Sampoorna Kavitayein : Vijaydev Narayan Sahi
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विजयदेव नारायण साही निरपेक्ष और आत्मस्थ ब्रह्माण्ड में मनुष्य की लघुता को भली भांति देख सकते हैं, और काल के उस अग्निकमल को भी जिसमें सब भस्म हो जाता है। इस नश्वरता में अर्थ की सतत तलाश उनकी कविता के केन्द्र में है, चाहे वह अर्थ अपनी तलाश को पहचानने में ही निहित हो, सृष्टि के वास्तविक स्वरुप को देखने में हो, वर्तमान क्षण के सौन्दर्य को जी लेने में हो अथवा मूल्यों को परिभाषित करने तथा उनकी चौकीदारी करने में हो। इन सभी को वे सत्य के रूप में देखते हैं, और सत्य को पहचानने का यह सधा हुआ और सघन बौद्धिक प्रयास उनकी कविता को विलक्षण बनाता है। आन्तरिक और बाह्य लय उनकी कविता की विशेषता है जो गीत और ग़ज़ल से होते हुए काव्यात्मक एकालाप में भी व्यक्त होती है, और विराट शब्दावली से सटीक शब्द चुन लेने की उनकी क्षमता सूक्ष्म अभिव्यंजनाओं को गुंजरित कर सघनता को पुष्ट करती है। कहीं बहुत गहरे स्तर पर साही एक नागरिक हैं। मूल्यों की परिभाषा उनके लिए सामाजिक सन्दर्भ रखती है और बहुत हद तक उनकी कविता भी एक सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन करती है। उनकी कविताओं की इस समग्र प्रस्तुति में कविताएँ लेखन-क्रम में व्यवस्थित हैं एवं पूर्व में अप्रकाशित कुछ कविताएँ भी इसमें शामिल हैं। पुस्तक में शामिल विस्तृत सम्पादकीय और उसके अलावा कुछ अन्य आलोचनात्मक लेख व परिशिष्ट में संकलित उनकी पुस्तकों से जुड़ी सामग्री इस संचयन को एक सम्पूर्ण अध्ययन बना देती है।
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विजयदेव नारायण साही निरपेक्ष और आत्मस्थ ब्रह्माण्ड में मनुष्य की लघुता को भली भांति देख सकते हैं, और काल के उस अग्निकमल को भी जिसमें सब भस्म हो जाता है। इस नश्वरता में अर्थ की सतत तलाश उनकी कविता के केन्द्र में है, चाहे वह अर्थ अपनी तलाश को पहचानने में ही निहित हो, सृष्टि के वास्तविक स्वरुप को देखने में हो, वर्तमान क्षण के सौन्दर्य को जी लेने में हो अथवा मूल्यों को परिभाषित करने तथा उनकी चौकीदारी करने में हो। इन सभी को वे सत्य के रूप में देखते हैं, और सत्य को पहचानने का यह सधा हुआ और सघन बौद्धिक प्रयास उनकी कविता को विलक्षण बनाता है। आन्तरिक और बाह्य लय उनकी कविता की विशेषता है जो गीत और ग़ज़ल से होते हुए काव्यात्मक एकालाप में भी व्यक्त होती है, और विराट शब्दावली से सटीक शब्द चुन लेने की उनकी क्षमता सूक्ष्म अभिव्यंजनाओं को गुंजरित कर सघनता को पुष्ट करती है।
कहीं बहुत गहरे स्तर पर साही एक नागरिक हैं। मूल्यों की परिभाषा उनके लिए सामाजिक सन्दर्भ रखती है और बहुत हद तक उनकी कविता भी एक सामाजिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन करती है। उनकी कविताओं की इस समग्र प्रस्तुति में कविताएँ लेखन-क्रम में व्यवस्थित हैं एवं पूर्व में अप्रकाशित कुछ कविताएँ भी इसमें शामिल हैं। पुस्तक में शामिल विस्तृत सम्पादकीय और उसके अलावा कुछ अन्य आलोचनात्मक लेख व परिशिष्ट में संकलित उनकी पुस्तकों से जुड़ी सामग्री इस संचयन को एक सम्पूर्ण अध्ययन बना देती है।
Book Details
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ISBN9789347043321
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Pages616
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Avg Reading Time21 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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विजयशंकर चतुर्वेदी ऐसे कवि हैं जो अपने को आज के सूर्योदय के साथ-साथ उस सुबह से भी जोड़कर देखते हैं जो निर्माणाधीन सृष्टि की पहली सुबह रही होगी। इतने विराट समय में अपनी निरंतरता को देखना कवि की अद्भुत विशेषता है, जो ध्यान खींचे बिना नहीं रहती। प्राकृतिक विपत्तियों से लड़ते, सीखते मनुष्य की कूवत कैसे-कैसे अपने को अभिव्यक्ति के लायक तरासती रही है और कैसे उन सारे द्वंद्वों से मनुष्य ने एक निर्द्वंद्व सभ्यता के लिए अपने को संघर्षरत रखा है; इस तरह के तमाम संधि-समयों से गुजरते हुए कैसे वह मनुष्य आज तक के समय में पहुंचा है—कवि अपनी उस युद्धगाथा को एक बार फिर से कहने की बेचैनी से भरा हुआ दिखता है।
इस सांस्कृतिक यात्रा और यातना में मनुष्य ने कितने असुंदर के बदले कितना सुंदर गंवाया है—उस भूल-चूक भरे अंधकार को कवि ने अपनी अभिव्यक्ति के विस्फोटक उजालों से भर दिया है। सामाजिक दिक् और काल के बीच इस ब्रह्मांड के शंख को सुनने की शक्ति हमें कवि की बिम्बपूर्ण भाषा से मिलती है। कुछ लोगों ने इस पृथ्वी को एक परिवार की जगह सिर्फ़ बाज़ार और कार्यालय की मेज़ बनाकर रख दिया है। कवि इस पृथ्वी पर एक मनुष्योचित सूर्योदय की प्रतीक्षा में है। अपनी सुंदर, प्यारी और वैचारिक पृथ्वी को कवि रसातल में जाने से रोकना चाहता है। यही चिंता और संघर्ष इन कविताओं के केंद्र में है।
विजयशंकर की कविता में माइथोलॉजी और टेक्नॉलॉजी, दोनों का अंगीकार दिखता है। यह बात तब और साफ हो जाती है जब कवि कहता है कि 'शोकाकुल परिजन ले जायें तो ले जायें, मैं जलूंगा नहीं।' पर विज्ञापन का दंश कवि की चेतना का पीछा वहां भी नहीं छोड़ता।
स्त्री के तीन रूप विजय की कविताओं में अक्सर आते हैं—बेटी, स्त्री और मां। स्त्री के तीनों रूप इन कविताओं में ख़तरों से घिरे हुए दिखते हैं।
विजयशंकर को मैं उनके पहले कविता-संग्रह के प्रकाशन के अवसर पर हार्दिक बधाई देता हूं क्योंकि उनकी इन कविताओं को देखकर उनके विकास और बदलाव की प्रबल संभावनाएं अपनी ओर खींचती हैं। विजयशंकर अपने भीतर के संदेहशील कवि को निरंतर खोजते और तराशते जा रहे हैं इसलिए उनकी यात्रा निश्चय ही अर्थपूर्ण और लंबी होगी।
—लीलाधर जगूड़ी
Daste-Tahe-Sang
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: नज़्मों, ग़ज़लों, क़तआत और कुछ अन्य रचनाओं के इस संकलन में फ़ैज़ की बेहद मशहूर नज़्मों में से एक ‘आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो’ भी शामिल है। इस नज़्म को उन्होंने 1959 में लिखा था। लाहौर की गलियों से उन्हें मय ज़ंजीरों के घोड़ागाड़ी से क़िला लाहौर की टॉर्चर सेल ले जाया गया था। इस नज़्म के पीछे उनका वही अनुभव है। हर हाल में आज़ादी के शैदाई फ़ैज़ की यह नज़्म उनकी शख़्सियत और शायरी दोनों की ऊँचाई को बयान करती है। 1960 के दशक के शुरुआती सालों में प्रकाशित ‘दस्ते-तहे-संग’ में उस दौर में लिखी हुई अन्य नज़्में, ग़ज़लें और क़तआत भी संकलित हैं जिनमें से कुछ मास्को, बम्बई और लन्दन में भी लिखी गईं। कविताओं के अलावा इस संकलन का ख़ास आकर्षण फ़ैज़ की एक तक़रीर है जो उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय लेनिन शांति पुरस्कार ग्रहण करते हुए उर्दू में दी थी। ‘फ़ैज़... अज़ फ़ैज़’ शीर्षक से उन्हीं का लिखा हुआ एक और आलेख भी यहाँ आप पाएँगे जिसमें वे अपने शुरुआती दिनों के बारे में बताते हैं और उस दौरान लिखी गई कविताओं की पृष्ठभूमि से भी हमें अवगत कराते हैं।
Sahitya Sangam : Bharat-Vietanam
- Author Name:
Geetesh Sharma
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- Description: Sahitya Sangam : Bharat-Vietanam
Naye Subhashit
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
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Description:
सुभाषित संस्कृत काव्य-साहित्य की एक प्रचलित शैली है जिसमें रचित पदों में दृष्टि, सत्य, सौन्दर्य आदि का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। कम शब्दों में बात कहने की कला इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। राष्ट्रकवि दिनकर की इस पुस्तक में इसी शैली में रचे गए हिन्दी-पद शामिल हैं।
सुभाषित हमेशा वाक्-कौशल लिये होते हैं। इनमें अन्तर्निहित सन्देश ऐसी चतुराई से पद्य-बद्ध किए जाते हैं कि इन्हें याद भी किया जा सकता है और अपने व्यावहारिक जीवन में उपयोग भी किया जा सकता है। इस पुस्तक के सुभाषित विभिन्न विषयों से सम्बन्धित हैं और इनका कैनवस बहुत बड़ा है। ये अनुभव और अध्ययन के साँचे में ढले हुए सुभाषित हैं। इसलिए इनमें जो एक अलग छन्दात्मक रंग देखने को मिलता है, उसके प्रभाव में ग़ज़ब का आकर्षण और माधुर्य है। व्यंग्य-विनोद का पुट तो ख़ास है ही।
दिनकर ने अपने इन सुभाषितों में जिस काव्य-कौशल का परिचय दिया है, वह अपनी सम्प्रेषणीयता में एक मिसाल है। मिसाल इस मायने में भी कि आम पाठकों को ध्यान में रखकर भी ऐसे काव्य की रचना की जानी चाहिए। यही कारण है कि ये सुभाषित पढ़नेवाले को अपनी ही कहन का हिस्सा लगने लगते हैं और हृदयतल को छू वहीं ठहर जाते हैं।
इस पुस्तक में ऐसे कई सुभाषित हैं जो आज के उथल-पुथल-भरे समय में साठ साल पहले लिखे जाने के बाद भी प्रासंगिक हैं। इसलिए यह पुस्तक सिर्फ़ पठनीय ही नहीं, एक ज़रूरी पुस्तक भी है।
The Spiritual Poems of Rumi
- Author Name:
Rumi
- Book Type:

- Description: The Spiritual Poems of Rumi: A Special Collection of Spiritual Poems Discover the wisdom of Jalaluddin Muhammad Balkhi Rumi, the revered Persian mystic and Sufi master, in this beautifully illustrated edition. For over eight centuries, Rumi’s timeless poetry has captivated readers from all walks of life, offering profound insights into love, friendship, and spirituality. This carefully curated collection features – Brilliant translations that bring Rumi’s universal themes to life, inviting readers to embark on a spiritual journey toward self-discovery and a deeper connection to the world around them. With verses that transcend time and culture, Rumi’s words resonate with anyone seeking a greater understanding of the self and our collective oneness. In this exquisite edition, adorned with intricate, richly colored designs, reflecting the beauty and depth of Rumi’s words, this book is more than just a collection of poems—it is a cherished tool for self-reflection and spiritual growth. Whether you are new to Rumi’s work or a lifelong admirer, this series will serve as a meaningful companion on your journey of inner awakening.
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