Andhere Ke Rang
Author:
Mukund LaathPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
मुकुन्द लाठ हमारे मूर्धन्य विचारकों और संगीतवेत्ताओं में से एक हैं। सुखद संयोग यह है कि उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं और वे अपने ढंग के अकेले कवि हैं। विस्मय की बात यह है कि उनकी कविता में संसार की पदार्थमयता और उनकी सहज वैचारिकता में न तो कोई अलगाव है और न ही एक का दूसरे पर कोई बोझ। वे अपने आसपास को जिस सजग संवेदनशीलता और नन्हीं सचाइयों में देख पाते हैं, वह अनोखा गुण है। उनके अवलोकन में सूक्ष्मता है, उनकी अभिव्यक्ति में सफ़ाई है। वे मर्म के कवि हैं, किसी विचार के प्रवक्ता नहीं। उनकी कविता का वितान बड़ा है पर उनमें सहज विनय है, कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं। वे सहज भाव से कह पाते हैं : ‘उडऩा तो/चिडिय़ा से सीख लिया/अब तो आकाश कहाँ पूछता हूँ।’ उनके अलावा हिन्दी में और कवि हैं जो कह सके ‘है इन्हीं पत्तों में कहीं/ढूँढ़ना मत/पंख हूँ, आकाश है।’ रज़ा पुस्तक माला में अपनी आयु के आठवें दशक में लिखी गईं एक कवि की इन कविताओं को हम सादर-सहर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।</p>
<p>—अशोक वाजपेयी
ISBN: 9789388183741
Pages: 219
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Kaifi Azmi
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- Description: ग़ालिब का एक शेर ज़़रा सी हेर-फेर के साथ पेश है- होगा कोई ऐसा भी जो कैफ़ी को न जाने शायर तो वो अच्छा है पे... ... ... और इस ‘पे’ (लेकिन) के बाद बहुत कुछ आ सकता है, वह भी जो ‘ग़ालिब’ ने कहा और उसके अलावा बहुत कुछ और भी। कैफ़ी आज़मी के मुआमले में इस ‘पे’ के बाद उनके एक और व्यक्तित्व का तज़्करा भी आ सकता है जिसके दर्शन आपको इस संकलन के पृष्ठों में होंगे। इसमें कोई शक नहीं कि कालमनिगार एक वाहियाततरीन काम है। वक़्ती घटनाओं पर वक़्ती तब्सरा करना कालमनिगार का काम होता है। और यही कारण है कि कालमनिगार का क़लम जब ठहरता है तो बहुत जल्द उसका पाठक उसे भुला भी देता है। लेकिन इसी के बीच इक्का-दुक्का मिसालें ऐसी मिलती हैं जिनमें एक कालमनिगार का जौहर वक़्त की सरहदों को पार करता नज़र आता है। ‘नई गुलिस्ताँ’ में कैफ़ी की रचनाएँ भी इसी श्रेणी में रखी जाने की चीज़ें हैं। कॉलम के रूप में कभी छपी इन रचनाओं में कैफ़ी की अपनी एक अलग ही शैली अपने पूरे तबो-ताब के साथ दिखाई देती है। कैफ़ी का हमज़ाद एक हिकायतनवीस इनमें से अधिकांश रचनाओं का ‘सूत्रधार’ है और किसी नीति-कथा, किसी ऐतिहासिक घटना या किसी लतीफ़े के माध्यम से अपने समय की राजनीति पर एक चुभता हुआ तब्सरा करता है। फिर जिस तरह जातक कथाओं में बुद्ध अन्त में एक नीति-वाक्य बोलते दिखाई देते हैं, उसी तरह इन रचनाओं में कैफ़ी अन्त में एक ‘राजनीतिक-वाक्य’ बोलते नज़र आते हैं। अधिकांश रचनाओं का अन्त कुछ अशआर पर या कुछ सुप्रचलित अशआर की पैरोडी पर होता है जो अपना ख़ुद का एक लुत्फ़ पैदा करते हैं। इसके अलावा इस पूरे संकलन को नज़्म (पद्य) में लिखी नस्र (गद्य) का नाम दें, जो तथाकथित नस्री नज़्म (गद्य-काव्य) से कहीं बहुत ऊँचे दर्जे की चीज़ है, तो कुछ ग़लत नहीं होगा। इस पूरे संकलन में शायद ही कोई ऐसा वाक्य आपको मिले जिसमें कैफ़ी ने अपनी शे’री फ़ितरत छोड़ी हो और क़ाफ़ियापैमाई न की हो। दूसरे अलफ़ाज़ में, कैफ़ी की नस्र भी बड़े ठस्से के साथ यह कहती हुई नज़र आती है कि मैं किसी नस्रनिगार की नहीं, शायर की रचना हूँ। नतीजा यह कि पाठक के लिए इस अच्छे-ख़ासे भारी संकलन में बोर होने का कहीं कोई मुक़ाम नहीं है।
Chaunsath Sutra Solah Abhiman : Kamsutra Se Prerit
- Author Name:
Avinash Mishra
- Book Type:

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Description:
अविनाश मिश्र कविता के अति विशिष्ट युवा हस्ताक्षर हैं। इस संग्रह में शामिल कविताएँ एक लम्बी कविता के दो खंडों के अलग-अलग चरणों के रूप में प्रस्तुत की गई हैं। कवि प्रेम में आता है और साथ लेकर आता है—‘कामसूत्र’। ‘वात्स्यायन’ कृत कामसूत्र। इसी संयोग से इन कविताओं का जन्म होता है। कवि प्रेम और कामरत प्रेमी भी रहता है और दृष्टाकवि भी। वात्स्यायन की शास्त्रीय शैली उसे शायद अपने विराम, और अल्पविराम पाने, वहाँ रुकने और अपने आप को, अपनी प्रिया को, और अपने प्रेम को देखने की मुहलत पाना आसान कर देती है, जहाँ ये कविताएँ आती हैं और होती हैं। यह शैली न होती तो वह प्रेम में डूबने, उसमें रहने, उसे जीने-भोगने की प्रक्रिया को शायद इस संलग्नता और इस तटस्थता से एक साथ नहीं देख पाता।
कोई इन कविताओं को सायास रचा गया कौतुक भी कह सकता है, लेकिन इनका आना और होना इन कविताओं के शब्दों और शब्दान्तरालों में इतना मुखर है कि आप इनकी अनायासता और प्रामाणिकता से निगाह नहीं बचा सकते। ये उतनी ही प्राकृतिक कविताएँ हैं, जितना प्राकृतिक प्रेम होता है, जितना प्राकृतिक काम होता है।
काम की चौंसठ कलाएँ और स्त्री के सोलह शृंगार– इस संग्रह की 80 कविताओं के आलम्बन यही हैं।
इन कविताओं को पढ़ना प्रेम में होने, उसे जीने, अनुभूत करने की प्रक्रिया से गुज़रने या स्मृति-आस्वाद को दुहराने जैसा है। कवि का अनुभव-सत्य पाठक के जीवनानुभव के आस्वाद को नया अर्थ देने जैसा है।
किताब संग्रहणीय भी है, सुन्दर प्रेम-उपहार भी।
Pagdandiyan Gawah Hain
- Author Name:
Atma Ranjan
- Book Type:

- Description: Collection of Hindi Poems by Atma Ranjan. Awarded by Sutra Samman
Maya Rag
- Author Name:
Maya Govind
- Book Type:

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Description:
हिन्दी गीत-काव्य की एक प्रशस्त परम्परा है। छन्दमुक्त कविता के तमाम आन्दोलनों एवं आग्रहों के बावजूद गीत नए-नए सन्दर्भों में प्रस्फुटित हो रहे हैं। सुप्रसिद्ध कवयित्री माया गोविन्द का प्रस्तुत गीत-संग्रह ‘माया राग’ हिन्दी गीतों की संवेदना को संवर्धित करता है। संग्रह में भावनाओं की प्रचुरता है। कहा जा सकता है कि बौद्धिकता पर हार्दिकता का काव्यात्मक प्रकाश फैला हुआ है।
माया गोविन्द हिन्दी काव्य मंचों की श्रीवृद्धि करती रही हैं। उन्होंने हिन्दी सिनेमा में अपने स्तरीय गीतों से गीतात्मकता की गुणवृद्धि की है। यही कारण है कि उनके गीतों में लय की अद्भुत छटाएँ मिलती हैं। ऐसा लगता है कि गीत गाए जाने के बाद लिखे गए हैं। इनमें जीवन की विभिन्न स्थितियाँ हैं। फिर भी, यह कहना अधिक उचित होगा कि माया गोविन्द ने एक स्त्री की दृष्टि से इस सृष्टि को देखा है। इसीलिए ये गीत स्त्री की पीड़ा को सशक्त ढंग से अभिव्यक्त करते हैं। आसक्ति और अनासक्ति के बीच व्याकुल मन की थाह माया गोविन्द ने भली-भाँति लगाई है। सावन और होली आदि के बहाने जीवन के उत्सव की विविध छटाएँ व्यंजित हुई हैं। कहीं-कहीं अद्भुत कथन उभरे हैं—‘प्यास की रुक्मिणी का करो तुम हरण’ या ‘अधरों पर अधर जैसे, इन्द्रधनुष की लकीर’।
भाषा, भाव और शैली की दृष्टि से ‘माया राग’ के गीत निश्चित रूप से पाठकों के हृदय को आन्दोलित करेंगे।
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