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Nirankardev Sevak's poems are read by every Hindi-speaking child. He is one of the foremost voices in the Hindi-speaking belt. Nirankardev Sevak writes with an unparalleled simplicity, which is reflected in the following lines: अगर मगर दो भाई थे लड़ते खूब लड़ाई थे, अगर मगर से छोटा था, मगर अगर से खोटा था। or पैसा पास होता तो चार चने लाते, चार में से एक चना तोते को खिलाते It is rare to find a poet who has imagined such an individual. This collection of poems has 35 such poems. These wonderfully witty poems are accompanied by equally beautiful illustrations by Habib Ali. Readers will find his compositions, colour schemes, and detailing engaging. Age group 6-8 years
Read moreAbout the Book
Nirankardev Sevak's poems are read by every Hindi-speaking child. He is one of the foremost voices in the Hindi-speaking belt. Nirankardev Sevak writes with an unparalleled simplicity, which is reflected in the following lines:
अगर मगर दो भाई थे
लड़ते खूब लड़ाई थे,
अगर मगर से छोटा था,
मगर अगर से खोटा था।
or
पैसा पास होता तो चार चने लाते,
चार में से एक चना तोते को खिलाते
It is rare to find a poet who has imagined such an individual. This collection of poems has 35 such poems.
These wonderfully witty poems are accompanied by equally beautiful illustrations by Habib Ali. Readers will find his compositions, colour schemes, and detailing engaging.
Age group 6-8 years
Book Details
-
ISBN9789392873447
-
Pages60
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age0-11 yrs
-
Country of OriginIN
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- Description: ‘लिपिका’ रवीन्द्रनाथ ठाकुर का सबसे पहला गद्य-काव्य संग्रह है। किन्तु इसकी केवल एक को छोड़कर और कोई रचना कविता के तौर पर, यानी कविता आवृत्ति के छन्द के हिसाब से कभी प्रस्तुत नहीं की गई। ‘प्रश्न’ नाम की रचना को सन् 1911 में, पुस्तक प्रकाशित होने के तीन साल पहले, ‘भारती’ पत्रिका में कविता के छन्द के अनुसार छापा गया था। तो भी अगस्त, 1922 में पुस्तक प्रकाशित करने के समय कविगुरु ‘लिपिका’ को कविता-संग्रह के तौर पर छापने का साहस नहीं कर पाए। उन्होंने स्वयं ही लिखा है : ‘छापने के समय वाक्यों को पद्य की तरह तोड़ना नहीं हुआ—मैं तो मानता हूँ कि इसका कारण मेरी कायरता ही था।’ जो भी हो, ‘लिपिका’ वह कृति है जो मनुष्य के हृदय और बुद्धि की गहरी परतों को सर्वश्रेष्ठ कला के माध्यम से ऊपर उभारकर पाठक के सामने रख देती है। हर रूपक को पढ़कर एक दर्शन होता है और साथ-साथ अपने-आपको टटोलने की तरफ़ एक इशारा भी मिलता है। इस कृति की तरफ़ हिन्दी साहित्य जगत का ध्यान उतना नहीं गया है, जितना, मैं मानता हूँ, जाना चाहिए। मेरे लिए तो इसका अनुवाद करना आनन्द का एक बड़ा स्रोत रहा है। इसके कारण गुरुदेव का जो सामीप्य मिला, वह अपूर्व और बड़ा महत्त्वपूर्ण है। पाठकों के साथ इसमें भागीदारी करने का मौक़ा मिला है, उसके लिए कृतज्ञ हूँ। —भूमिका से
Nabhinal
- Author Name:
Ravindra Bharti
- Book Type:

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Description:
धीमी आँच पर धरती की मोटी सतह के भीतर हलके-हलके खदबदाता कुछ—फट पड़ने की तरफ़ एक-एक क़दम रखता हुआ। रवीन्द्र भारती की इन कविताओं की तुलना में अगर कोई बिम्ब गढ़ना चाहे तो वह कुछ ऐसा होगा। जो मन इन कविताओं में न्यस्त है। यह मुँडेर पर खड़ा चीख़ता हुआ मन नहीं है, यह गली के कोलाहल को परत-परत छील चुका और उसके परदे में छिपी तमाम मामूलियत को पहचान चुका मन है, और अब बदलाव को उतनी ही गहराई और सच्चाई से शुरू होते देखना चाहता है जितने गहरे उसकी बेचैनी खदबदा रही है।
बिलकुल हमारे आसपास के सन्दर्भों में एकदम सहज तत्त्वों और तथ्यों को वे तिनके की तरह उठाते हैं, एक दुर्लभ शान्त तन्मयता के साथ इशारों में ही उनको स्पर्श करते हैं, और हमें मालूम भी नहीं होता कि हमारी सोई संवेदना क़तई भिन्न-आलोक में जाग पड़ती है। उनकी कविताओं में प्रतीकों का एक अनन्त विस्तार है जिसकी पहुँच प्रकृति, अन्तरिक्ष और सृष्टि के आदि-अन्त तक है। ये कविताएँ हमें कभी बहुत ऊँचे से, लगभग किसी सिद्ध भिक्षु की तरह सम्बोधित करती हैं और कभी ठीक हमारे सामने आकर किसी संगी-साथी की तरह, ऐसा साथी जो हमसे ज़्यादा अक्लमन्द है लेकिन उस अक्लमन्दी को भी जिसने अपनी अर्जित अनाक्रमकता की पवित्र तहों में कहीं पिरो लिया है।
इस नज़रिए से वे अब भी एक ताज़ा कवि हैं, जो हमें हमारे अभ्यस्त पुरानेपन की ज़द से बाहर ले जाते हैं और चीज़ों को देखने की नई दृष्टि देते हैं जिससे हमारा आन्तरिक स्पेस रचनात्मक हो उठता है। कहना होगा कि हिन्दी कविता के कुछ तत्त्व जो बहुप्रतीक्षित थे, इन कविताओं में प्रकट होते हैं।
Dhoop Ke Liye Shukriya Ka Geet Tatha Anya Kavitayen
- Author Name:
Mithilesh Kumar Rai
- Book Type:

- Description: यथार्थ के अनुभवमूलक अन्वेषण और संवेदना के नए धरातल के कारण युवा कवि मिथिलेश कुमार राय के इस संग्रह की कविताएँ अलग से आकर्षित करती हैं। ग्रामीण जीवन के यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए अब तक जो फ्रेम हिंदी कविता में बने या बनाए गए, ये कविताएँ उन ढाँचों या चौकठों से बाहर की कविताएँ हैं। हिंदी में ग्रामीण जीवन के चित्रण को लेकर बनी बद्धमूल धारणाओं को और नई अवधारणाओं को विकसित करने का उपक्रम 1990 के बाद से निरंतर होता रहा है। फिर भी, मिथिलेश की कविताओं को पढ़ते हुए एक सुखद आश्चर्य होता है कि लोक जीवन के बारे में अब भी इतना कुछ, इतना नया, इतना अनूठा और इतना मार्मिक भी; कहने को बचा रह गया था। संग्रह की पहली ही कविता 'लक्ष्मी देवी उपले बढिय़ा थोपती है' की शुरुआती पंक्तियाँ द्रष्टव्य है— लछमी देवी उपले बढिय़ा थोपती हैंसम्मान के पर्चे पर इनका भी नाम चढऩा चाहिए महोदयलछमी देवी सानी इतना अच्छा लगाती हैंकि नाद जब ख़ाली हो जाता हैभैंसें तभी गर्दन ऊपर करती हैंसंग्रह में एक कविता है—'चावल लेने पड़ोसी के घर दौड़ती हैं स्त्रियाँ।' इस तरह की कविता में प्राय: अभाव का चित्रण होता है, लेकिन मिथिलेश लिखते हैं कि चावल, चीनी, चायपत्ती आदि माँगने जाने वाली स्त्रियाँ पड़ोसियों के साथ नेह-छोह के रिश्तों को जुगाने के लिए भी जाती हैं। ज़ाहिर है, कहन का यह नया ढंग यथार्थ की नई समझ के चलते ही आया है। निस्संदेह लोक अस्मिता की नई पहचान के कारण युवा कवि का यह संग्रह अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करने में सफल होगा। —मदन कश्यप
Neem Ke Patte
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
style="text-align: left; line-height: 12px;">ऊपर-ऊपर सब स्वाँग, कहीं कुछ नहीं सार,
केवल भाषण की लड़ी, तिरंगे का तोरण।
कुछ से कुछ होने को तो आज़ादी न मिली,
वह मिली ग़ुलामी की ही नक़ल बढ़ाने को।
'पहली वर्षगाँठ' कविता की ये पंक्तियाँ तत्कालीन सत्ता के प्रति जिस क्षोभ को व्यक्त करती हैं, उससे साफ़ पता चलता है कि एक कवि अपने जन, समाज से कितना जुड़ा हुआ है और वह अपनी रचनात्मक कसौटी पर किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं। यह आज़ादी जो ग़ुलामों की नस्ल बढ़ाने के लिए मिली है, इससे सावधान रहने की ज़रूरत है। देखें तो 'नीम के पत्ते' संग्रह में 1945 से 1953 के मध्य लिखी गई जो कविताएँ हैं, वे तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की उपज हैं; साथ ही दिनकर की जनहित के प्रति प्रतिबद्ध मानसिकता की साक्ष्य भी। अपने दौर के कटु यथार्थ से अवगत करानेवाला ओजस्वी कविताओं का यह संग्रह दिनकर के काव्य-प्रेमियों के साथ-साथ शोधार्थियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है, संग्रहणीय है।
Yun To Sab Kuchh Purvavat Hai
- Author Name:
Hema Dikshit
- Book Type:

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Description:
हेमा दीक्षित ने कठिन काव्य-क्षेत्र में एक सहमा विकम्पित-सा क़दम रखा है। लेकिन जल्दी ही यह साफ़ हो जाता है कि जीवन-संघर्ष में वह कविता को अपना सम्बल और लड़ने का आयुध बनाना चाहती हैं। यह आग्रह उन्हें काव्य व्यक्तित्व देता है और उनके उपक्रम को जेनुइन बनाता है। कविता की अपनी पहली किताब में वह अपने स्वत्व और उसे कह पाने वाली भाषा के आविष्कार में सन्नद्ध दिखती हैं। काव्यशास्त्र में कविता के प्रयोजन के बारे में प्रायः पूछा जाता है कि कविता लिखने का उद्देश्य क्या है? हेमा के लिए इसका उत्तर यह है कि वह अपनी विकलताओं को कविता में लाना चाहती हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जीवन की निजता को कविता में लाते हुए वह बहुत नैसर्गिक तरीक़े से निर्वैयक्तिकता को कविता में अनुस्यूत होने देती हैं। इस तरह निजी दुख सार्वजनीन दुख का प्रतिनिधि बन जाता है, अपना सन्ताप दुनिया का सन्ताप और न्याय को न पाने की निजी त्रासदी तमाम लोगों के न्याय को न पाने की अवस्थिति में बदल जाती है। इस तरह आत्म-सजगता के बावजूद आत्म-गरिमा का क्षरण नहीं होता जो आत्म-विस्तार में बदलकर किसी भी आत्म-ग्रस्तता का निषेध बन जाता है। उनकी कविता का पाठ किसी साँचे में ढले ऐस्थेटिक्स से न तो अनुकूलित है और न उसमें विद्रोह की कोई चौंकाने वाली अनावश्यक भंगिमा ही है। ऐसा भी नहीं कि उनकी सहज साहसिकता कविताओं में अव्यक्त रह जाए। अन्तर्वस्तु को न खोने का हठ यदि कविता का आत्मिक गुण माना जाता हो तो हेमा की कविता में उसकी ख़ला नहीं।
—देवी प्रसाद मिश्र
Samay Ke Pass Samay
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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Description:
प्रेम, मृत्यु और आसक्ति के कवि अशोक वाजपेयी ने इधर अपनी जिजीविषा का भूगोल एकबारगी बदल दिया है : वे कहेंगे बदला नहीं, सिर्फ़ उसमें शामिल कुछ ऐसे अहाते रौशन भर कर दिए हैं जो पहले भी थे पर लोगों को नज़र नहीं आते थे। अपनी निजता को छोड़े बिना उनकी कविता की दुनिया अब कुछ अधिक पारदर्शी और सार्वजनिक है। उसमें अब एक नए क़िस्म की बेचैनी और प्रश्नाकुलता विन्यस्त हो रही है।
समय, इतिहास, सच्चाई आदि को लेकर बीसवीं शताब्दी के अन्त में जो दृश्य हाशिये पर से दीखता है, उसे अशोक वाजपेयी अपनी कविता के केन्द्र में ले आए हैं। जुड़ाव-उलझाव के कुछ बिलकुल अछूते प्रसंग उनकी पहली लम्बी कविता में कुम्हार, लुहार, बढ़ई, मछुआरा, कबाड़ी और कुंजड़े जैसे चरित्रों के मर्मकथनों से अपनी पूरी ऐन्द्रियता और चारित्रिकता के साथ प्रगट हुए हैं। उनका पुराना पारिवारिक सरोकार अपने पोते के लिए लिखी गई दो कविताओं में दृष्टि और अनुभव के अनूठे रसायन में चरितार्थ होता है।
एक बार फिर अशोक वाजपेयी की आवाज़ नए प्रश्न पूछती, नई बेचैनी व्यक्त करती और कविता को वहाँ ले जाने की कोशिश करती है जहाँ वह अक्सर नहीं जाती है। अब उनका काव्यदृश्य सयानी समझ और उदासी से, सयानी आत्मालोचना से आलोकित है, उसमें किसी तरह अपसरण नहीं है—कवि अपनी दुनिया में अपनी सारी अपर्याप्तताओं और निष्ठा के साथ शामिल है। कविता उसके इस अटूट उलझाव का साक्ष्य है।
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