Antas Ki Khurchan
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‘<span lang="HI">यतीश कुमार की कविताओं को मैंने पढ़ा। अच्छी रचना से मुझे सार्वजनिकता मिलती है। मैं कुछ और सार्वजनिक हुआ</span>, <span lang="HI">कुछ और बाहर हुआ</span>, <span lang="HI">कुछ अन्य से मिला</span>, <span lang="HI">उनके साथ हुआ और उनके साथ चला।</span>’<br />—<span lang="HI">विनोद कुमार शुक्ल</span><br /><span lang="HI">यतीश की कविता का कुनबा काफ़ी बड़ा है</span>, <span lang="HI">जिसमें आवाँ जितने पात्र भरे पड़े हैं। इनका वैविध्य उनकी संवेदना की परिधि को कहीं व्यापक बनाता है तो कहीं भरमाता है। इस विचलन को हुनर में बदल देने की सम्भावना और भरपूर क्षमता उनके कवित्व में मौजूद है</span>, <span lang="HI">जिसका प्रमाण हैं इस संकलन की कविताएँ।</span><br />—<span lang="HI">अष्टभुजा शुक्ल</span>
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‘<span lang="HI">यतीश कुमार की कविताओं को मैंने पढ़ा। अच्छी रचना से मुझे सार्वजनिकता मिलती है। मैं कुछ और सार्वजनिक हुआ</span>, <span lang="HI">कुछ और बाहर हुआ</span>, <span lang="HI">कुछ अन्य से मिला</span>, <span lang="HI">उनके साथ हुआ और उनके साथ चला।</span>’<br />—<span lang="HI">विनोद कुमार शुक्ल</span><br /><span lang="HI">यतीश की कविता का कुनबा काफ़ी बड़ा है</span>, <span lang="HI">जिसमें आवाँ जितने पात्र भरे पड़े हैं। इनका वैविध्य उनकी संवेदना की परिधि को कहीं व्यापक बनाता है तो कहीं भरमाता है। इस विचलन को हुनर में बदल देने की सम्भावना और भरपूर क्षमता उनके कवित्व में मौजूद है</span>, <span lang="HI">जिसका प्रमाण हैं इस संकलन की कविताएँ।</span><br />—<span lang="HI">अष्टभुजा शुक्ल</span>
Book Details
-
ISBN9789391950057
-
Pages190
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
‘जीवन ऐसा हो’ राजेश माहेश्वरी का महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह है। इस संग्रह की कविताएँ पढ़कर स्पष्ट होता है कि राजेश माहेश्वरी जीवन के विशाल उपवन से अनुभवों के फूल और शूल संचित करते रहे हैं। फूल की सुरभि और शूल की चुभन इन कविताओं में सहज रूप से समाहित है। लक्ष्य है, हृदय को भावना-सम्पन्न और बुद्धि को विवेक-सम्मत बनाना।
कवि जब समाज में व्याप्त कदाचार, अन्याय और आलस्य देखता है तो उसकी कविता में दु:ख, आक्रोश और व्यंग्य घुल जाता है। वह कह उठता है—‘ग़रीब और शोषित जहाँ था/वहीं रहकर/आज भी शोषित है/और क्रान्ति की प्रतीक्षा में/प्रतिदिन ढह रहा है।’
उदात्त मानवतावाद ही राजेश माहेश्वरी का लक्ष्य है।
इन कविताओं में आस्था और विश्वास का बहुरंगी संसार है। अध्यात्म की धूपछाँह है। उद्देश्य यही है कि जीवन तुच्छताओं से मुक्त हो और परम गन्तव्य तक पहुँचे। मंगलकामना की शैली में कवि कह उठता है—
‘‘सागर से गहरी हो
प्रेम व त्याग की प्यास।
श्रम व कर्म के प्रति
हो हमारा समर्पण।।’’
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