनों जीवन-दृष्टियों का बोध वे भारतीय अन्त:करण से करते हैं। स्त्री-अस्मिता की खोज उनके कवि-कर्म के बुनियादी सरोकारों में सबसे अहम है। उनकी कविता के घर में स्त्री के लिए जगह ही जगह है। उनकी दृष्टि में स्त्री के जितने विविध रूप हैं, वे सब सृष्टि के सृजनसंसार हैं।
उनके कवि की समूची संरचना देशज और स्थानीयता के भाव-बोध के साथ रची-बसी है, काव्यानुभूति से लेकर काव्य की बनावट तक। भोजपुरी अंचल में पले-पुसे और सयाने हुए विश्वनाथ के मनोलोक की पूरी संरचना भोजपुरी समाज के देशज आदमी की है। उनकी कविताओं में इस समाज का आदमी प्राय: विपत्ति में लाठी की तरह दन्न से तनकर निकल आता है।
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