Rang Hasi Ke
Author:
Mahesh Garg "Bedhadak"Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Unavailable
हम जब भी घर गए
हम जब भी घर गए
अक्सर उधर गए
पर छत पर चाँद को
बरसों गुज़र गए
उनको पता भी है कि नहीं
किसको पता है
बुढ़ापे का सच
सर ऊपर चाँदी उगी,
याददाश्त कमज़ोर
पीठ धनुष जैसी हुई,
कच्ची उम्र की डोर
कच्ची उम्र की डोर,
दाँत ले रहे हिलोरें
छू-मंतर मुस्कान,
नज़र हुई कमज़ोर नज़र गड़ाए
बीवी कहती—हाय!
अभी से तुम सठियाए।
ISBN: 9789390372690
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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इन कविताओं की सच्चाई उन पर बड़ी सहजता से व्यंग्य करती है, जो धर्म-ईमान की सौदागरी बड़े गर्व से किया करते हैं, दूसरों की मौत से अपनी साँसें खींचा करते हैं, पानी की तरह हर रंग में मिल जाया करते हैं और इनसान होते हुए भी कभी मक्खियों तो कभी केंचुओं को मात दिया करते हैं। इन कविताओं की सच्चाई उन सपनों की लड़ाई में कन्धे से कन्धा मिलाए जूझती है, जिनका भरोसा ईमानदारी और मेहनत की अप्रासंगिक होती पूँजी पर अब भी क़ायम है। इन कविताओं की सच्चाई सम्बन्धों के लगातार क्रूर होते इस्तेमाल का विरोध भी करती है और टूट-टूटकर बनते हुए नए मनुष्य के सौन्दर्य को जीती भी है। इन कविताओं की सच्चाई संवेदनात्मक उद्देश्य की मिट्टी से फूटते वैचारिक भावों के उन अंकुरों की पक्षधर है, जो हवा के ज़हर को ऑक्सीजन की तरह सर्जनात्मक चुनौती देने के लिए ही जन्मे हैं। इन कविताओं की सच्चाई रचना के हर स्तर पर अनुभव से नाभिनालबद्ध होने के कारण अतिरिक्त तराश या सपाटता से मुक्त है। इसीलिए इनमें से बहुत-सी कविताओं को जिस उत्सुकता के साथ पढ़ा गया है, उसी उत्साह के साथ सुना भी गया है।
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इतने सारे काम एक साथ कर डालती है बिना थके, बिना हार माने। कितना जोखिम-भरा रहा होगा उसके लिए कारागार में जाकर अपनी फ़िल्म 'बलात्कार' या 'रेप' की शूटिंग करना—औरत पर हुए ज़ुल्मों को बयान करना। परन्तु वह मगन है अपनी तपश्चर्या में, दीवानगी में, फक्कड़पन में, बिना मेहनत-मशक्कत किए जी नहीं पाती...अपना बहुमूल्य ज्ञान बाँटने में जुटी है। और उसके लिए वह जाने कहाँ-कहाँ से जाती है, बेझिझक यह कविता संग्रह ‘मेरी ज़मीन मेरा आसमान’ ही आख़िरी मंज़िल नहीं है उसकी, लवलीन के पास अभी भी ढेर सारे अनगाए गीत हैं…नज़्में हैं। प्रेम में पागल होकर पद्य गाए जाते हैं और दीवानगी में जिया जाता है—उसकी बेचैन रूह उसे जीने कहाँ देती है! चाहे वह जितना कहे—“मैं पौधे को पानी देती गई और प्यास मेरी बुझती गई।” वैसा होता कहाँ है! अभी यहाँ है, कल उसकी प्यासी आत्मा किसी पहाड़ की अँधेरी गुफ़ा में कुछ नया तलाशती मिल जाएगी आपको। परन्तु एक उसी क्षण उसका चेहरा आत्मसन्तुष्टि से भरा चमचमाता है, जब वह अपने बच्चों का नाम लेती है—वेदान्त और कर्मण्ये, जैसे नाम नहीं ले रही, मंत्रोच्चारण कर रही है। ज़िन्दगी के हर पहलू को लवलीन भरपूर जीती है—पूरी सच्चाई और शिद्दत के साथ। –डॉ. कुसुम अं
Tareekh Hamein Saath Liye Jaatee Hai
- Author Name:
Hariom
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Description:
कविता अन्ततः एक भाषिक संरचना है। शब्दों को बरतने की कला है। लय और संरचना उसके अनिवार्य तत्व हैं। समकालीन भारतीय राजनीति की शिकार सिर्फ़ मनुष्यता ही नहीं हमारी भाषा भी हुई है। वो भाषा जो अमीर ख़ुसरो, ग़ालिब, मीर, रहीम से लेकर मुक्तिबोध की सृजनात्मकता से गुज़रकर हमें प्राप्त हुई।
हरिओम की कविताएँ भाषा का एक खोया हुआ आत्मीय संसार गोया हमे वापिस सौंपती हैं। उनके लेखन में एक स्वाभाविक लय है जो अपनी सहजता से हमें चकित करती है। इसे एक लम्बे अभ्यास के बिना प्राप्त करना असम्भव है। कहीं-कहीं नए शब्दों को शामिल करते हुए अनायास ही वे भाषा की न सिर्फ़ पुनर्रचना करते प्रतीत होते हैं; बल्कि उसे नया संस्कार भी देते हैं।
और हम सदियाँ बिताकर आ गए थे जैसे लम्हों में—वाक्य ऐसे लगते हैं जैसे किसी शेर का पूरा मिसरा हों। भूख से नहीं मरता कोई—जैसा यांत्रिक, संवेदनहीन अहम्मन्य वाक्य जैसे किसी ग़ैरज़िम्मेदार तानाशाह का प्रतीक बन जाता है। अपने समय और समाज की गहरी चिन्ता और एहसास के बावजूद इस संग्रह की मुख्य थीम प्रेम है। वे कहते हैं—वक़्त ने जगह को ऐसे घेर रखा है/जैसे मेरी बाँहों ने तुम्हें।
वक़्त और जगह याद करिए—Time & Space—आइंस्टाइन ने जब समय को स्थान का अनिवार्य चौथा आयाम बताया था तो वैज्ञानिकों को ये समझने में कुछ समय लगा था। किन्तु प्रेम की अनुभूति के बरक्स समय और स्थान के युग्म को हरिओम इस सहजता से लाकर रख देते हैं कि हमें ये बोध ही नहीं होता कि उनकी बाँहों में समय है। और उनकी प्रेमिका जिसे वे ‘तुम’ कहकर सम्बोधित कर रहें हैं—वो जगह है, वो पृथ्वी है, वो अन्तरिक्ष है। जिसका समय से मुक्त होना असम्भव है बल्कि अस्तित्व भी असम्भव है।
हरिओम युवा हैं। अपने शब्दों को यक़ीन के साथ स्वर देते हैं और लय पर उनका अधिकार है। तारीख़ हमें साथ लिये जाती है संग्रह में इसके अलावा भी बहुत कुछ है और जो नहीं है वो अगली रचनाओं में और ताक़त के साथ आएगा।
इस यक़ीन के साथ शुभकामनाओं सहित...
—नरेश सक्सेना
Ek Aur Madhushala
- Author Name:
Dr. Suresh Prasad
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- Description: जिस शराब के प्रबल पक्षपाती विश्व के विभिन्न साहित्यों में फिट्जेरॉल्ड,उमर खैयाम और डॉ. हरिवंश राय बच्चन जैसे लब्धप्रतिष्ठों ने उसे साहित्यिक मान्यता प्रदान की,वहाँ प्रथमतः डॉ. सुरेश प्रसाद ने मदिरा के प्रतिपक्ष में विज्ञानपूर्ण विचार देकर लोगों को सबल ढंग से इस दुर्गुण से दूर रहने की सलाह दी है। डॉ. प्रसाद ने मदिरा के विरुद्ध काव्यात्मक आवाज उठाकर मद्यपों का मनोबल बहुत हद तक तोड़ा है। मद्यपान से छुटकारा दिलाने का यह प्रयास सराहनीय है। मदिरा पर आज तक मेरी दृष्टि से इस तरह का कोई दूसरा काव्य नहीं गुजरा है। यह कृति स्वाभाविक रूप से लोकप्रिय और चर्चित होगी तथा हिंदी-साहित्य-जगत् एवं लोक-मानस दोनों इसका आदर करेंगे, निःसंदेह ऐसा विश्वास है। डॉ. प्रसाद ने मदिरा की हर अदा को कातिल करार देते हुए प्रतिक्रिया-स्वरूप उस पर कातिलाना हमला बोल दिया है; उसके सारे काले चिट्ठे खोलकर रख दिए हैं दुनिया की आँखों के सामने। ‘मदपायी’ तथा ‘मदिरा-विक्रेता’ पर भी विनम्रता जताते हुए उन्हें मदिरा का साथ देने से मना किया है औचित्य बताते हुए।
Barf Aur Aag
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- Description: Poems
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