Pahar Yeh Bephar Ka
Author:
Tushar DhawalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 160
₹
200
Unavailable
तुषार धवल की कविताओं का भूगोल काफ़ी विस्तृत है और बीहड़ भी। समकालीन<br />समाज अनेक रूपों, अनेक छवियों में अपनी तमाम जटिलताओं के साथ उनकी कविताओं में मौजूद<br />दिखाई देता है। उनकी कविता तेज़ी से बदल रहे परिवेश से उलझती-झगड़ती कविता है। आज के दौर<br />में पूँजी और तकनीक के मेल से मानव जीवन, स्वभाव और समाज बुनियादी बदलाव के दूरगामी<br />प्रभावों के सामने अकबकाया खड़ा है। जिस गति से ये बदलाव आज हो रहे हैं इतिहास में पहले कभी<br />नहीं हुए। कवि अपनी परख, संवेदना और समझ से इसी तेज़ी से बदल रहे अपने विश्व को समझना<br />चाह रहा है। सरोकार का यह बदलता सन्दर्भ उनकी कविताओं को पिछले दशकों के कवियों से यहीं<br />अलग कर देता है। ‘धूप में/सूखती अँतड़ियों के बीच/चल रहा हूँ/अपनी ज़मीन के लिए/हाथ में उठाए/<br />तुम्हारी जूठन का प्रसाद’। उनकी कविताओं में विस्थापन का दंश है, संघर्ष का वैभव है, रिश्तों में<br />बढ़ती अजनबीयत है, शहरों का बदलता परिदृश्य है, उदारीकरण के बाद नया बनता समाज है।<br />अकारण नहीं है कि उनकी कविताओं में कभी मोबाइल खो जाता है तो कभी एसएमएस करती लड़की<br />दिखाई दे जाती है। तो कभी दबाव में जी रहे आज के मनुष्य की मानसिक स्थिति ‘नींद में<br />चलता/सपने में बड़बड़ाता/मैं आदमी हूँ नई सदी का’ जैसी पंक्तियों से प्रकट होती है। वैसे तो ‘पहर<br />यह बेपहर का’ तुषार का पहला ही कविता-संग्रह है मगर उनका काव्य-मुहावरा प्रचलित समकालीन<br />काव्य-मुहावरों से नितान्त भिन्न है। आज हिन्दी कविता में जिस तरह की चीख़-पुकार, जिस तरह<br />का हाहाकार व्याप्त है, उसमें समकालीन कवियों की अपनी विशिष्टता कम ही लक्षित हो पाती है।<br />इसके विपरीत तुषार धवल की कविताओं में मितकथन की शैली अपनाई गई है। सादाबयानी और<br />मितकथन के मेल से उनकी कविताओं का मुहावरा तैयार होता है। उनकी कविताओं में केवल<br />बौद्धिकता नहीं है सहज रागात्मकता भी है। रागात्मकता जीवन-जगत के प्रति, निजी रिश्तों के प्रति।<br />‘चालीस साल कंधों पर/कारख़ाना उठाए/अब सो रहे हैं पिता/उनके सपने में आए हैं हाल पूछने/उनके<br />पिता’—केवल सम्बन्धों की परम्परा ही नहीं उनकी कविताओं में हिन्दी की कविता-परम्परा की अनुगूँजें<br />भी साफ़ सुनाई देती हैं। तुषार की कविताओं में अकविता का आवेश है तो नई कविता सी<br />प्रश्नाकुलता भी है। ‘पहर यह बेपहर का’ की कविताएँ बताती हैं कि यह नया कवि वास्तव में कितना<br />सिद्धहस्त है।
ISBN: 9788126716838
Pages: 159
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Book Type:

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Description:
दूधनाथ सिंह जीवन और शब्द के पारखी रचनाकार हैं। उपन्यास, कहानी, नाटक, कविता, आलोचना व संस्मरण विधाओं में व्याप्त उनके रचना-संसार से गुज़रते हुए अनुभव किया जा सकता है कि अर्थ की सहज स्वीकृतियाँ अपना चोला बदल रही हैं।
‘तुम्हारे लिए’ दूधनाथ सिंह की 71 प्रेम कविताओं का संग्रह है। प्रेम के अन्त:करण का आयतन यहाँ विस्तृत हुआ है। इनमें जीवन को साक्षी भाव से देखने की उत्सुकता है। तथ्य निर्भार हो गए हैं और वृत्तान्त विलुप्त। निराला ने लिखा था, ‘मौन मधु हो जाय/भाषा मूकता की आड़ में मन सरलता की बाढ़ में जल बिन्दु सा बह जाय।’ जीवन के पार जाकर जीवन की धारा में बहने और उसे कहने का गुण ‘तुम्हारे लिए’ संग्रह की सर्वोपरि विशेषता है।
प्रेम की परिधि में यदि जीवन है तो मृत्यु भी...जाने की उदासी है तो लौटने की उत्कंठा भी...क्षण की उपस्थिति है तो समयातीत से संवाद भी—‘अभी देखा/फिर/युगों के कठिन दुस्तर आवरण के पार तुमको अभी देखा।’ उल्लेखनीय यह है कि ये कविताएँ दूधनाथ सिंह के परिचित मुहावरे से विलग हैं। कई बार इन्हें पढ़ते हुए लगता है कि अपार अकेलेपन में अस्तित्व की पदचाप सुनाई पड़ रही है। ‘स्त्री’ इन कविताओं में कई तरह से आती है...और हर बार अनूठेपन के साथ।
इन कविताओं में शिल्प के कुछ ख़ास प्रयोग हैं जो शब्दों और पंक्तियों के बीच भावबोध के लिए थोड़ी अनन्य जगह बनाते हैं। ‘तुम्हारे लिए’ में मौलिकता की सुखद छवियाँ हैं :
‘वह जो जीवन मैंने देखा
किसने
देखा!
वह जो सुख-दु:ख मैंने पाया
तुमने
पाया?'
Dararon Mein Ugi Doob
- Author Name:
Chitra Desai
- Book Type:

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Description:
छोटी और कुछ बहुत ही छोटी इन कविताओं का उत्स जीवन के हाशियों पर दूब की तरह उगते, पलते और झड़ जाते दु:खों के भीतर है—इसका अहसास आपको एक-एक कविता से गुज़रते हुए धीरे-धीरे होता है। धीरे-धीरे आप जानने लगते हैं कि किस कविता की किस पंक्ति में दरअसल कितनी बड़ी एक टीस को छिपाकर गूँथ दिया गया है।
'घर की उम्र के लिए/एक पूरा आदमी/टुकड़े-टुकड़े बँटकर/थामता है/हर कोना/...घर की उम्र के लिए/बिखर कर मर जाता है/एक पूरा आदमी।’ घर यहाँ दरअसल एक व्यवस्था का, एक स्थिर सुरक्षा का और सरल शब्दों में कहें तो उस दुनियादारी का प्रतीक है, जिसकी तरफ़ एक व्यक्ति जीवन-भर खिंचकर आता है तो उतने ही वेग से उससे दूर भी जाता है। भीतर और बाहर की इसी खींचतान के अलग-अलग बिन्दुओं से उपजी बेचैन मगर बहुत गहरे में हमें अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति का शान्त आधार उपलब्ध करानेवाली ये कविताएँ इसी अर्थ में विशिष्ट हैं कि ये हमें अपनी सादगी से अपने बहुत नज़दीक बुलाकर हमारा दु:ख सोखती हैं। भाव-बोध के आधार पर संग्रह की कविताओं को चार खंडों में समायोजित किया गया है। पहला है 'पगडंडी’ जिसमें ग्रामीण जीवन और परिवेश में बसे, बनते-बिगड़ते-बदलते रिश्तों और रूपाकारों को सहेजने-समेटने की संवेदन-यात्रा समाहित है। दूसरे खंड 'अलाव’ में अपने अस्तित्व के इर्द-गिर्द बुनी आँच और उसकी लपटों को पकडऩे, चित्रित करने की बारीक लेकिन सुदृढ़ बुनाई है। 'आरोह-अवरोह’ में घर, रिश्तों और कचहरी में फैले आहत तन्तुओं को गहरी-तीखी रंगत में उकेरा गया है। और, चौथे खंड 'मध्यान्तर के बाद’ में पुन: जीवन की जड़ों को खोलकर- खोदकर देखने की कोशिश की गई है जो हमारी सवंदेना-यात्रा को वापस जीवन में आरम्भ से जोड़ देती है।
'पत्थरों को संवेदना देती है/उनकी दरारों में दबी मिट्टी/जहाँ उग आती है दूब/चट्टानों के अस्तित्व को ललकारती।’ ये कविताएँ दरअसल जीवन की कठोर, पथरीली चट्टानों के बीच बची मिट्टी में उगी कविताएँ हैं; जिनमें हम अपने दग्ध वजूद को कुछ देर भीनी-भीनी ठंडक से भर सकते हैं।
Katauti
- Author Name:
Nilay Upadhayaya
- Book Type:

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Description:
निलय उपाध्याय का कविता–संग्रह ‘कटौती’ आज लिखी जा रही कविता के समूचे परिदृश्य में एक नई काव्य–सम्भावना से भरपूर किसी महत्त्वपूर्ण दिशासूचक, सृजनात्मक परिघटना की तरह उपस्थित है। पिछले कुछ वर्षों से महत्त्वपूर्ण हो उठे महानगर के काव्य–वर्चस्व को एक नितान्त वरिष्ठ काव्य–सामर्थ्य और भिन्न काव्य–संरचना के माध्यम से चुनौती देती ये कविताएँ हमें अनुभवों के उस दैनिक संसार में सीधे ले जाकर खड़ा करती हैं, जहाँ ध्वंस और निर्माण, विनाश और संरक्षण, हिंसा और करुणा के अब तक कविता में अनुपस्थित अनेक रूप अपनी समूची गतिमयता, टकराहटों, विकट अन्तर्द्वन्द्वों और अलक्षित आयामों के साथ उपस्थित हैं।
‘कटौती’ की ये कविताएँ हम तक हमारे अपने समय के उस वर्तमान की दुर्लभ और अलभ्य सूचनाओं को पहुँचाकर एक साथ स्तब्ध और सचेत करने का कठिन प्रयत्न करती हैं, जिस वर्तमान को इसी दौर की अन्य कविताएँ या तो अतीत की तरह देखने की आदी हो चुकी हैं, या फिर उसे ‘लोक अनुभव’ मानकर स्वयं उस महानगरी ‘फोक’ ग्रन्थि का उदाहरण बन जाती हैं, जो एक तरफ़ सरलतावादी प्रगीतात्मकता और दूसरी तरफ़ ‘प्रकृतिवादी’ नॉस्टेल्जिया के प्रचलित विन्यासों और सर्व–स्वीकृत काव्योक्तियों में पिछले लम्बे अरसे से अपरिचित होकर भी सम्मानित बनी हुई है। निलय उपाध्याय की ये कविताएँ एक अद्भुत निस्संगता, निस्पृहता, रचनात्मक कौशल और विरल तल्लीनता के साथ, एक नई और सहजात काव्याभिव्यक्ति के द्वारा इस ‘सम्मानित’ को चुपचाप अपदस्थ करती हैं।
Chalo Laut Chalen
- Author Name:
Anand Pachauri
- Book Type:

- Description: This book has no description
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