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इस संग्रह में एक वरदान माँगा गया है—‘ज़िन्दगी का रमणीय सतरंगी बुलबुला व्यर्थ न हो, कि दरख़्तों से झाँकता रोशन सूर्य अस्त न हो, विनाश तत्त्व के झपट्टे में भी भूमि की उग्रगन्धी धूल गमकती रहे और जीने का समृद्ध कबाड़ पूरे घर-भर में जमा होता रहे।’ इन सभी सचेतन बिम्बों में जिजीविषा का स्रोत उफन-उफनकर बहता है।</p> <p>यह प्रवृत्ति महानगरीय कविता की मृत्युग्रस्त प्रवृत्ति पर चोट है। मृत्यु के प्रति एक सचेत एहसास के कारण जीवन के प्रति इसकी निष्ठा खोखली नहीं है, उसमें एक दृढ़ता है। इस तरह हमेशा अच्छी ज़िन्दगी पर मृत्यु का अंकुश तना होता है। इसलिए नेमाड़े जी की कविता मृत्यु के एहसास से ध्वनित विनाश तत्त्व को अनदेखा कर कोरे आशावाद की तरफ़ नहीं झुकती। वह महानगरीय कविता की तरह मृत्यु की प्रभुसत्ता को तटस्थता से स्वीकार नहीं करती, बल्कि इस प्रभुसत्ता को चुनौती देनेवाले जीवनदायी प्रेरणाओं के सन्दर्भ म़जबूती से खड़ी करती है। इस विनाश तत्त्व को मात देता जीवन के प्रति अदम्य उत्साह और उससे स्वभावत: प्राप्त जुझारूपन नेमाड़े जी का स्थायी भाव है। उनकी इसी विलक्षण जीवन-दृष्टि का दर्शन उनकी कविताओं में भी होता है।</p> <p>—प्रकाश देशपांडे केजकर
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इस संग्रह में एक वरदान माँगा गया है—‘ज़िन्दगी का रमणीय सतरंगी बुलबुला व्यर्थ न हो, कि दरख़्तों से झाँकता रोशन सूर्य अस्त न हो, विनाश तत्त्व के झपट्टे में भी भूमि की उग्रगन्धी धूल गमकती रहे और जीने का समृद्ध कबाड़ पूरे घर-भर में जमा होता रहे।’ इन सभी सचेतन बिम्बों में जिजीविषा का स्रोत उफन-उफनकर बहता है।</p>
<p>यह प्रवृत्ति महानगरीय कविता की मृत्युग्रस्त प्रवृत्ति पर चोट है। मृत्यु के प्रति एक सचेत एहसास के कारण जीवन के प्रति इसकी निष्ठा खोखली नहीं है, उसमें एक दृढ़ता है। इस तरह हमेशा अच्छी ज़िन्दगी पर मृत्यु का अंकुश तना होता है। इसलिए नेमाड़े जी की कविता मृत्यु के एहसास से ध्वनित विनाश तत्त्व को अनदेखा कर कोरे आशावाद की तरफ़ नहीं झुकती। वह महानगरीय कविता की तरह मृत्यु की प्रभुसत्ता को तटस्थता से स्वीकार नहीं करती, बल्कि इस प्रभुसत्ता को चुनौती देनेवाले जीवनदायी प्रेरणाओं के सन्दर्भ म़जबूती से खड़ी करती है। इस विनाश तत्त्व को मात देता जीवन के प्रति अदम्य उत्साह और उससे स्वभावत: प्राप्त जुझारूपन नेमाड़े जी का स्थायी भाव है। उनकी इसी विलक्षण जीवन-दृष्टि का दर्शन उनकी कविताओं में भी होता है।</p>
<p>—प्रकाश देशपांडे केजकर
Book Details
-
ISBN9788126729906
-
Pages8
-
Avg Reading Time0 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सुभाषित संस्कृत काव्य-साहित्य की एक प्रचलित शैली है जिसमें रचित पदों में दृष्टि, सत्य, सौन्दर्य आदि का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। कम शब्दों में बात कहने की कला इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। राष्ट्रकवि दिनकर की इस पुस्तक में इसी शैली में रचे गए हिन्दी-पद शामिल हैं।
सुभाषित हमेशा वाक्-कौशल लिये होते हैं। इनमें अन्तर्निहित सन्देश ऐसी चतुराई से पद्य-बद्ध किए जाते हैं कि इन्हें याद भी किया जा सकता है और अपने व्यावहारिक जीवन में उपयोग भी किया जा सकता है। इस पुस्तक के सुभाषित विभिन्न विषयों से सम्बन्धित हैं और इनका कैनवस बहुत बड़ा है। ये अनुभव और अध्ययन के साँचे में ढले हुए सुभाषित हैं। इसलिए इनमें जो एक अलग छन्दात्मक रंग देखने को मिलता है, उसके प्रभाव में ग़ज़ब का आकर्षण और माधुर्य है। व्यंग्य-विनोद का पुट तो ख़ास है ही।
दिनकर ने अपने इन सुभाषितों में जिस काव्य-कौशल का परिचय दिया है, वह अपनी सम्प्रेषणीयता में एक मिसाल है। मिसाल इस मायने में भी कि आम पाठकों को ध्यान में रखकर भी ऐसे काव्य की रचना की जानी चाहिए। यही कारण है कि ये सुभाषित पढ़नेवाले को अपनी ही कहन का हिस्सा लगने लगते हैं और हृदयतल को छू वहीं ठहर जाते हैं।
इस पुस्तक में ऐसे कई सुभाषित हैं जो आज के उथल-पुथल-भरे समय में साठ साल पहले लिखे जाने के बाद भी प्रासंगिक हैं। इसलिए यह पुस्तक सिर्फ़ पठनीय ही नहीं, एक ज़रूरी पुस्तक भी है।
Lahoo Mein Fanse Shabd
- Author Name:
Shyam Kashyap
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हिन्दी में युवा कविता के बाद नए कवियों की एक पीढ़ी आई थी, जिसने आत्मीयता और घरेलूपन से भरी कविताएँ लिखकर हिन्दी कविता की उदासी और एकरसता से भरी हुई दुनिया में नवीन स्फूर्ति का संचार किया। श्याम कश्यप उस पीढ़ी के अन्यतम सदस्य थे, जिनकी कविताएँ ‘गेरू से लिखा हुआ नाम’ में संगृहीत हुईं और इस तरह अपनी पहचान बनाई। लेकिन प्रचार-प्रसार के तंत्र को मुँह चिढ़ानेवाले श्याम ने महत्त्व काव्य-साधना को दिया, उतना अपने यशो-विस्तार को नहीं, जिसके परिणामस्वरूप उनके अपने पाठक भी उनसे किंचित् निराश होते रहे। लेकिन पहले संग्रह के बाद प्रकाशित होनेवाला उनका यह दूसरा संग्रह ‘लहू में फँसे शब्द’ इस बात का प्रमाण है कि इस बीच भले ही उनकी कविताएँ ठिकाने से उनके पाठकों तक नहीं पहुँचीं, वे कविता के साथ निरन्तर रहे हैं और कविता लगातार उनका पीछा करती रही है।
स्वभावतः श्याम की इस संग्रह की कविताओं में प्रत्यक्ष होनेवाला विकास हमें सम्मोहित करता है। श्याम सर्वप्रथम प्रकृति के कवि हैं, फिर मनुष्य के, फिर समाज के, फिर सम्पूर्ण मनुष्यता क्या, सम्पूर्ण पृथ्वी के। उनकी ऐन्द्रिय संवेदना जिन विलक्षण और उदात्त बिम्बों में अभिव्यक्त होती है, वे हमारे भीतर उस अवकाश की सृष्टि करते हैं, जो मानवीय आत्मा के पंख फैलाने के लिए आवश्यक है और जो वर्तमान युग में लगातार कम होता जा रहा है। जहाँ तक मनुष्य से लेकर सम्पूर्ण पृथ्वी तक की बात है, श्याम ने अपनी कविताओं में उसके अनेकानेक आयामों को समेटा है। इन तमाम वस्तुओं के प्रति एक गहन चिन्ता का भाव ही नहीं है इनमें, वह आस्था भी है, जो निराशा के बादलों को इन्द्रधनुषी किरणों से तार-तार कर देती है।
निस्सन्देह श्याम सटीक वर्णन और चित्रण के कवि हैं, लेकिन ‘लहू में फँसे शब्द’ की कविताएँ पढ़ते हुए आप जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाएँगे, ऐन्द्रिय संवेदना से भावों में और भावों से फिर विचारों में उतरते जाएँगे, जहाँ की दुनिया उस अमूर्तता से युक्त है, जिसके बिना कोई कला-कृति सार्थक नहीं हो सकती। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज का यांत्रिकता और औपचारिकता से भरा हुआ दौर जहाँ हमें निरर्थकता के किनारे तक पहुँचा रहा है, श्याम की ये कविताएँ जिनमें शब्द, बिम्ब, भाव और विचार सभी विस्फोट करते हैं, हमारे सामने एक उजास से भरे हुए क्षितिज का उन्मीलन करती हैं। प्रसाद के शब्दों को ज़रा-सा बदलकर कहें, तो ‘तुमुल कोलाहल-कलह में यह हृदय की बात रे मन!’
Antas Ki Khurchan
- Author Name:
Yatish Kumar
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‘यतीश कुमार की कविताओं को मैंने पढ़ा। अच्छी रचना से मुझे सार्वजनिकता मिलती है। मैं कुछ और सार्वजनिक हुआ, कुछ और बाहर हुआ, कुछ अन्य से मिला, उनके साथ हुआ और उनके साथ चला।’
—विनोद कुमार शुक्ल
यतीश की कविता का कुनबा काफ़ी बड़ा है, जिसमें आवाँ जितने पात्र भरे पड़े हैं। इनका वैविध्य उनकी संवेदना की परिधि को कहीं व्यापक बनाता है तो कहीं भरमाता है। इस विचलन को हुनर में बदल देने की सम्भावना और भरपूर क्षमता उनके कवित्व में मौजूद है, जिसका प्रमाण हैं इस संकलन की कविताएँ।
—अष्टभुजा शुक्ल
Hamare Jhooth Bhi Hamare Nahin
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Amita Sharma
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अमिता शर्मा की कविताओं की दुनिया काफ़ी विस्तृत और वैविध्यमयी है और यह विस्तार और वैविध्य मनमाना या अवधारणात्मक न होकर ऐसी अर्जित जीवनानुभूति है जो हमें अपने परिवेश को और उससे प्रतिकृत होनेवाले अपने दिलो–दिमाग़ की प्रतिक्रियाओं को भी उन पर पड़े अभ्यास और अतिपरिचय के जाले छुड़ाती हुई—एक नई समझ और नई विकलता के साथ स्वायत्त करने में मदद करती है। यह कविता यदि एक ओर ‘अख़बारी हादसे पलटते, अपनी सुरक्षा की धूप सेंकते रहने के सुख’ की आत्म–वंचना को उघाड़ती है तो दूसरी ओर वह नितान्त आज के सामाजिक अरण्य में ‘मेमने की खाल ओढ़े भेड़िए’ को भी पहचानती है और उस ‘जोकर’ को भी, जो ‘अपना सन्तुलन बनाए रखने के लिए सबको चाहिए।’ वह मानवी साहचर्य और अलगाव के एक समूचे वर्णपट को उकेर सकती है और ‘बिना घर की छतों’ को भी। वह उन ‘ईर्ष्याओं’ को भी जानती है जो औरों से आगे बढ़ने के लिए उत्तेजित करती हुई हमें अपने आपसे छोटा करती हैं, और उन सपनों को भी, जो ज़िन्दगी को बदलते नहीं, और जटिल कर देते हैं।
बन्धन और स्वातंत्र्य, अनिवार्य उत्पीड़न और उतनी ही दुर्दम्य मुक्ति–चेष्टा की छटपटाहट मानो अमिता की कविता के वादी–संवादी सुर हैं। सिमोन वेल की कृति ‘ऑपरेशन एंड लिबर्टी’ के आवरण–पृष्ठ पर खुले आसमान की पृष्ठभूमि में सलाखों का ‘क्लोज–अप’ जिस तरह उभरकर आता है, कुछ–कुछ उस तरह का कथ्य–रूप इन कविताओं के भीतर से उजागर होते देखा जा सकता है—‘कितनी विशाल खिड़की/कितना विशाल आसमान/पर दीखती हैं केवल उनके बीच की छड़ें’—किसी भी दृष्टिकोण की इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी! निश्चय ही अमिता के यहाँ अपसंस्कृति के विद्रूपों के बरक्स प्रकृति हमेशा विद्यमान रही है, किन्तु रूसो-ई रोमैन्टिक विद्रोह और वापसी के तर्ज पर नहीं। यह निहायत ही एतद्देशीय और निहायत आँख–सामने की हक़ीक़तों के भीतर से उजागर होता आत्महीनता का घेराव है जो अपने भोक्ता और साक्षी को इस प्रश्न के सम्मुख धकेलता है—‘इस असंज्ञ संस्कृति में/किस सच को हम अपना कहें/हमारे झूठ भी अपने नहीं।’
इन कविताओं में आत्म और अनात्म के ही नहीं, निजी और सार्वजनिक के बीच भी ख़ासी आवाजाही सम्भव हुई है। बौखलाहट, विक्षोभ की जगह सूखी–सान्द्र टिप्पणियों ने ले ली है जो हमारे निकट सम्बन्धों में भी घर करती जा रही रिक्ति की कचोट को भी सह्य बना लेती हैं कुछ इस तरह कि एक तरफ़ अपने दर्द को ‘अपनी तरह अपने से कह लेने’ और दूसरी तरफ़ ‘अपने अभिनय का द्रष्टा बनने’ के बीच चुनाव की गुंजाइश ही नहीं छूटती। ध्यान देने की बात मगर यह है कि दोनों को ‘मोक्ष’ की संज्ञा से अभिहित करना इस मूल्य–विपर्यय के युग को उसकी अपनी शर्तों पर स्वीकार लेना नहीं है। लगता है, जैसे मोक्ष या आत्मा जैसे पारम्परिक प्रत्ययों को ही नहीं, स्वतंत्रता और समता सरीखे शब्दों को भी उनका अर्थ–प्रामाण्य लौटा लेने के लिए इक्कीसवीं सदी के लेखकों को भी ‘एक्जाइल’ और ‘कनिंग’ के सूक्ष्म उपकरणों की उतनी ही ग़रज़ और दरकार है जितनी आधुनिकों को थी। ‘एक नितान्त ख़ाली जगह में’ अपने आपको ढूँढ़ने की समस्या और साँसत इस कविता की एक चरितनायिका की ही नहीं, हम सबकी है, और जिस दु:ख के सहारे यह खोज सम्भव होती है, वह भी एक अनिवार्य, किन्तु सार्थक दु:ख है।
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