Kamal : Sampurna Rachanayen
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Author:
Lamabam Kamal Singh, DevrajPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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लमाबम कमल आधुनिक काल के मणिपुरी साहित्य की नींव रखनेवाले रचनाकारों में से एक थे। जिसे हम आज मणिपुरी भाषा की मौलिक और समृद्ध रचनाधर्मिता कहते हैं, उसके विकास का मूल स्रोत कमल की कविताएँ हैं। उपन्यास, कहानी और नाटक के क्षेत्र में भी उनकी देन ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। अडाङ्ल और चाओबा के साथ मिलकर कमल ने मणिपुरी भाषा की अब तक की श्रेष्ठतम रचनाकार-त्रयी का निर्माण किया। कमल ने मणिपुरी भाषा और साहित्य की निर्धनता दूर करके उसे विश्व की समृद्ध भाषाओं और उनके साहित्य के मध्य गौरवपूर्ण स्थान दिलाने का स्वप्न देखा था। साथ ही वे मणिपुरी साहित्य को उत्कृष्ट मानव-मूल्यों और इतिहास व समाजगत सजगता से जोड़कर विकसित करना चाहते थे। उनका सम्पूर्ण साहित्य इसी अद्भुत स्वप्न को साकार करने की महती साधना का प्रतिफल है। मणिपुर में रहकर वहाँ के साहित्य तथा समाज का अध्ययन करनेवाले हिन्दी के कवि आलोचक डॉ. देवराज ने एल. कमल सिंह की सम्पूर्ण रचनाओं का अनुवाद और सम्पादन किया है। मणिपुर के साहित्य में आधुनिकता के विकास के साथ-साथ, सुदूरपूर्व के इस राज्य की संस्कृति और समाज को समझने की दृष्टि से यह संकलन अत्यन्त उपयोगी है
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लमाबम कमल आधुनिक काल के मणिपुरी साहित्य की नींव रखनेवाले रचनाकारों में से एक थे। जिसे हम आज मणिपुरी भाषा की मौलिक और समृद्ध रचनाधर्मिता कहते हैं, उसके विकास का मूल स्रोत कमल की कविताएँ हैं। उपन्यास, कहानी और नाटक के क्षेत्र में भी उनकी देन ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। अडाङ्ल और चाओबा के साथ मिलकर कमल ने मणिपुरी भाषा की अब तक की श्रेष्ठतम रचनाकार-त्रयी का निर्माण किया।
कमल ने मणिपुरी भाषा और साहित्य की निर्धनता दूर करके उसे विश्व की समृद्ध भाषाओं और उनके साहित्य के मध्य गौरवपूर्ण स्थान दिलाने का स्वप्न देखा था। साथ ही वे मणिपुरी साहित्य को उत्कृष्ट मानव-मूल्यों और इतिहास व समाजगत सजगता से जोड़कर विकसित करना चाहते थे। उनका सम्पूर्ण साहित्य इसी अद्भुत स्वप्न को साकार करने की महती साधना का प्रतिफल है।
मणिपुर में रहकर वहाँ के साहित्य तथा समाज का अध्ययन करनेवाले हिन्दी के कवि आलोचक डॉ. देवराज ने एल. कमल सिंह की सम्पूर्ण रचनाओं का अनुवाद और सम्पादन किया है। मणिपुर के साहित्य में आधुनिकता के विकास के साथ-साथ, सुदूरपूर्व के इस राज्य की संस्कृति और समाज को समझने की दृष्टि से यह संकलन अत्यन्त उपयोगी है
Book Details
-
ISBN9788183610544
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अनामिका के नए संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त—थेरी गाथा : 2014’ को पूरा पढ़ जाने के बाद मेरे मन पर जो पहला प्रभाव पड़ा, वो यह कि यह पूरी काव्य-कृति एक लम्बी कविता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे दृश्य, प्रसंग और थेरियों के रूपक में लिपटी हुई हमारे समय की सामान्य स्त्रियाँ आती हैं। संग्रह के नाम में 2014 का जो तिथि-संकेत दिया गया है, मुझे लगता है कि पूरे संग्रह का बलाघात थेरी गाथा के बजाय इस समय-सन्दर्भ पर ही है। संग्रह के शुरू में एक छोटी-सी भूमिका है, जिसे कविताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए। बुद्ध अनेक कविताओं के केन्द्र में हैं, जो बार-बार प्रश्नांकित भी होते हैं और बेशक एक रोशनी के रूप में स्वीकार्य भी। इस नए संकलन में अनेक उद्धरणीय काव्यांश या पंक्तियाँ मिल सकती हैं, जो पाठक के मन में टिकी रह जाती हैं। बिना किसी तार्किक संयोजन के यह पूरा संग्रह एक ऐसे काव्य-फलक की तरह है, जिसके अन्त को खुला छोड़ दिया गया है। स्वयं इसकी रचयिता के अनुसार “वर्तमान और अतीत, इतिहास और किंवदन्तियाँ, कल्पना और यथार्थ यहाँ साथ-साथ घुमरी परैया-सा नाचते दीख सकते हैं।” आज के स्त्री-लेखन की सुपरिचित धारा से अलग यह एक नई कल्पनात्मक सृष्टि है, जो अपनी पंक्तियों को पाठक पर बलात् थोपने के बजाय उससे बोलती-बतियाती है, और ऐसा करते हुए वह चुपके से अपना आशय भी उसकी स्मृति में दर्ज करा देती है। शायद यह एक नई काव्य-विधा है, जिसकी ओर काव्य-प्रेमियों का ध्यान जाएगा। समकालीन कविता के एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि यह काव्य-कृति एक नई काव्य-भाषा की प्रस्तावना है, जो व्यंजना के कई बन्द पड़े दरवाज़ों को खोलती है और यह सब कुछ घटित होता है एक स्थानीय केन्द्र के चारों ओर। कविता की जानी-पहचानी दुनिया में यह सबाल्टर्न भावबोध का हस्तक्षेप है, जो अलक्षित नहीं जाएगा। —केदारनाथ सिंह
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Book
Nihshabd Noopur : Rumi Ki 100 Gazalein
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Rumi +1
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रूमी ईरान के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी ग़ज़लें ऊर्जस्वी काव्य के दुर्लभ उदाहरणों में से हैं। रूमी की ग़ज़लें सामान्य कविताओं की तुलना में अलग हैं। इनकी प्रत्येक ग़ज़ल का हर शे’र आत्म-अनुभूति की परिपूर्णता से उच्छलित है। इनकी कविता केवल काव्यात्मक चमत्कारों को प्रदर्शित कर पाठकों को लुब्ध करने में पर्यवसित नहीं होती, बल्कि दिल से निकलकर मस्तिष्क और हृदय को भिगोती हुई आत्मा तक का स्पर्श कर लेती है। प्रस्तुत पुस्तक उनकी चुनिन्दा 100 ग़ज़लों का अनुवाद है। इस पुस्तक के माध्यम से रूमी पहली बार सीधे फ़ारसी से हिन्दी में अनूदित हुए हैं। इसमें सबसे पहले फ़ारसी ग़ज़लों का देवनागरी में लिप्यन्तरण प्रस्तुत किया गया है, फिर साथ में ही उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अन्त में मूल ग़ज़लें फ़ारसी लिपि में भी रखी गई हैं। पुस्तक के अन्त में दिए गए अनेक परिशिष्टों के माध्यम से फ़ारसी काव्य-भाषा को समझने के महत्त्वपूर्ण उपकरण जुटाए गए हैं। ग़ज़लों में प्रयुक्त सभी छन्दों को ईरानी तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय रीति से समझाया गया है। क्लासिकल फ़ारसी कविता के सम्यक् परिचय के लिए आवश्यक संक्षिप्त फ़ारसी व्याकरण जोड़ा गया है। अन्त में प्रत्येक शब्द का अर्थ भी दिया गया है। इस प्रकार मूल से जुड़े रसपूर्ण अनुवाद की प्रस्तुति के साथ ही यह पुस्तक रूमी-रीडर के तौर पर भी उपयोग में आने योग्य है।
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
- Author Name:
Vandana Tete
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आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
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