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Sham Ka Pahla Tara

In category

Poetry

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Hindi

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About the book

शुरुआती वक़्त में जब ज़ोहरा निगाह मुशायरों में अपनी ग़ज़लें पढ़तीं तो लोग कहा करते थे कि ये दुबली-पतली लड़की इतनी उम्दा शायरी कैसे कर लेती है, ज़रूर कोई बुज़ुर्ग है जो इसको लिखकर देता होगा; लेकिन बाद में सबने जाना कि उनका सोचना सही नहीं था। छोटी-सी उम्र में मुशायरों में अपनी धाक ज़माने के बाद उन्होंने दूसरा क़दम सामाजिक सच्चाइयों की ख़ुरदरी ज़मीन पर रखा; यहीं से उनकी नज्‍़म की भी शुरुआत होती है जो शायरा की आपबीती और जगबीती के मेल से एक अलग ही रंग लेकर आती है और ‘मुलायम गर्म समझौते की चादर’, ‘कसीदा-ए-बहार’ तथा ‘नया घर' जैसी नज़्में वजूद में आती हैं। ज़ोहरा निगाह आज पाकिस्तान की पहली पंक्ति के शायरों में गिनी जाती हैं; ‘शाम का पहला तारा’ उनकी पहली किताब थी, जिसे भारत और पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सराहा गया था। ज़ोहरा निगाह औरत की ज़बान में दुनिया के बारे में लिखती हैं, फ़ैमिनिस्ट कहा जाना उन्हें उतना पसन्द नहीं है। वे ऐसे किसी वर्गीकरण के हक़ में नहीं हैं। इस किताब में शामिल नज़्में और ग़ज़लें उनकी दृष्टि की व्यापकता और गहराई की गवाह हैं। ‘‘दिल गुज़रगाह है आहिस्ता ख़रामी के लिए तेज़ गामी को जो अपनाओ तो खो जाओगे इक ज़रा देर ही पलकों को झपक लेने दो इस क़दर ग़ौर से देखोगे तो खो जाओगे।’’

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शुरुआती वक़्त में जब ज़ोहरा निगाह मुशायरों में अपनी ग़ज़लें पढ़तीं तो लोग कहा करते थे कि ये दुबली-पतली लड़की इतनी उम्दा शायरी कैसे कर लेती है, ज़रूर कोई बुज़ुर्ग है जो इसको लिखकर देता होगा; लेकिन बाद में सबने जाना कि उनका सोचना सही नहीं था। छोटी-सी उम्र में मुशायरों में अपनी धाक ज़माने के बाद उन्होंने दूसरा क़दम सामाजिक सच्चाइयों की ख़ुरदरी ज़मीन पर रखा; यहीं से उनकी नज्‍़म की भी शुरुआत होती है जो शायरा की आपबीती और जगबीती के मेल से एक अलग ही रंग लेकर आती है और ‘मुलायम गर्म समझौते की चादर’, ‘कसीदा-ए-बहार’ तथा ‘नया घर' जैसी नज़्में वजूद में आती हैं।

ज़ोहरा निगाह आज पाकिस्तान की पहली पंक्ति के शायरों में गिनी जाती हैं; ‘शाम का पहला तारा’ उनकी पहली किताब थी, जिसे भारत और पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सराहा गया था। ज़ोहरा निगाह औरत की ज़बान में दुनिया के बारे में लिखती हैं, फ़ैमिनिस्ट कहा जाना उन्हें उतना पसन्द नहीं है। वे ऐसे किसी वर्गीकरण के हक़ में नहीं हैं। इस किताब में शामिल नज़्में और ग़ज़लें उनकी दृष्टि की व्यापकता और गहराई की गवाह हैं।

‘‘दिल गुज़रगाह है आहिस्ता ख़रामी के लिए

तेज़ गामी को जो अपनाओ तो खो जाओगे

इक ज़रा देर ही पलकों को झपक लेने दो

इस क़दर ग़ौर से देखोगे तो खो जाओगे।’’

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2010
Weight
290 grams
ISBN-13
9788183613378
Pages
131
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22.5 cm
Language
Hindi

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