Swair

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Author:

Ram Prakash

Language:

Hindi

Category:

Poetry

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अत्याचार का एक रूप स्वैराचार है। हम यह भी कह सकते हैं कि स्वैराचार ही अत्याचार की राह है। स्वैराचार का अर्थ है—व्यक्ति-मन का लोक-मन और लोक-मत से सर्वथा विलगाव। सामान्य भाषा में कहें तो मनमानापन। अपनी इच्छा इतनी प्रबल हो जाए कि समाज के सारे अनुशासन उसके समक्ष बौने हो जाएँ तो इसे ही स्वैराचार कहते हैं।</p> <p>स्वैर-भाव दूषित मनोवृत्ति है। इसके परिणाम भयंकर होते हैं। पूरी मानवीय सभ्यता पर यह प्रश्नचिन्ह है। आज तमाम सामाजिक विकृतियों, दूषित पर्यावरण ने समाज में स्वैर-भाव को बढ़ावा दिया है, और कामेच्छा सड़कों पर नृत्य कर रही है। दैनंदिन की घटनाओं में इसका प्राधान्य है और ऐसे में कोई कवि-मन शिक्षाविद् इससे विचलित-विगलित न हो, यह सम्भव नहीं है।</p> <p>कवि-हृदय श्री रामप्रकाश ‘प्रकाश’ ने इसी चिन्ता को पूरे ऐतिहासिक-पौराणिक परिप्रेक्ष्य में अपनी काव्यकृति ‘स्वैर’ में विस्तार से वर्णन किया है। समाचार-पत्रों में प्रकाशित तमाम घटनाओं ने प्रसिद्ध शिक्षाविद्, शिक्षा विभाग से जुड़े प्रशासकीय दायित्व से संपृक्त तथा प्रकृत्या कवि रामप्रकाश ‘प्रकाश’ को उद्वेलित किया और उनकी वेदना कविता के रूप में प्रवाहित हो उठी। अन्तर केवल इतना है कि उन्होंने स्वैरियों को निषाद की भाँति केवल अप्रतिष्ठा का शाप न देकर सुधरने का सन्देश दिया है।</p> <p>सुधार की यह अपेक्षा कवि ने मानव स्वभाववश की है। उन्हें मानवता पर अटूट विश्वास है। ‘स्वैर’ निश्चित रूप से वेदना का काव्य है। मिट्टी को मान माननेवाले देश में नारी के विरुद्ध स्वराचार कितना जघन्य है, इसका मार्मिक चित्र कवि ने प्रस्तुत किया है।

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ISBN
9788180319822
Pages
179
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

अत्याचार का एक रूप स्वैराचार है। हम यह भी कह सकते हैं कि स्वैराचार ही अत्याचार की राह है। स्वैराचार का अर्थ है—व्यक्ति-मन का लोक-मन और लोक-मत से सर्वथा विलगाव। सामान्य भाषा में कहें तो मनमानापन। अपनी इच्छा इतनी प्रबल हो जाए कि समाज के सारे अनुशासन उसके समक्ष बौने हो जाएँ तो इसे ही स्वैराचार कहते हैं।</p>
<p>स्वैर-भाव दूषित मनोवृत्ति है। इसके परिणाम भयंकर होते हैं। पूरी मानवीय सभ्यता पर यह प्रश्नचिन्ह है। आज तमाम सामाजिक विकृतियों, दूषित पर्यावरण ने समाज में स्वैर-भाव को बढ़ावा दिया है, और कामेच्छा सड़कों पर नृत्य कर रही है। दैनंदिन की घटनाओं में इसका प्राधान्य है और ऐसे में कोई कवि-मन शिक्षाविद् इससे विचलित-विगलित न हो, यह सम्भव नहीं है।</p>
<p>कवि-हृदय श्री रामप्रकाश ‘प्रकाश’ ने इसी चिन्ता को पूरे ऐतिहासिक-पौराणिक परिप्रेक्ष्य में अपनी काव्यकृति ‘स्वैर’ में विस्तार से वर्णन किया है। समाचार-पत्रों में प्रकाशित तमाम घटनाओं ने प्रसिद्ध शिक्षाविद्, शिक्षा विभाग से जुड़े प्रशासकीय दायित्व से संपृक्त तथा प्रकृत्या कवि रामप्रकाश ‘प्रकाश’ को उद्वेलित किया और उनकी वेदना कविता के रूप में प्रवाहित हो उठी। अन्तर केवल इतना है कि उन्होंने स्वैरियों को निषाद की भाँति केवल अप्रतिष्ठा का शाप न देकर सुधरने का सन्देश दिया है।</p>
<p>सुधार की यह अपेक्षा कवि ने मानव स्वभाववश की है। उन्हें मानवता पर अटूट विश्वास है। ‘स्वैर’ निश्चित रूप से वेदना का काव्य है। मिट्टी को मान माननेवाले देश में नारी के विरुद्ध स्वराचार कितना जघन्य है, इसका मार्मिक चित्र कवि ने प्रस्तुत किया है।

Book Details

  • ISBN
    9788180319822
  • Pages
    179
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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