Jagannath Ka Ghoda
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विशाल, विराट और महान दिखनेवाली चीज़ें जीवन का स्रोत नहीं होतीं, उन्हें विशेष अवसरों पर, कुछ आयोजित-प्रायोजित मन:स्थितियों में देखने और वापस आकर भूलने के लिए देखा जाता है। वे हमारे उन दिनों और रातों की साथी नहीं बनतीं जिनसे हम बनते हैं, हमारा जीवन बनता है, हमारा दैनन्दिन, हमारे अतीत और वर्तमान बनते हैं।</p> <p>रवीन्द्र भारती की ये कविताएँ ऐसी ही छोटी चीज़ों की अभ्यर्थना करती हैं। 'गृहस्थ की गृहस्थी' एक कविता है जिसमें घर में आई एक नई कटोरी का स्वागत किया जा रहा है 'यह हमारी पात्र है/इसके पात्र हैं हम/ पात्र-परिचय होगा, धीरे-धीरे बढ़ेगा हेल-मेल।'</p> <p>'आपा-धापी' एक कविता है जिसमें लोकन ट्रेनों और बसों की लगातार गतिमान भीड़ में एक नामालूम से रिश्ते की पहचान की गई है। रोज़-रोज़ दिखनेवाले चेहरों के बीच बननेवाला एक अबोला रिश्ता—'निर्दोष आँखों की मौन कथा/चली जाती है किसी की, किसी के साथ अकारण/अकारण ही होती है चिन्ता/जब कोई दिखता नहीं दो-चार दिन।' यह 'अकारण' जगत-गति के बड़े कहे जानेवाले सुपरिभाषित कारणों का अचीन्हा-सा स्थानापन्न है, और जीवन की डोर को थामे रखने में इसकी भी बहुत बड़ी भूमिका है।</p> <p>इन कविताओं में ऐसी अनेक चीज़ें, दृश्य, पंक्तियाँ, और चित्र हैं जो हमें हमारे अनजाने ही हमारी साधारणता में आश्वस्ति भर देते हैं, जो कहते हैं कि बड़ी-बड़ी ताक़तों की दूर से दिखाई देनेवाली आकर्षक और महान आकृतियों से पहले हमारे पास भी ऐसा बहुत कुछ है जो उनके सब कुछ का विकल्प हो सकता है। मसलन 'कुलिया-चुनिया' की नन्ही बच्ची की कल्पित दुनिया जिसमें कवि अनायास सच-झूठ के स्याह-सफ़ेद में विभाजित अपनी वास्तविक दुनिया से मुक्त होकर सहर्ष चला जाता है।</p> <p>देशज शब्दों, देशज सौन्दर्यबोध और देशज आत्माभिमान से रची इन कविताओं से गुज़रते हुए आप धीरे-धीरे अपनी दुनिया के सूक्ष्म से परिचित होते हैं जो वास्तव में बहुत बड़ा है।
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विशाल, विराट और महान दिखनेवाली चीज़ें जीवन का स्रोत नहीं होतीं, उन्हें विशेष अवसरों पर, कुछ आयोजित-प्रायोजित मन:स्थितियों में देखने और वापस आकर भूलने के लिए देखा जाता है। वे हमारे उन दिनों और रातों की साथी नहीं बनतीं जिनसे हम बनते हैं, हमारा जीवन बनता है, हमारा दैनन्दिन, हमारे अतीत और वर्तमान बनते हैं।</p>
<p>रवीन्द्र भारती की ये कविताएँ ऐसी ही छोटी चीज़ों की अभ्यर्थना करती हैं। 'गृहस्थ की गृहस्थी' एक कविता है जिसमें घर में आई एक नई कटोरी का स्वागत किया जा रहा है 'यह हमारी पात्र है/इसके पात्र हैं हम/ पात्र-परिचय होगा, धीरे-धीरे बढ़ेगा हेल-मेल।'</p>
<p>'आपा-धापी' एक कविता है जिसमें लोकन ट्रेनों और बसों की लगातार गतिमान भीड़ में एक नामालूम से रिश्ते की पहचान की गई है। रोज़-रोज़ दिखनेवाले चेहरों के बीच बननेवाला एक अबोला रिश्ता—'निर्दोष आँखों की मौन कथा/चली जाती है किसी की, किसी के साथ अकारण/अकारण ही होती है चिन्ता/जब कोई दिखता नहीं दो-चार दिन।' यह 'अकारण' जगत-गति के बड़े कहे जानेवाले सुपरिभाषित कारणों का अचीन्हा-सा स्थानापन्न है, और जीवन की डोर को थामे रखने में इसकी भी बहुत बड़ी भूमिका है।</p>
<p>इन कविताओं में ऐसी अनेक चीज़ें, दृश्य, पंक्तियाँ, और चित्र हैं जो हमें हमारे अनजाने ही हमारी साधारणता में आश्वस्ति भर देते हैं, जो कहते हैं कि बड़ी-बड़ी ताक़तों की दूर से दिखाई देनेवाली आकर्षक और महान आकृतियों से पहले हमारे पास भी ऐसा बहुत कुछ है जो उनके सब कुछ का विकल्प हो सकता है। मसलन 'कुलिया-चुनिया' की नन्ही बच्ची की कल्पित दुनिया जिसमें कवि अनायास सच-झूठ के स्याह-सफ़ेद में विभाजित अपनी वास्तविक दुनिया से मुक्त होकर सहर्ष चला जाता है।</p>
<p>देशज शब्दों, देशज सौन्दर्यबोध और देशज आत्माभिमान से रची इन कविताओं से गुज़रते हुए आप धीरे-धीरे अपनी दुनिया के सूक्ष्म से परिचित होते हैं जो वास्तव में बहुत बड़ा है।
Book Details
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ISBN9789391950736
-
Pages104
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मनुष्य की स्थूल पार्थिव सत्ता उसकी रंग-रूपमयी आकृति में व्यक्त होती है। उसके बौद्धिक संगठन से जीवन और जगत सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओं, उनके तत्त्व के शोध और समाधान के प्रयास, चिन्तन की दिशा आदि संचालित और संयमित होते हैं! उसकी रागात्मक वृत्तियों का संघात उसके सौन्दर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से सम्पृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Book
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Hazaar Daastaan-e-Ishq
- Author Name:
Sanjiv Saraf
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The exquisite journey of love passes through numerous twists and turns, bringing different experiences to each individual. In Urdu poetry, poets have penned down these diverse experiences in rhyme with a sheer eloquence that aptly expresses the exceptional bond between the lover and the beloved. Meer, Ghalib, Momin, Dagh, Faiz, and hundreds of Urdu poets have given voice to the emotions of lovers going through stages such as longing, interplay, loving, possessiveness, rivalry, separation, breaking up, and frenzy. This eloquence makes every reader share this thought, as was inimitably expressed by Mirza Ghalib: Dekhna taqreer ki lazzat ki jo us ne kahaa Maine ye jaanaa ki goyaa ye bhi mere dil men hai ‘Love Longing Loss in Urdu Poetry’ narrates the enchanting tale of this journey that includes the subtle nuances and the beauty of Urdu poetry with all its grace. Also, this book is available in Hindi and Urdu languages with the title "Hazaar Daastaan-e-Ishq".
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है।
काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Naye Yug Mein Shatru
- Author Name:
Mangalesh Dabral
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एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है।
अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
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