Pratinidhi Shairy : Meeraji
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Author:
Naresh 'Nadeem', MeerajiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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उर्दू में तरक़्क़ीपसन्द तहरीक (प्रगतिवादी आन्दोलन) के ख़ात्मे से पहले ही उसकी प्रतिक्रियास्वरूप जिस काव्य-सम्प्रदाय ने जड़ें जमाईं, उसे जदीदियत (आधुनिकतावाद) के नाम से जाना जाता है, और कहने की ज़रूरत नहीं कि तरक़्क़ीपसन्द तहरीक दूसरी भारतीय भाषाओं के मुक़ाबिले उर्दू में जितनी मज़बूत थी, उसकी प्रतिक्रिया भी उसी क़दर तीखी हुई। मीराजी को जदीदियत नाम के इसी काव्य-सम्प्रदाय का प्रवर्तक करार दिया जाता है।</p> <p>सच तो यह है कि यौन-क्रियाओं का रस ले-लेकर बयान, कुंठा, पलायन, मृत्यु का महिमामंडन, समाज के महत्त्व को कम दिखाकर व्यक्ति की सत्ता का ऐलान, पुरातन पन्थ, लुकाच के शब्दों में—‘नाकारा विद्रोह’ और ‘छद्म-विद्रोह’ मोहूम और मोहमिल शायरी, और जनता (जदीदियों की शब्दावली में ‘भीड़’) से नफ़रत वग़ैरह जो-जो विशेषताएँ ‘जदीद’ उर्दू शायरी में मौजूद हैं; वे सभी एक छोटे पैमाने पर मीराजी के जीवन और काव्य में भी देखने को मिलती हैं। अपनी नज़्मों में मीराजी ने जिस जीवन-दृष्टि को प्रस्तुत किया है, वह तरक़्क़ीपसन्द तहरीक के मुक़ाबले, उसके ख़िलाफ़ एक वैकल्पिक जीवन-दृष्टि है; वह दुनिया और दुनिया के मसाइल को देखने का एक ख़ालिस जिंसी नज़रिया है, और वह एक ऐसा नज़रिया है जिसे फ़्रायड के उन सिद्धान्तों से बहुत ही बल प्राप्त होता है जिसे बाद के मनोवैज्ञानिकों ने त्याग दिया था।</p> <p>सच बात तो यह है कि मीराजी से लेकर बहुत बाद के शायरों तक, हम यही देखते हैं कि हमारा ‘जदीद’ शायद सामाजिक प्रश्नों को उठाता भी है तो उनकी ओर उसकी दृष्टि तभी जाती है जब उसकी यौन-तृप्ति की इच्छा चूर-चूर हो चुकी होती है, उससे पहले नहीं। सामाजिक और वर्गीय भेदों पर मीराजी के क्लर्क की नज़र इसी दु:ख के कारण जाती है, लेकिन इन भेदों का हल उसके नज़दीक सिर्फ़ यही है कि वह भी एक अफ़सर बन जाए। ज़ाहिर है कि ऐसे किसी नज़रिए में बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के लिए कोई जगह हो नहीं सकती। लेकिन कब तक? एक वक़्त ऐसा भी आता है कि व्यक्ति ज़ेहनी ऐयाशियों से भी परे भाग जाना चाहता है, और इस स्थिति का गवाह मीराजी से बढ़कर भला और कौन हो सकता है।
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उर्दू में तरक़्क़ीपसन्द तहरीक (प्रगतिवादी आन्दोलन) के ख़ात्मे से पहले ही उसकी प्रतिक्रियास्वरूप जिस काव्य-सम्प्रदाय ने जड़ें जमाईं, उसे जदीदियत (आधुनिकतावाद) के नाम से जाना जाता है, और कहने की ज़रूरत नहीं कि तरक़्क़ीपसन्द तहरीक दूसरी भारतीय भाषाओं के मुक़ाबिले उर्दू में जितनी मज़बूत थी, उसकी प्रतिक्रिया भी उसी क़दर तीखी हुई। मीराजी को जदीदियत नाम के इसी काव्य-सम्प्रदाय का प्रवर्तक करार दिया जाता है।</p>
<p>सच तो यह है कि यौन-क्रियाओं का रस ले-लेकर बयान, कुंठा, पलायन, मृत्यु का महिमामंडन, समाज के महत्त्व को कम दिखाकर व्यक्ति की सत्ता का ऐलान, पुरातन पन्थ, लुकाच के शब्दों में—‘नाकारा विद्रोह’ और ‘छद्म-विद्रोह’ मोहूम और मोहमिल शायरी, और जनता (जदीदियों की शब्दावली में ‘भीड़’) से नफ़रत वग़ैरह जो-जो विशेषताएँ ‘जदीद’ उर्दू शायरी में मौजूद हैं; वे सभी एक छोटे पैमाने पर मीराजी के जीवन और काव्य में भी देखने को मिलती हैं। अपनी नज़्मों में मीराजी ने जिस जीवन-दृष्टि को प्रस्तुत किया है, वह तरक़्क़ीपसन्द तहरीक के मुक़ाबले, उसके ख़िलाफ़ एक वैकल्पिक जीवन-दृष्टि है; वह दुनिया और दुनिया के मसाइल को देखने का एक ख़ालिस जिंसी नज़रिया है, और वह एक ऐसा नज़रिया है जिसे फ़्रायड के उन सिद्धान्तों से बहुत ही बल प्राप्त होता है जिसे बाद के मनोवैज्ञानिकों ने त्याग दिया था।</p>
<p>सच बात तो यह है कि मीराजी से लेकर बहुत बाद के शायरों तक, हम यही देखते हैं कि हमारा ‘जदीद’ शायद सामाजिक प्रश्नों को उठाता भी है तो उनकी ओर उसकी दृष्टि तभी जाती है जब उसकी यौन-तृप्ति की इच्छा चूर-चूर हो चुकी होती है, उससे पहले नहीं। सामाजिक और वर्गीय भेदों पर मीराजी के क्लर्क की नज़र इसी दु:ख के कारण जाती है, लेकिन इन भेदों का हल उसके नज़दीक सिर्फ़ यही है कि वह भी एक अफ़सर बन जाए। ज़ाहिर है कि ऐसे किसी नज़रिए में बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के लिए कोई जगह हो नहीं सकती। लेकिन कब तक? एक वक़्त ऐसा भी आता है कि व्यक्ति ज़ेहनी ऐयाशियों से भी परे भाग जाना चाहता है, और इस स्थिति का गवाह मीराजी से बढ़कर भला और कौन हो सकता है।
Book Details
-
ISBN9788183613286
-
Pages211
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Hum Jo Nadiyon Ka Sangam Hein
- Author Name:
Bodhisatwa
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यह संग्रह अपनी कविताओं के तीव्र आवेग, भाव–विविधता एवं वस्तु–बहुलता के कारण महत्त्वपूर्ण माना जाएगा। बोधिसत्व की कविताएँ मानो अनेक नदियों का संगम हैं। लोकगीतों की ऊष्मा तथा रागात्मकता, वर्तमान जीवन के ‘दुख–तंत्र’ की कठोर प्रतीति और वैचारिक दृढ़ता एवं प्रतिरोध—इन सबके संयोग से ये कविताएँ हमारे लिए एक वैकल्पिक पाठ की सृष्टि करती हैं। ‘हाहाकार के बीच से गुज़रती’ इन कविताओं में दर्ज हैं ‘बेनूर आँखों के ख़्वाब’, ‘सिले होंठों की मुस्कुराहट’ और ‘बँधे हाथों की छटपटाहट’। लोकगीत और बोलियों की शक्ति का उपयोग, जिसके लिए बोधिसत्व की आरम्भिक कविताएँ चिह्नित की गई थीं, उनका अद्यतन रूप यहाँ मिलता है, कुछ ज्वाया और सख़्त।
इनमें बेचैन कर देनेवाली ऐन्द्रिकता है—‘ताज़े आटे की गर्मी थी उसकी ख़ुशी/वसन्त उसके लिए अब उखड़े नाखून की तरह है’। एक विरल करुणा और क्रोध। इनमें जीवन के प्रति समर्थन और लालसा है जैसे कि ‘ऐसा ही होता है’ कविता में, जो साधारण मनुष्य के दैनंदिन प्रेम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। ‘गंध’ शीर्षक कविता स्वयं बोधिसत्व की कविताओं में अलग से उल्लेखनीय है। यह एक बड़ी कविता है, हमारे जीवन की दारुण विपत्ति, विडम्बना एवं निजी और सामाजिक के सीमा–प्रदेश पर निरन्तर विद्यमान द्वन्द्व की कविता।
एक बात और—ये कविताएँ गहरे राजनैतिक आशय एवं नैतिक संकल्प की कविताएँ हैं। बोधिसत्व का ही शब्द लेकर कहें तो यह वह कविता है ‘जो समाज के हारे–गाढ़े काम दे’।
—अरुण कमल
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है।
काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Tokri Mein Digant
- Author Name:
Anamika
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अनामिका के नए संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त—थेरी गाथा : 2014’ को पूरा पढ़ जाने के बाद मेरे मन पर जो पहला प्रभाव पड़ा, वो यह कि यह पूरी काव्य-कृति एक लम्बी कविता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे दृश्य, प्रसंग और थेरियों के रूपक में लिपटी हुई हमारे समय की सामान्य स्त्रियाँ आती हैं। संग्रह के नाम में 2014 का जो तिथि-संकेत दिया गया है, मुझे लगता है कि पूरे संग्रह का बलाघात थेरी गाथा के बजाय इस समय-सन्दर्भ पर ही है। संग्रह के शुरू में एक छोटी-सी भूमिका है, जिसे कविताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए। बुद्ध अनेक कविताओं के केन्द्र में हैं, जो बार-बार प्रश्नांकित भी होते हैं और बेशक एक रोशनी के रूप में स्वीकार्य भी। इस नए संकलन में अनेक उद्धरणीय काव्यांश या पंक्तियाँ मिल सकती हैं, जो पाठक के मन में टिकी रह जाती हैं।
बिना किसी तार्किक संयोजन के यह पूरा संग्रह एक ऐसे काव्य-फलक की तरह है, जिसके अन्त को खुला छोड़ दिया गया है। स्वयं इसकी रचयिता के अनुसार “वर्तमान और अतीत, इतिहास और किंवदन्तियाँ, कल्पना और यथार्थ यहाँ साथ-साथ घुमरी परैया-सा नाचते दीख सकते हैं।” आज के स्त्री-लेखन की सुपरिचित धारा से अलग यह एक नई कल्पनात्मक सृष्टि है, जो अपनी पंक्तियों को पाठक पर बलात् थोपने के बजाय उससे बोलती-बतियाती है, और ऐसा करते हुए वह चुपके से अपना आशय भी उसकी स्मृति में दर्ज करा देती है। शायद यह एक नई काव्य-विधा है, जिसकी ओर काव्य-प्रेमियों का ध्यान जाएगा। समकालीन कविता के एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि यह काव्य-कृति एक नई काव्य-भाषा की प्रस्तावना है, जो व्यंजना के कई बन्द पड़े दरवाज़ों को खोलती है और यह सब कुछ घटित होता है एक स्थानीय केन्द्र के चारों ओर। कविता की जानी-पहचानी दुनिया में यह सबाल्टर्न भावबोध का हस्तक्षेप है, जो अलक्षित नहीं जाएगा।
—केदारनाथ सिंह
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