Lifafe Mein Kavita
(0)
₹
400
320 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
This Book Doesn't have Description
Read moreAbout the Book
This Book Doesn't have Description
Book Details
-
ISBN9789392012044
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Matdan Kendra Par Jhapaki
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
ये कविताएँ एक कवि का पक्ष रखती हैं जिसे केदार जी इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में आकर पक्षहीन हो चुके हम लोगों को सौंप रहे हैं। ये कविताएँ हिंसा के विशाल परदे के आगे एक मनुष्य का हिंसक होने से इनकार हैं—देखने में बहुत विनम्र, विनीत, लेकिन चट्टान-सा सख़्त, दृढ़ और निर्णायक।
ज़रूरी नहीं कि उनकी सूची में हमारा नाम हो ही, जिनका नाम किसी सूची में नहीं, उनकी भी एक दुनिया है, जिसका नेतृत्व पेड़ करते हैं, और आपस में टकराते सत्ता के काले-पीले-सफ़ेद नारों के बरक्स जिसके पास पृथ्वी के सबसे सटीक और सबसे सुन्दर नारे हैं। वे नारे जो नदियों को उनका पानी, चींटियों को उनके बिल और आँखों को उनकी झपकी लौटा देने की पैरवी कर रहे हैं। इस संग्रह को पढ़ते हुए हमें इन रवहीन नारों की ताक़त का अहसास होता है।
केदार जी अब हमारे बीच नहीं हैं, उनकी कविताओं का यह संकलन एक वसीयत की तरह हमारे पास रहेगा जिसमें संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु, मनुष्यता की देखरेख की ज़िम्मेदारी वे हमें सौंप रहे हैं।
‘‘पृथ्वी के सारे ख़ून एक हैं/एक ही यात्रा में/एक ही पृथ्वी-भर लम्बी देह में/दौड़ रहे हैं वे/...अरबों धड़कनें एक ही लय में/घुमा रही हैं दुनिया को/ हर ख़ून हर ख़ून से बतियाता है।''
ये कविताएँ अपने सहज, निरायास आग्रह के साथ हमें ख़ून से बातें करते ख़ून की आवाज़ सुनने को कहती हैं। ''क्षमा करें भद्रजन/यदि फिर पूछ रहा हूँ/...मेरे देश के एक हाथ को/एक खुले हुए भूखे मुँह तक पहुँचने में/कितने बरस लगते हैं?’’ यह एक निर्दलीय प्रश्न है, लेकिन निरपेक्ष नहीं, यह मनुष्यता की आहत कोख में चीख़ता प्रश्न है; उम्मीद है हम इसका जवाब ढूँढ़ने का प्रयास करेंगे!
Navmallika
- Author Name:
Kunal +3
- Book Type:

- Description: आधुनिक मैथिलीक समग्र पत्रकारिताक इतिहास मे दिल्ली सँ प्रकाशित 'अंतिका'क भूमिका बहुत तरहें अन्यतम रहल छै। कोनो पूर्व वा समकालीन मैथिली पत्रकारिताक उपरौंझ मे वा प्रतिस्पर्धा मे नहि, अपितु पत्रिकाक अपन प्रयोगशील संरचना, दृष्टिकोण ओ बहुकोणीय साहित्य-प्रयोगक समानांतर अभ्यास रूप मे। हमरा बुझने मैथिलीक समकालीन आधुनिक बोधक रचनाशीलता केँ देशक समस्त भाषा-साहित्यक मुख्य प्रवाह मे आनि वैश्विक गतिविधि पर्यंत जोड़बा मे 'अंतिका'क भूमिका सदैव अहम आ उल्लेखनीय रहतैक। अपन एहि विशेष भूमिकाक अद्यतन शृंखला मे 'अंतिका'क आरंभिक 25 अंक सभ मे सँ आजुक समय मे हस्तक्षेप करैत महत्त्वपूर्ण चौंतीस कविक बीछल कविताक संकलन 'नवमल्लिका'क प्रकाशनक प्रयोग सेहो हमरा अभिनव आ प्रीतिकर लागलए तथा प्रासंगिक सेहो। हमरा जनैत एहि प्रक्रिया मे रचना ओ रचनाकारक सामाजिक प्रयोजनीयता एक टा नव संदर्भ मे भविष्योन्मुख होइत छै। निश्चये एहन उपक्रम कोनो सजग सचेष्ट सम्पादकीय बोध आ रचनात्मक ऊहिए सँ संभव होइत छै। -गंगेश गुंजन # मैथिली पत्रकारिताक परंपरा मे 'अंतिका' नवाचारक लेल जानल जाइत अछि जकर प्रमाण थिक ई कविता संचयन। 'नवमल्लिका' मे संकलित चारि पीढ़ीक कवि आ हुनक कविताक कैनवास बहुआयामी अछि आ प्रयोगधर्मी सेहो। मैथिलीक कोनो एक पत्रिकाक अंक सँ एहन उत्कृष्ट संकलन निकालब हमरा जनतबे असंभव। विषयक विविधता, काव्यगत-प्रयोगधर्मिता आ समग्र-प्रभावान्विति मे ई संकलन छात्र-प्राध्यापक आ कविताक विज्ञ पाठक लेल अनमोल उपहार थिक। — प्रो. ज्ञानतोष कुमार झा
Pratinidhi kavitayein : Badri Narayan
- Author Name:
Badri Narayan
- Book Type:

-
Description:
छोटे शहरों के रचनाकारों के बड़े केन्द्रों में उत्प्रवास और उनके मनोजगत में केन्द्र के सर्वग्रासी प्रसार और आधिपत्य के इस भयावह दौर में बद्री नारायण की कविता गुलाब के बरक्स कुकुरमुत्ते के बिम्ब को रचने वाली काव्य-परम्परा का विस्तार है। यह एक ऐसा समय है जब केन्द्र अपने अभिमत का उत्पादन ही नहीं कर रहा है, उसका प्रसार भी कर रहा है। वह कुछ हद तक अपनी मान्यताओं से अलग दिखती धारणाओं और काव्य-भंगिमाओं को भी लील जाने को आतुर है। इसलिए कोई भी अन्य काव्य-भंगिमा उसके लिए असहनीय हो गई है। वह तर्क से या कुतर्क से उसे ख़ारिज कर देने पर आमादा है। यह समय कविता-परिदृश्य के आन्तरिक जनतंत्र को बचाने के कठिन संघर्ष का समय है। बद्री की कविता वस्तुतः जनतांत्रिक समय में एक संवादी नागरिक होने की इच्छा की कविता है।
उनकी कविता भारतीय समाज के निम्नवर्ग के ऐसे मिथकों, आख्यानों और इतिहास के अलक्षित सन्दर्भों के पास जाती है जिनमें उनकी पीड़ाएँ, अवसाद और संघर्ष की अदीठ रह गई गाथाएँ छिपी हैं। बद्री की कविता में वर्चस्वशाली शक्तियों द्वारा स्वीकृति प्राप्त कर चुके प्रचलित मिथक लगभग नहीं हैं। अप्रचलित मिथकीय आख्यानों का पुनर्पाठ करने की कोशिश भी यहाँ नहीं है। इन कविताओं में तो ऐसी जातियों और मानव समूहों के अपने आख्यानों और जन-इतिहासों के चरित्र और गाथाएँ हैं जो उत्पादन की गतिविधियों से जुड़े होने के बावजूद समाज की परिधि पर नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। बद्री की कविता उन बहुसंख्य मानव समूहों के सपनों, आकांक्षाओं, उनकी कमज़ोरियों और उनकी शक्ति का भाष्य तैयार करती है। वस्तुतः कवि का काव्य-व्यवहार ही इस कविता की राजनीति का साक्ष्य है ।
—राजेश जोशी
Apne Samne
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

-
Description:
जीवन को अनुभूति और चिन्तन के विभिन्न धरातलों पर ग्रहण करनेवाले कवि कुँवर नारायण अपनी कविताओं में सीमाएँ नहीं बनाते; उनकी ज़्यादातर कविताएँ किसी एक ही तरह की भाषा या विषय में विसर्जित-सी हो गई नहीं लगतीं—दोनों को विस्तृत करती लगती हैं। अनेक कविताएँ मानो समाप्त नहीं होतीं, एक ख़ास तरह की हमारी बेचैनियों का हिस्सा बन जाती हैं। इस तरह से देखें तो वे अपने को सिद्ध करनेवाले कवि हमें नहीं नज़र आते। वे बराबर अपनी कविताओं में मुहावरों से बचते हैं और अपने ढंग से उनसे लड़ते भी हैं। उनकी कविता की भाषा में धोखे नहीं हैं। अधिकांश कविताओं का पैनापन ज़िन्दगी के कई हिस्सों को बिलकुल नये ढंग से छूता है।
वे मानते हैं कि दैनिक यथार्थ के साथ कविता का रिश्ता नज़दीक का भी हो सकता है और दूर का भी और दोनों ही तरह वह जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है—सवाल है, कविता कितने सच्चे और उदार अर्थों में हमें आदमी बनाने की ताक़त रखती है। कविता उनके लिए जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं, जीवन का सबसे आत्मीय प्रसंग है—कविता, जो अपने चारों तरफ़ भी देखती है और अपने को सामने रखकर भी। उनकी कविताओं में हमें बहुत सतर्क क़िस्म की भाषा का इस्तेमाल मिलता है; वह कभी बहुत गहराई से किसी ऐतिहासिक या दार्शनिक अनुभव की तहों में चली जाती है और कभी इतनी सरल दिखती है कि वह हमें अपने बहुत क़रीब नज़र आती है। बहुआयामी स्तरों पर भाषा से यह लड़ाई और प्यार कुँवर नारायण को चुनौती देता है, ख़ास तौर पर एक ऐसे वक़्त में जब कविता का एक बड़ा हिस्सा एक ही तरह की भाषा में अपने को अभिव्यक्त किए चला जा रहा है।
हिन्दी के अग्रणी आधुनिक कवि कुँवर नारायण की कविता की दुनिया में जाने का मतलब ज़िन्दगी को गहराई और विस्तार से देखने और जानने का अच्छा मौक़ा पा लेना है।
Himalaya
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

-
Description:
संसार के किसी पर्वत की जीवन-कथा इतनी रहस्यमयी न होगी जितनी हिमालय की है। उसकी हर चोटी, हर घाटी हमारे धर्म, दर्शन, काव्य से ही नहीं, हमारे जीवन के सम्पूर्ण निश्रेयम् से जुडी हुई है। संसार के किसी अन्य पर्वत की मानव की संस्कृति, काव्य, दर्शन, धर्म आदि के निर्माण में ऐसा महत्त्व नहीं मिला है, जैसा हमारे हिमालय को प्राप्त है। वह मानो भारत की संश्लिष्ट विशेषताओं का ऐसा अखंड विग्रह है, जिस पर काल कोई खरोंच नहीं लगा सका।
वस्तुतः हिमालय भारतीय संस्कृति के हर नए चरण का पुरातन साथी रहा है। भारतीय जीवन उसकी उजली छाया में पलकर सुन्दर हुआ ये, उसकी शुभ्र ऊँचाई छूने के लिए उन्नत बना है और उसके हृदय से प्रवाहित नदियों में घुलकर निखरा है।
हमारे राष्ट्र के उन्नत शुभ्र मस्तक हिमालय पर जब संघर्ष की नील-लोहित आग्नेय घटाएँ छा गईं, तब देश के चेतना-केन्द्र ने आसन्न संकट की तीव्रानुभूति देश के कोने-कोने में पहुँचा दी।
धरती की आत्मा के शिल्पी होने के कारण साहित्यकारों और चिन्तकों पर विशेष दायित्व आ जाना स्वाभाविक ही था। इतिहास ने अनेक बार प्रमाणित किया है कि जो मानव समूह अपनी धरती से जिस सीमा तक तादात्म्य कर सका है, वह उसी सीमा तक अपनी धरती पर अपराजेय रहा है। आधुनिक युग के साहित्यकार को भी अपने रागात्मक उत्तराधिकार का बोध था। इसी से हिमालय के आसन्न संकट ने उसकी लेखनी को, ओज के शंख और आस्था की वंशी के स्वर दे दिये हैं।
Dil Duniya Dastoor
- Author Name:
Rajan Verma
- Book Type:

- Description: दिल दुनिया दस्तूर छोटी कविताओं का एक संग्रह है जो एक ऐसे व्यक्ति के दिन-प्रतिदिन के जीवन से प्राप्त होता है, जिसने दिल टूटने, अस्वीकृति और एकाकीपन को देखा है फिर भी उसे प्यार मिला है। यह पुस्तक एक ऐसे व्यक्ति की जीवन यात्रा का प्रदर्शन है जो कई वर्षों से कॉर्पोरेट जीवन से जूझने के संघर्ष के समानांतर वह जीवन जीने की कोशिश कर रहा है जो वह हमेशा चाहता था, अपनी कविताओं के माध्यम से। वह मानव जीवन के मूल तत्वों पर सवाल उठाते हैं – प्यार, दिल टूटना, एकांत तथा एक व्यस्त कामकाजी किंतु यांत्रिक जीवन के रहते भी कहीं खोया एक अकेला व्यक्ति। यह संस्करण एक प्रयास है पाठकों के बीच आत्म-प्रतिबिंब की चिंगारी जलाने में, आधुनिक जीवन की अनियमितताओं से जूझने में और उम्मीद है मददगार होगा समाज के ऐसे मानदंडों से निपटने में जो अक्सर नकली, समझौता न करने वाले, दोहरे मानकों से लिप्त और मजबूर करने वाले होते हैं।
Hunkar
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ करुणा को जीने, विषमताओं पर चोट करने, भाग्यवाद को तोड़ने और क्रान्ति में विश्वास करनेवाले कवि हैं। यही कारण है कि पराधीन भारत की बात हो या स्वाधीन भारत की, वे अपने विज़न और वितान में एक अलग ही ऊँचाई पर दिखते हैं। और इस बात की मिसाल है उनका यह संग्रह ‘हुंकार’।
‘हुंकार’ में इस शीर्षक से कोई कविता नहीं है, लेकिन हर कविता एक हुंकार है। काव्य में ओज को कलात्मक रूप देनेवाले कवि हैं दिनकर। उन्होंने अपने काव्य में राष्ट्रीय अस्मिता की वह ज़मीन तैयार की, जिससे स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हो सके। उन्होंने ‘अनल-किरीट’ में लिखा—‘धरकर चरण विजित शृंगों पर झंडा वही उड़ाते हैं/अपनी ही उँगली पर जो खंजर की जंग छुड़ाते हैं।’
दिनकर विसंगतियों और विडम्बनाओं को तटस्थ होकर नहीं देख सकते, वे उनकी जड़ों तक जाते हैं। ‘हाहाकार’ कविता में जो चित्र उन्होंने खींचे हैं, वे बेचैनी से भर देनेवाले हैं, क्योंकि यह धरती ऐसी हो गई है, जहाँ चीखें ही चीखें हैं। विदारक तो यह कि कुछ बच्चे माँ के सूखे स्तन चूस रहे हैं, कुछ की हड्डियाँ क़ब्र से ‘दूध-दूध’ चिल्ला रही हैं। इसलिए ‘दिल्ली’ जो क्रूर, निर्लज्ज और मनमानी की प्रतीक बन चुकी, उसे ललकारते हुए कहते हैं—‘अरी! सँभल, यह क़ब्र न फटकर कहीं बना दे द्वार/निकल न पड़े क्रोध में लेकर शेरशाह तलवार!’
इस संग्रह में दिनकर की दृष्टि वैश्विक है। इसलिए जिस तरह वे ‘तक़दीर का बँटवारा’ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच वार्ता विफल होने पर जन को आगाह करते हैं, उसी तरह ‘मेघ-रन्ध्र में बची रागिनी’ में रक्तपिपासु इटैलियन फ़ासिस्टों के अबीसीनिया पर आक्रमण को लेकर सजग करनेवाली चेतना को प्रतिपादित करने से नहीं चूकते।
‘हुंकार’ क्रान्ति को एक नया रूप देनेवाला ऐसा संग्रह है जो आठ दशकों से विद्रोह की आवाज़ बना हुआ है, सपनों की राह और रोशनी बना हुआ है।
Nigahon Ke Saye
- Author Name:
Jaan Nisar Akhtar
- Book Type:

-
Description:
जाँ निसार अख़्तर
फरवरी, 1914 को खैराबाद, ज़िला—सीतापुर में जन्म हुआ। पिता मुज़्तर खैराबादी उर्दू के प्रसिद्ध कवियों में से थे और घर का वातावरण साहित्यिक होने के कारण उनमें बचपन से ही शे’र कहने की रुचि पैदा हुई और दस-ग्यारह वर्ष की आयु से कविता करने लगे। सन् 1939 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर में उर्दू के प्राध्यापक नियुक्त हुए, किन्तु 1947 में साम्प्रदायिक दंगे छिड़ जाने से त्याग-पत्र देकर भोपाल चले गए और वहाँ हमीदिया कॉलेज के उर्दू-फ़ारसी विभाग के अध्यक्ष बने। फिर 1950 में वहाँ से त्याग-पत्र देकर बम्बई चले गए। प्रारम्भ के रूमानी काव्य में धीरे-धीरे क्रान्तिकारी तत्त्वों का मिश्रण होता गया और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ते गए। साम्राज्यवाद का विरोध और स्वदेश-प्रेम की भावना से इनकी कविता ओत-प्रोत रही। दूसरा महायुद्ध, आर्थिक दुर्दशा, राजनीतिक स्वाधीनता, विश्वशान्ति और ऐसी ही अनेक घटनाएँ हैं जिनको ‘अख़्तर’ ने वाणी प्रदान की। आज के जीवन-संघर्ष को वे कल के नव-निर्माण का सूचक मानते थे। उनके काव्य में सामाजिक यथार्थ का गहरा बोध परिलक्षित होता है और उनके काव्य का लक्ष्य वह मानव है जो प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सुन्दर, सरस और सन्तुलित जीवन के निर्माण के लिए संघर्षशील है। उनके कला-बोध की परिपक्वता एक ओर तो उनकी सम्पन्न विरासत और दूसरी ओर उर्दू-फ़ारसी साहित्य के गहन अध्ययन की देन है। प्रस्तुत पुस्तक का विषय-चयन तथा काव्य-सम्पादन उनकी उपर्युक्त विशेषताओं का ही परिणाम है। वे वर्षों फ़िल्म-जगत से सम्बद्ध रहे और उनके अनेक फ़िल्मी गीत विशेषतः लोकप्रिय हुए।
निधन: 18 अगस्त, 1976
Kabhi Ke Baad Abhi
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
- Rating:
- Book Type:

- Description: हिन्दी कविता के लोकतंत्र और लोकायतन में विनोद कुमार शुक्ल की कविता अनूठी सहजता के साथ उपस्थित मिलती है। विनोद कुमार शुक्ल जीवन के विपुल वैविध्य को नगण्य प्रतीत होते उदाहरणों में अनुभव करते हैं। यह ‘मुलायम मामूलीपन’ उनकी कविता में आकर संवेदना का अक्षर-आलेख बन जाता है। कभी के बाद अभी विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं का वह संग्रह है जिस पर कवि के लम्बे जीवनानुभव की सजग छायाएँ हैं। इन छायाओं के बीच जितना दिखना चाहिए उतना ही दिखता है, अतिरिक्त कुछ भी नहीं। शब्दों की अन्तर्ध्वनियों और उनके सहजीवन के पारखी विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ मन्द्र स्वरों में व्यक्त होती हैं। वे कहते हैं, ‘चुप रहने को भी सुन लेना/जीवन की उम्मीद से।’ घर, पड़ोस, मृत्यु, जन्म सरीखे बीज-शब्द इस संग्रह की रचनाओं में अँखुए की तरह उकसे दिखाई देते हैं। ऐसे बहुतेरे शब्दों से हरे-भरे जीवन की शाश्वत सरलता पर कवि मुग्ध है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सम्बन्धों के साझा-सौन्दर्य को कवि भाँति-भाँति से व्यक्त करता है। इसके पश्चात् भी जाने कितना है जो अल्पविराम के बाद और पूर्णविराम से पहले अनुभव किया जा सकता है। अपूर्णता की गरिमा और सार्थकता को भी विनोद कुमार शुक्ल ने रेखांकित किया है। इसका महत्त्व चीन्हते हुए लिखते हैं, ‘इस असमाप्त अधूरे से भरे जीवन को/अभी अधूरा न माना जाए/कि जीवन भरपूर जिया गया।’ प्रस्तुत कविता-संग्रह विनोद कुमार शुक्ल की रचनाशीलता की अद्वितीय आभा का एक और आयाम है।
Ek Cheez Kam
- Author Name:
Neelesh Raghuwanshi
- Book Type:

-
Description:
‘कहना है मुझे उस तरह/जिस तरह कहा नहीं गया अब तक’ इस साधारण से वाक्य से नहीं लगता था कि कविता का हिस्सा बनकर यह कथन बहुआयामी हो जाएगा। नीलेश की कविताओं में साधारण को असाधारण में ढालने की क्षमता है। क्या कभी सोचा जा सकता है कि समाज में बूढ़े हो चुके पिता परिवार से इस तरह अलग-थलग होते जाते हैं, जैसे अंगुली से नाखून अलग किए जाते हैं—‘नाखून की तरह/पिता भी तो झर रहे हैं/अब जीवन से’, इस वाक्योक्ति में पैवस्त यातना दहला देने वाली है।
नीलेश के यहाँ वाक्यांश मुहावरों में ढलते नज़र आते हैं। ‘जिन आँखों में काजल लगाया मैंने (कैसे) देख सकूँ उसमें दुख को’ कहते हुए कवि को लगता है—‘चट्टानों के बीच से/कोंपल की तरह फूटता है/दुख’। यहाँ मुहावरा उलट गया है। चट्टानों में कोंपल का फूटना अदम्य जिजीविषा का द्योतक है पर यहाँ हमारे सामाजिक यथार्थ की क्रूर चट्टानों से तो केवल दुख ही उपजता है। बदलते वक्त के साथ सामाजिक यथार्थ कितना उलट गया है, कवि इस स्थिति को ‘नागरिकता की मृत्यु’ की तरह देखने को विवश है।
ट्रैफिक के लिए सड़क किनारे के बोर्ड की चेतावनी को इस तरह पढ़ा जाना कि ‘सावधान! आगे अंधा मोड़ है/कहती हैं सड़कें/हमारे जीवन की कहानी’। सिर्फ कविता में ही सम्भव हो सकता है जीवन के इस कटु यथार्थ को एक साधारण-सी बात में इस तरह गुम्फित करना और नीलेश इसे बहुत सलीके से करती हैं। इसमें राजनीतिक हालात का दर्शन भी किया जा सकता है। ‘भला मानुष’ पद कभी निष्कपट, सच्चे और किसी कदर भोले-भाले व्यक्ति के लिए प्रयोग में आने लगा था लेकिन नीलेश उसी के अभिधार्थ में कहती हैं—‘जब मानुष भला मानुष हो जाएगा/तो बन्दर भी भले बन्दर हो जाएँगे’। पाठक के लिए यहाँ भी राजनीतिक अर्थ खोजने की गुंजाइश बनती है।
अपने आसपास उपस्थित परिवेश के आमफहम बिम्बों में जीवन के शाश्वत प्रश्नों की तरफ संकेत करना नीलेश की कविता की भी विशेषता रही है और गद्य की भी। उनका यह नया कविता-संग्रह निश्चय ही उनके कवि-मानस के अन्य विस्तारों से हमारा परिचय कराएगा।
Pinjar Prem Prakasiya : Kabir Par AAdharit Prabandh Kavya
- Author Name:
Ramanand Tiwari
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Mutthi Me Chand
- Author Name:
Yashodhra Bhatnagar
- Book Type:

- Description: Book
Jhukna Kisi Ko Ropna Hai
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

- Description: नब्बे के बाद की हिन्दी कविता को कवियों की जिस पीढ़ी ने अपने सरोकारी एवं सतत लेखन से सँवारा-बनाया है उनमें श्रीप्रकाश शुक्ल एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविताई का विस्तार तीन दशकों में फैला हुआ है, लेकिन इसकी खासियत है इसका सातत्य। 1999 में श्रीप्रकाश शुक्ल का पहला संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ के आने से लेकर 2022 में सातवें संग्रह ‘वाया नई सदी’ तक की यात्रा में एक निरन्तरता है। ये कृतियाँ क्रमशः संस्कृति, दर्शन और राजनीतिक चेतना की धुरी पर अपने समय को कातती हैं। इनके पूरे परिस्पन्द के बीच एक चीज सर्वनिष्ठ है और वह है लोकभाषा और जनपदीयता। बनारस अंचल श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं की शिराओं में रक्त बनकर दौड़ रहा है। सोनभद्र, मिर्जापुर, प्रयाग और गाजीपुर का ‘लोकेल’ उनकी कविता में बुनियाद की तरह बिछा हुआ है। उनकी कविताओं पर इस क्षेत्र की लोककथाओं, लोक धुनों और गीतों का गहरा असर है। आख्यान-परम्परा का तो सबसे गहरा और व्यापक। श्रीप्रकाश शुक्ल की आख्यान शैली में लोक और शास्त्र दोनों में मौजूद दन्तकथाओं, किंवदन्तियों और मिथकीयता के आधुनिक सन्दर्भों का काव्यमय सन्धान अद्भुत और व्यापक है। लोककथाओं व मिथकीय पृष्ठभूमि के साथ श्रीप्रकाश शुक्ल ने बहुत साभिप्राय लोक देवों-देवियों, लोकनायकों और अति साधारण किरदारों के साथ मामूली जगहों, पेशों, रिवाजों व चीजों को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। प्रशस्त इतिहासबोध और जनपदीयता के भीतर से कविता में इतिवृत्त और प्रकृति के संश्लेष के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल इस प्रवृत्ति के प्रतिनिधि कवि हैं।
Akeli Auraton Ke Ghar
- Author Name:
Madhu B. Joshi
- Book Type:

- Description: समकालीन हिन्दी कविता में अपनी विनम्र और सार्थक उपस्थिति दर्ज करती कवयित्री मधु बी. जोशी अपने पहले काव्य-संग्रह ‘अकेली औरतों के घर’ में अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा और प्रखरता के साथ उपस्थित हैं। सरल-सहज भाषा में लिखी ये कविताएँ स्त्रियों के जटिल जीवन-स्थितियों, विडम्बनाओं और उनके जय-पराजय की पड़ताल करती हैं। हालाँकि संग्रह की अधिकांश कविताएँ स्त्रियों पर केन्द्रित हैं लेकिन इनमें आम लोगों की जिन्दगी के भी विभिन्न रंग बिखरे हैं, इन्हें मात्र स्त्रीवादी कविता कहना कवयित्री के काव्य-परिवेश को संकुचित करने जैसा अन्यायपूर्ण कार्य होगा। ये कविताएँ अराजक देह-समय में लहूलुहान स्त्रियों की शोक-गीतिका हैं जो अपनी विरल लय में पाठकों को एक रचनात्मक आस्वाद प्रदान करने के साथ समय, समाज, राजनीति के नए प्रभुओं की विन्द्रूपताओं तथा बाज़ार की जगर-मगर दुनिया के छल-छद्मों से साक्षात्कार कराती हैं। लेकिन यह पराजित अथवा एकाकीपन के बियाबान में भटकती स्त्री की हताशा की कविताएँ नहीं हैं, बल्कि ये एक उम्मीद रचती हैं क्योंकि ‘अभी/हवा में नमी बाक़ी है/धूप हमेशा ही हिंसक नहीं रहती/धरती अब भी बहुत उर्वरा है।’ इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी सम्प्रेषणीयता जो सीधे पाठकों के हृदयस्थल को छू लेती है। कम शब्दों में बड़ी बात कह जाना कवयित्री की अपनी विशिष्ट उपलब्धि है।
Asrar-E-Khudi
- Author Name:
Mohd. Ikbal
- Book Type:

-
Description:
इक़बाल की फ़ारसी मसनवी ‘अस् रारे ख़ुदी’ (ख़ुदी या अहम् के रहस्य) एक दार्शनिक कविता है, जिसे ख़ुदी या अहम् (Ego) अथवा आत्मन् (Self) के अर्थ, उसकी यथार्थता, अभिपुष्टि एवं स्थिरता का एक प्रकार का उपनिषद् कहा जा सकता है। यह कविता जगत् विषयक संकल्पना से प्रेरित होती है तथा अस्तित्व के महानाटक में मानवीय अहम् (Human Ego) या मानवीय आत्मशक्ति तथा उससे उद्भूत चारित्रिक एवं नैतिक गुणों की भूमिका का निरूपण करती है। कवि की भावप्रवणता तथा उस भावप्रवणता की सशक्त और प्रभावकारी अभिव्यक्ति की शैली इस दार्शनिक एवं तत्त्वमीमांसीय कविता को उच्चतर कविता के अवस्थान का अधिकारी बना देती है। स्पष्टतया यह एक विचार-प्रधान कविता है और कवि के विचार हृदयानुभूत हैं तथा उनकी अभिव्यक्ति प्रांजल एवं वाग्मितापूर्ण भाषा तथा उदात्त एवं मनोरम शैली में हुई है। प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने के एक वर्ष बाद 1915 में इसका प्रकाशन विश्व-साहित्य की एक अभूतपूर्व घटना थी, क्योंकि इसके पूर्व इस विषय को एक अनूठे अन्दाज़ में उदात्त काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करने का उदाहरण विश्व-साहित्य में नहीं मिलता। प्रकाशित होते ही यह कविता फ़ारसी में क्लासिक बन गई तथा 1920 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध प्राच्यविद् प्रो. निकल्सन के अंग्रेज़ी अनुवाद के फलस्वरूप यह यूरोप व अमेरिका के पाठकों की पहुँच में आ गई। इसे विश्व-साहित्य की एक महान उपलब्धि क़रार देते हुए प्रसिद्ध अमेरिकी कवि, समालोचक तथा आधुनिक कला के दार्शनिक हर्बट रीड (Herbert Read) ने टिप्पणी की कि यह कविता ‘‘धारणाओं के नानात्व में से आस्था के एकत्व तथा विचारधाराओं के गुह्य तर्क में से एक वैश्विक स्फूर्ति का सृजन करती हुई अपनी सुन्दरता में आधुनिक दर्शन की आधारभूत अवस्थाओं को प्रतिबिम्बित करती है।’’ आख्यानों का प्रयोग वृत्तान्त में पाठकों की दिलचस्पी बनाए रखता है तथा कविता को सजीवता प्रदान करता है। ‘अस् रारे ख़ुदी’ की रचना के साथ फ़ारसी शाइरी में इक़बाल ने एक नए दबिस्तान (School) और तर्ज़ की नींव डाली, जिसे आजकल ईरानी विद्वान ‘सब्के इक़बाल’ अर्थात् ‘इक़बालीय शैली’ (Iqbalian Style) कहते हैं।
इक़बाल के काव्य और चिन्तन के अनुशीलन के लिए ‘अस् रारे ख़ुदी’ मूलाधारात्मक है।
Andhere Ke Rang
- Author Name:
Mukund Laath
- Book Type:

-
Description:
मुकुन्द लाठ हमारे मूर्धन्य विचारकों और संगीतवेत्ताओं में से एक हैं। सुखद संयोग यह है कि उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं और वे अपने ढंग के अकेले कवि हैं। विस्मय की बात यह है कि उनकी कविता में संसार की पदार्थमयता और उनकी सहज वैचारिकता में न तो कोई अलगाव है और न ही एक का दूसरे पर कोई बोझ। वे अपने आसपास को जिस सजग संवेदनशीलता और नन्हीं सचाइयों में देख पाते हैं, वह अनोखा गुण है। उनके अवलोकन में सूक्ष्मता है, उनकी अभिव्यक्ति में सफ़ाई है। वे मर्म के कवि हैं, किसी विचार के प्रवक्ता नहीं। उनकी कविता का वितान बड़ा है पर उनमें सहज विनय है, कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं। वे सहज भाव से कह पाते हैं : ‘उडऩा तो/चिडिय़ा से सीख लिया/अब तो आकाश कहाँ पूछता हूँ।’ उनके अलावा हिन्दी में और कवि हैं जो कह सके ‘है इन्हीं पत्तों में कहीं/ढूँढ़ना मत/पंख हूँ, आकाश है।’ रज़ा पुस्तक माला में अपनी आयु के आठवें दशक में लिखी गईं एक कवि की इन कविताओं को हम सादर-सहर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
—अशोक वाजपेयी
Uttar Kabeer Aur Anya Kavitayen
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ’ केदारनाथ सिंह का पाँचवाँ काव्य-संकलन है, जिसमें पिछले छह-साढ़े छह वर्षों के बीच लिखी गई कविताएँ संगृहीत हैं। यह दौर बाहर और भीतर, दोनों ही धरातलों पर क्षिप्र परिवर्तनों का दौर रहा है। इस संग्रह की कविताओं में उसकी कुछ अनुगूँजें सुनी जा सकती हैं। पर एक ख़ास बात यह है कि यहाँ बहुत-सी कविताएँ एक ऐसे स्मृतिलोक से छनकर बाहर आई हैं, जहाँ समय के कई सम-विषम धरातल एक साथ सक्रिय हैं। इस संग्रह तक आते-आते कवि की भाषा में एक नई पारदर्शिता आई है। इस भाषालोक में कुछ भी वर्जित या अग्राह्य नहीं है—पर यहाँ ऐसे शब्दों पर भरोसा बढ़ा है, जो मानव-व्यवहार में लम्बे समय तक बरते गए हैं।
इस संग्रह की कविताओं में अपने स्थान के साथ कवि का रिश्ता थोड़ा बदला है, जिसका एक संकेत ‘गाँव आने पर’ जैसी कविता में देखा जा सकता है। रचना में यह नया धरातल एक तरह के आन्तरिक विस्थापन की सूचना देता है। विस्थापन की यह पीड़ा अनेक दूसरी कविताओं में भी देखी जा सकती है—यहाँ तक कि ‘कुदाल’ में भी। कोई चाहे तो कह सकता है कि यह कवि के काव्य-विकास में एक नए प्रस्थान की आहट है—हालाँकि ये कविताएँ अपने स्वभाव के अनुसार इस तरह का कोई दावा नहीं करतीं। इस संकलन की बहुत-सी कविताओं में एक अन्तर्निहित प्रश्नात्मकता है। वे अक्सर कुछ पूछती हैं—बाहर से कम और अपने-आपसे ज़्यादा। ‘उत्तर कबीर’ शीर्षक अपेक्षाकृत लम्बी कविता इस प्रश्नात्मक बेचैनी का एक बेलौस उदाहरण है। फिर इस पूछने की धार के आगे मुक्ति भी विडम्बनापूर्ण लगने लगती है और स्वयं कवि-कर्म भी—जो सड़ रहा है और ज़ाहिर कि बहुत कुछ है जो सड़ रहा है क्या मैं उसे बचा सकता हूँ कविता लिखकर?
Man Ki Nadi Me Bheege Shabd
- Author Name:
Rekha Bhatia
- Book Type:

- Description: Book
Ek Aur Madhushala
- Author Name:
Dr. Suresh Prasad
- Book Type:

- Description: जिस शराब के प्रबल पक्षपाती विश्व के विभिन्न साहित्यों में फिट्जेरॉल्ड,उमर खैयाम और डॉ. हरिवंश राय बच्चन जैसे लब्धप्रतिष्ठों ने उसे साहित्यिक मान्यता प्रदान की,वहाँ प्रथमतः डॉ. सुरेश प्रसाद ने मदिरा के प्रतिपक्ष में विज्ञानपूर्ण विचार देकर लोगों को सबल ढंग से इस दुर्गुण से दूर रहने की सलाह दी है। डॉ. प्रसाद ने मदिरा के विरुद्ध काव्यात्मक आवाज उठाकर मद्यपों का मनोबल बहुत हद तक तोड़ा है। मद्यपान से छुटकारा दिलाने का यह प्रयास सराहनीय है। मदिरा पर आज तक मेरी दृष्टि से इस तरह का कोई दूसरा काव्य नहीं गुजरा है। यह कृति स्वाभाविक रूप से लोकप्रिय और चर्चित होगी तथा हिंदी-साहित्य-जगत् एवं लोक-मानस दोनों इसका आदर करेंगे, निःसंदेह ऐसा विश्वास है। डॉ. प्रसाद ने मदिरा की हर अदा को कातिल करार देते हुए प्रतिक्रिया-स्वरूप उस पर कातिलाना हमला बोल दिया है; उसके सारे काले चिट्ठे खोलकर रख दिए हैं दुनिया की आँखों के सामने। ‘मदपायी’ तथा ‘मदिरा-विक्रेता’ पर भी विनम्रता जताते हुए उन्हें मदिरा का साथ देने से मना किया है औचित्य बताते हुए।
Aatmadroh
- Author Name:
R. Chetankranti
- Book Type:

-
Description:
‘आत्मद्रोह’आर. चेतनक्रान्ति का आत्मवान संग्रह है, इस अर्थ में कि जो शक्तियाँ नागरिकता और राष्ट्र की आत्मा को नष्ट करना चाहती हैं, वे उनकी गहरी पहचान करते हैं और इस तरह सामूहिक आत्मा के पुनर्वास की युक्तियाँ तलाशते हैं। उन्हें इस बात का पूरा अभिज्ञान है कि समुदायों का नैतिक बल घटा है। वह अफ़वाह, असत्य और घृणा का शिकार हुआ है। वह गहरे अफ़सोस के साथ देखते हैं इस परिघटना को जो उनकी कविता में तंज़ और आत्मावगाहन में बदलती जाती है। सामाजिक और राजनीतिक अधःपतन को वह व्यंग्यार्थ और कई बार गहरे कटाक्ष के साथ कहते हैं। उनकी नागरिक सजगता भाषिक सजगता में संक्रमित होती है जो अन्तत: विरल काव्यात्मक उठान में परिलक्षित होती है।
शमशेर बहादुर सिंह की परम्परा में चेतन हिन्दी के उन गिने-चुने विशिष्ट कवियों में हैं जो उर्दू ग़ज़लें और नज़्म, जो इस संग्रह का भी हिस्सा हैं, कहते हुए अविलेय आपसदारी का पुनर्स्मरण कराना नहीं भूलते। इस संग्रह में यदि कवि का स्वर बदला हुआ है, वह अधिक तल्ख़ और तेज़ाबी हुआ है तो इसलिए कि समय बदला है और सामाजिक विषाक्तता बहुत तेज़ी के साथ बढ़ी है। कोमलता और पारस्परिकता के इस संहार के सामने न तो निरुपाय हुआ जा सकता है और न ही तटस्थ। चेतन इस अवस्थिति के लिए विडम्बना और आत्म-धिक्कारवाले स्वर और संरचना को उन्मोचित करते हैं।
शोकनाच’ (2004) और ‘वीरता पर विचलित’ (2017) के बाद ‘आत्मद्रोह’ आर. चेतनक्रान्ति का तीसरा कविता-संग्रह है। सांस्कृतिक कूद-फाँद वाले इस अवसरवादी माहौल में चेतन ने आत्म-निर्वासन और सन्त जैसे काव्य-व्यक्तित्व की जो विलक्षणता अर्जित की है, वह हिन्दी की बड़ी उपलब्धियों में एक है।
—देवी प्रसाद मिश्र
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book