Thami Hui Barish Mein Dophar
Author:
Savita BhargavPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
अग्रणी हिन्दी कवि सविता भार्गव का नया संग्रह ‘थमी हुई बारिश में दोपहर’ स्त्री-कविता के क्षेत्र में ही नहीं वरन् समकालीन भारतीय कविता के क्षेत्र में भी एक नया प्रस्थान माना जा सकता है। स्त्री-जीवन के अनेकानेक अनदेखे, अनछुए प्रसंगों, अनुभवों और जटिलताओं से समृद्ध यह संग्रह अपने ताप, ताज़गी और त्वरा के लिए एक विलक्षण संग्रह के रूप में स्थापित होगा। प्रेम, दाम्पत्य, कुटुम्ब, समाज और राजनीति सब मिलकर एक नया रसायन बनाते हैं। बिना किसी दुराव के, बिल्कुल अकुंठ भाव से कवि ने अनेक तरह के सम्बन्धों का उद्घाटन किया है। और ये सम्बन्ध इकहरे नहीं हैं। एक आरम्भिक कविता में सविता भार्गव कहती हैं : ‘तुम कल्पना करो/मैं तुम्हारी नई प्रेमिका हूँ/और रच डालो/शमशान तक पहुँचने के/सारे दृश्य’।<br>यहाँ ‘शमशान’ का हठात् प्रयोग इस कविता को स्त्री-पुरुष सम्बन्धों से परे एक वृहत्तर अर्थ देता है। प्रेम की ऐसी कविताएँ न तो देह पर रुकती हैं न देह का लोप करती हैं, बल्कि देह और जीवन की अन्तिम परिणति तक ले जाती हैं। ‘मैं जाग रही हूँ किसके लिए’ सरीखी कविताओं में भी इसे देखा जा सकता है। इसके दूसरे छोर पर ‘इस्तरी करती स्त्री’ को रखा जा सकता है जहाँ एक स्त्री- देह की स्वायत्तता व्यक्त होती है। इसके बरअक्स ‘अविराम घूमती पृथ्वी की तरह’ स्त्री-पुरुष के योग को तलाशती एक अद्भुत कविता है। पूरा संग्रह ऐसी कविताओं का अक्षय-कोश है।<br>लेकिन जिन कविताओं को समकालीन हिन्दी कविता की उपलब्धि कहा जा सकता है वे हैं ‘अनुभव’, ‘यौवन बीत गया’ और ‘माँ वापस जा रही है’।<br>सिनेमा का सीन करते हुए/थोड़ी सी झिझक से/कैमरे के सामने खड़ी होती हूँ/क्योंकि कैमरा पूरा समाज है/और मैं अकेली स्त्री हूँ/पसीना पोंछते और मेकअप धोते हुए/मैं शामिल हो जाती हूँ/समाज में। (अनुभव)<br>कुछ दिन बेटी के घर में रहने के बाद माँ वापस जा रही है और बेटी के ‘भीतर कुहरा बैठ रहा है’। यह एक अविस्मरणीय मार्मिक कविता है जो केवल एक स्त्री की लेखनी ही रच सकती थी। लेकिन जिस कविता ने मुझे रोक लिया वो है ‘यौवन बीत गया’। शायद ऐसी कविता पहले नहीं लिखी गयी समकालीन भारतीय साहित्य में।<br>खेल जो मैंने खेले/लगते आज वे कितने अधूरे/डूबा दिन/रातें रहीं नहीं चाँदनी/बारिश बीती/चींटियाँ खोद रहीं/फिर से मिट्टी/मेरी मिट्टी होती/चींटियों जैसी<br>यह संग्रह अपने सर्वथा नए बिम्बों, लयों और भावों के लिए समादृत होगा। ‘मेरे होंठ की फाँक जैसा टेढ़ा चाँद’ कितना नया बिम्ब है ! ‘थमी हुई बारिश में दोपहर’ अपने आप में जीवन के द्वन्द्व और द्विगु का विलक्षण रूपक है।<br>—अरुण कमल
ISBN: 9788119835577
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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जीवन और कविता की उदात्तता को कुमार अंबुज बार-बार रचते हैं, प्राय: उसका एक नया स्थापत्य बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन इतना-भर इस कविता का अभीष्ट नहीं है, बल्कि एक महाविमर्श के छोटे-छोटे ब्योरों, उसके बारीक ताने-बाने में प्रवेश करते हुए उसके अर्थों को खोजना ही उसकी मूल प्रतिज्ञा है और इसीलिए अंबुज यह देख पाते हैं कि ‘एक तारा टूटने से भी वीरान होता है आकाश’ और ‘इस एक के लिए/इस एक के विश्वास से/लड़ता हूँ हज़ारों से/इस एक की परवाह करता हूँ।’ एक महाजीवन के इसी ‘एक’ को लेकर कुमार अंबुज के सरोकार इतने व्यापक हैं कि वे ‘अभी-अभी दर्ज हुई एक नई ऋतु’ को ‘एक कीड़े के अपूर्व राग में गाते हुए’ सुन पाते हैं और यह संकल्प भी व्यक्त कर सकते हैं कि ‘यह एक कमज़ोर इच्छा है जिसकी चहलक़दमी की आवाज़/एक तानाशाह की इच्छा की आवाज़ से टकराती है।’ दरअसल इस एक का हालचाल जानने की तड़प ही कुमार अंबुज को अनेकता के सौरमंडल तक ले जाती है। अनेक कविताओं में वे जीवन का एक रूपक खड़ा करते प्रतीत होते हैं लेकिन सहसा उस रूपक को भेदकर उसके दारुण यथार्थ में प्रवेश कर जाते हैं।
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‘इन दिनों’ संग्रह कुँवर नारायण के विशद काव्य-संसार में ले जाता है। भाषा और विषय की विविधता अब तक उनकी कविताओं के विशेष गुण माने जा चुके हैं। स्थानों और समयों को लेकर ये कविताएँ अपनी एक उन्मुक्त दुनिया रचती हैं जिनमें अनवरत जीवन की खुली आवाजाही है। इनमें टूटने का दर्द भी है, और उसे बनाने का उत्साह भी। इनमें यथार्थ की पक्की पकड़ है, उसका खुरदुरा स्पर्श, साथ ही उसका सहज सौन्दर्य भी। जीवन और विचारों से जूझती ये कविताएँ उस सन्धिरेखा पर अपने को सम्भव बनाती हैं जो एक दूसरे का निषेध नहीं, गहरी मानवीय संवेदनाओं का आधार है। राजनीतिक और सामाजिक विकृतियों और अराजकता के समय ये कविताएँ समस्याओं से वाबस्तगी को पूरी ज़िम्मेदारी से प्रतिबिम्बित करती हैं। कभी आयरनी, कभी हमदर्दी के स्वर में वे मनुष्य की सबसे संवेदनशील प्रतिक्रियाओं को जगाती हैं।
कुँवर नारायण की कविताओं में सीधी घोषणाएँ और फ़ैसले नहीं हैं, जीवन की बहुतरफ़ा समझ का वह धीरज है जो एक प्रौढ़ जीवन-विवेक और दृढ़ नैतिक चेतना से बनता है। समाज, राजनीति, व्यवसायीकरण आदि को लेकर उनकी कविताओं में दूरन्देशी फ़िक्र है जो लोक-जीवन के व्यापक हितों को केन्द्र में रखकर सोचती है—आज के मनुष्य की पीड़ा और जिजीविषा के साथ सार्थक संवाद स्थापित करने की कोशिश करती है। क्लासिकल अनुशासन में रहते हुए भी ये कविताएँ आदमी के बुनियादी आवेगों को भी इस तरह व्यक्त करती हैं कि एक सतर्क पाठक उनके साथ आसानी से एकात्म हो सकता है। कई जगह मिथकीय और ऐतिहासिक सन्दर्भों द्वारा कवि वर्तमान में हमारे यथार्थ-बोध को अधिक विस्तृत, गहरा और विवेकी बनाता है। ये कविताएँ आपका परिचय हिन्दी के उस अप्रतिम कवि से कराएँगी जिसकी ‘चक्रव्यूह’, ‘आत्मजयी’, ’अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’ जैसी कृतियाँ हिन्दी साहित्य की मूल्यवान धरोहर बन चुकी हैं।
Har Subah Taza Gulab
- Author Name:
Gulab Khandelwal
- Book Type:

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ग़ज़ल एक छन्द मात्र नहीं है। यह अभिव्यक्ति की एक अत्यन्त नाजुक विधा है जिसमें सपाटबयानी नहीं चलती। गुलाब खंडेलवाल का यह ग़ज़ल संग्रह ग़ज़ल की इस क्षमता को नए और पुराने के बीच सन्तुलन क़ायम रखते हुए नए सिरे से सिद्ध करता है।
गुलाब जी ने ग़ज़ल की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश की है और उनकी ग़ज़लों ने भी कवि और सहृदय, साहित्य और संगीत तथा हिन्दी और उर्दू के बीच की दूरी को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
प्रस्तुत ग़ज़लों में उर्दू की अभिव्यक्ति-भंगिमा के साथ हिन्दी कविता की रसदृष्टि और बिम्ब विधायकता का दुर्लभ संयोग देखने को मिलता है। उर्दू कविता के ठेठ पुराने माहौल और उसके अधिकांश रूढ़ प्रतीकों को छोड़कर परम्परित ग़ज़ल को उसके कृत्रिम परिवेश से निकालकर जीवन की सहज भावभूमि पर खड़ा करने का प्रयास इन ग़ज़लों में सहज ही दिखता है।
मन की मार्मिक अनुभूतियों के साथ-साथ अपने समय-समाज की तीखी चुनौतियों को स्वर देनेवाली ये ग़ज़लें अपनी गेयता और उद्धरणशीलता के कारण भी ध्यान खींचती हैं। जो पाठक इन्हें कवि के भावाकुल क्षणों की वाणी मानकर पढ़ेगा, उसे अपने हृदय की निगूढ़ झंकार इनमें सुनाई पड़ेगी।
Rashmimala
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Ek Ladka Milane Aata Hai
- Author Name:
Sanjay Kumar 'Kundan'
- Book Type:

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संजय कुमार ‘कुन्दन’ की शायरी किसी भी रूप में जब मेरे सामने आई तो मुझे यह समझने में बड़ी दुश्वारी हुई कि वे शायरी के हवाले से दिल पर बीतनेवाली वारदात का ज़िक्र कर रहे हैं या ये तमाम वारदातें तहरीर की शक्ल में संजय कुमार ‘कुन्दन’ को ख़ुद लिख रही हैं। ये वो सच्ची शायरी है जिसे समझने के लिए आपको दिल के आँगन में उतरना नहीं पड़ता, बल्कि दिल की पहली सतह पर ये अपनी जगह बनाती हैं, जबकि अपनी शायरी के ऐब को छुपाने के लिए लोग तरह-तरह के रंगो-रोग़न का इस्तेमाल करते हैं। चाहे ‘एक लड़का मिलने आता है...’, ‘उसको भी डर है’, ‘ख़याल कोई क़र्ज़ है’ हो या ‘तस्वीर’ ऐसा लगता है जैसे उन्होंने शब्दों के सहारे उन तमाम कैफ़ियतों की तस्वीर पेश कर दी है जहाँ बड़े-बड़े चित्रकार नाकाम होने पर उसे ऐब्सट्रैक्ट आर्ट का नाम दे दिया करते हैं। और शायरी इतनी आसान, इतनी सहज लेकिन दिल को काट देनेवाली है कि इसकी चुभन को हम भुला नहीं पाते।
‘एक लड़का मिलने आता है...’ में ‘नींद की बदगुमानी’, ‘हाथों में लम्स की ठंडक’, ‘शाम की ख़ुशबू’, ‘खिलखिलाहट का बचपन’, ‘रोशनी की धड़कन पर सियाही का ख़ौफ़नाक हमला’ और ‘लरज़ते काँपते क़दमों की आहट’ ही नहीं है, बल्कि ‘महीन खद्दरों में क़ैद बड़े-बड़े तोंद की क़लम से लिखी कहानियों को जलाकर ख़ाक कर देने’ का अज़्म, ‘कारख़ाने के वहशी तगो-दौ में राख में दबी हुई आग की किरचियों को कुदेरने’ की मशक़्क्त और ‘कितने शहरों, कितने बाग़ों, कितनी मिट्टी से होकर गुज़रने वाले आवारा लम्हों’ का कर्ब भी शामिल है। ऐसा महसूस होता है शायरी संजय कुमार ‘कुन्दन’ की महबूबा है जिसने ज़िन्दगी के इस लम्बे, वीरान और डगमगाते हुए क़दमों पर उसे और उसके पढ़नेवालों को सहारा दिया है। मुस्तकिल तरक़्क़ी की मंज़िलों को तय कर रही इस शायरी की नज़र एक शेर :
‘न थक के बैठ कि तेरी उड़ान बाक़ी
है ज़मीन ख़त्म हुई, आस्मान बाक़ी है।’
—शानुर्रहमान
Prakritik Sundartam Hastakshar
- Author Name:
Meena Jha
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- Description: Collection of Maithili Poems
Jia Jugati Ke Rang
- Author Name:
Sidharth
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अनहद, अनसुनी आवाज़ें जो कि सिख रहस्यवाद का अभिन्न हिस्सा हैं, वे बौद्ध तांत्रिकता, स्कैंडिनेवियाई मिथक और अजान की आवाज़ से काफ़ी मेल खाती हैं। पंजाबी
से किए गए ज़ोरदार अनुवाद में मूल भाषा के ओज को बरकरार रखा गया है। शब्दों और छवियों, मिथक और अनुभवजन्य विवेक, सुने और अनसुने गीतों के मेल से एक सशक्त कविता प्रस्तुत होती है, जो पाठक को एक गहन तथा ज्योतिर्मय परिदृश्य की यात्रा कराती है।
—नमिता गोखले
Vah Ladki Jo Motorcycle Chalati Hai
- Author Name:
Anant Bhatnagar
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- Description: पुरातन की स्मृति और अभाव अक्सर ही कविताओं के प्रेरक कारक होते हैं, या तो हम किसी बीते क्षण को कविता में सम्बोधित करते हैं या फिर किसी भविष्य की कामना हमें कविता में सोचने को प्रेरित करती है। लेकिन इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ वर्तमान को सम्बोधित हैं और आधुनिक सभ्यता के कुछ नए उपादानों को समझने की कोशिश करती हैं; मसलन—‘मोबाइल फ़ोन’, ‘बाज़ार’, ‘सेज के नाम से जाने जानेवाले विशेष आर्थिक क्षेत्र’ और ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’। >इस नई दुनिया को कवि बिना किसी पूर्वग्रह के एकदम ताज़ा निगाह से देखता और समझता है और पाठक को भी अपनी यात्रा में शामिल करता चलता है—‘क्या/आप नहीं चौंके थे/उस दिन/जब आपने/पहली बार किसी/एक लड़की को/मोटरसाइकिल चलाते/हुए देखा था?’ यह दृश्य कवि को एक नए युग का आरम्भ लगता है, लेकिन इसके भविष्य को लेकर उसे कुछ शंका भी है—‘क्या शादी के बाद भी/चला पाएगी वह मोटरसाइकिल/...क्या/वह आगे बैठी होगी/और पति/होगा/पीछे सवार?’ संग्रह का दूसरा खंड ‘उम्र का चालीसवाँ’ बढ़ती आयु के अहसास की कविताओं का है जिसके विषय में ख़ुद कवि का कहना है कि ‘उम्र के इस संक्रमण काल में रचित ये कविताएँ नितान्त निजी जीवन से लेकर सामाजिक स्तर तक बदलते रिश्तों के प्रति प्रतिक्रिया हैं। इन कविताओं में कई विशुद्ध हास्यबोध की रचनाएँ भी हैं, जिन्हें संग्रह में सम्मिलित करने के पीछे मेरी सोच यह है कि हास्य को केवल मंचीय जुमलेबाज़ी के लिए छोड़ देना हास्यबोध के साथ अन्याय है।’ संक्षिप्त मुहावरे में रची ये कविताएँ हिन्दी कविता-प्रेमियों को निश्चय ही पसन्द आएँगी।
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