O Mere ManMeeta
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बा हर-बाहर भरा-भरा है अंतर्घट है रीता। अंबर का सूनापन दिल में, ओ मेरे मन-मीता। नेह सलौना नहीं जानता क्या हारा क्या जीता। प्रीति की कोई रीति न होती ओ मेरे मन-मीता। तेरी सूरत मेरी आँखें, कितने सपन सँजोए बीता हर अभिलाष तुम्हीं तक संचित ओ मेरे मन-मीता। एक बूँद का प्यासा चातक कब से तरल गरल रस पीता कब बरसे मन-भावन सावन ओ मेरे मन-मीता।
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बा हर-बाहर भरा-भरा है
अंतर्घट है रीता।
अंबर का सूनापन दिल में,
ओ मेरे मन-मीता।
नेह सलौना नहीं जानता
क्या हारा क्या जीता।
प्रीति की कोई रीति न होती
ओ मेरे मन-मीता।
तेरी सूरत मेरी आँखें,
कितने सपन सँजोए बीता
हर अभिलाष तुम्हीं तक संचित
ओ मेरे मन-मीता।
एक बूँद का प्यासा चातक
कब से तरल गरल रस पीता
कब बरसे मन-भावन सावन
ओ मेरे मन-मीता।
Book Details
-
ISBN9789392012112
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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